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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

बे-ईमानदार-3



बे-ईमानदार-1

बेईमानों की एक ही शर्त थी, बस, हमारे जैसे हो जाओ फिर हम तुम्हे सामाजिक कहेंगे, साहसी कहेंगे, मुक्ति का मसीहा कहेंगे, स्वतंत्र कहेंगे बल्कि, यहां तक कि ईमानदार भी कहेंगे-

मैं हंसा।


मैं जैसा रहूंगा ही नहीं वैसा कोई कहे भी तो ख़ुशी कैसे होगी, क्यों होगी !?


लेकिन बेईमानों को होती होगी, तभी तो वो ऐसे हैं।।


बिलकुल ऐसे के ऐसे ही हैं।




बे-ईमानदार-2

कई लोगों ने, जिन्हें मैं पहले साहसी समझता था, सुझाव दिया कि शराफ़त में क्या रखा है, हमारे जैसे हो जाओ, मस्त रहो, ऐश करो.....

मैंने भी बस एक छोटा-सा सुझाव दिया कि तुम सार्वजनिक रुप से ख़ुदको बेईमान कहना शुरु करो, अपनी नेमप्लेट पर लिख लो, पीएचडी की डिग्री की तरह ड्राइंगरुम में लगा लो, अपने बच्चों से कहो कि तुम्हारे मां-बाप-पुरख़े सब बेईमान थे, हैं और रहेंगे ; अपने दोस्तों-परिचितों-छात्रों से कहो कि हम पूरे बेईमान हैं, हमारा ज़रा भी भरोसा मत करना.....

इतना करो फिर मैं भी सोचूंगा-

और आप जानते ही हैं कि इसके बाद क्या हुआ होगा-

बेईमान इस बात से तुरंत मुकर गए कि उन्होंने मुझे कभी कोई सुझाव दिया था।



बे-ईमानदार-3


मनोचिकित्सा की किसी क़िताब में नहीं लिखा कि बेईमानी कोई मानसिक रोग है।

शक होता है कि इन क़िताबों में भी बेईमानों ने कुछ गड़बड़ तो नहीं कर दी !?

आखि़र ये लोग वर्तमान में सच बोलने के बजाय काल्पनिक इतिहास लिखने को इतने उतावले क्यों रहते हैं !?



-संजय ग्रोवर
04-02-2018


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