मंगलवार, 18 जुलाई 2017

सिद्धू को देखता हूं

व्यंग्य

मैं सिद्धू को देखता हूं।

पता नहीं वे कॉमेडी शो की वजह से ऐसे हैं या कॉमेडी शो उनकी वजह से ऐसे हो गए हैं!

आजकल कॉमेडी शो में लोग हंसने के बजाय तालियां बजाने लगे हैं। हो सकता है हंसीं की शॉर्टेज हो, हो सकता है हंसने से थकान होती हो, गला दुखता हो ; और तालियों से आराम मिलता हो, लोग अब हाथों से हंसना सीख गए हों। उन्हीं हाथों से, जिनसे वे अब तक पैर छूते थे। पैर छूना कॉमेडी के लिए अच्छा है, थोड़ी गुदगुदी तो होती होगी। पर कई लोग बदमाश हैं, ठीक से गुदगुदाते तक नहीं। हाथ हवा में घुमा-फिराकर लौटा लेते हैं।

सिद्धू के पीछे पांच-छै लड़कियां बैठी रहतीं हैं। रसोई में बैठने से तो अच्छा है। ये लड़कियां हर बार बदल जातीं हैं। इससे पता चलता है कि भारत में अभी ऐसी अनगिनत लड़कियां हैं जो पीछे बैठना चाहतीं हैं, ऑटोग्राफ़ लेना चाहतीं हैं, क्रश खाना चाहतीं है, कुर्सी के पीछे बदलते रहना चाहतीं हैं। भारत के खाते में शायद ऐसे ही बदलाव लिखे हैं।

बहरहाल सिद्धू पूरे मुंह और शरीर से हंसते हैं। इसमें दिक्क़त भी क्या है, जो भी काम करो, ख़ुलके करो। सिद्धू ख़ुलके हंसते है, वे ज़्यादा ख़ुल गये तो और क्या-क्या कर सकते हैं, वही जानते होंगे।

सिद्धू एक ऐसे अम्पायर की तरह लगते हैं जो किसीको आउट नहीं देते, यहां तक कि नोबॉल, वाइड बॉल कुछ भी नहीं। बस चौके और छक्के। तारीफ़ ही तारीफ़। उनकी नज़र में हर कोई महान है। जो भी उनके सामने आ जाए। जैसे किसी हिंदी आलोचक को आप दो कॉपी क़िताब की दें और थोड़ी देर ‘सर-सर’ करें और कलसे आप हुए बड़े लेखक, चिंतक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, कवि......या आप ही चुन लें कौन-सा ऑप्शन ज़्यादा पसंद है। 

मुआ, सोशल मीडिया वो दो कॉपी भी खा गया। अब हम सोशल मीडिया को वहीं जाकर मारेंगे।

क्या आपको पता है कि सिद्धू शायरी भी करते हैं ?

नहीं पता !! तो पता लगाईए कि दो कॉपी उन्होंने किसको दी हैं ?

-संजय ग्रोवर
18-07-2017


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