शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

व्यंग्यावतार परसाईं

 व्यंग्य


परसाईंजी महान व्यक्ति थे। उन्होंने कभी कोई ग़लती नहीं की, न जीवन में न लेखन में। यूं कहने को तो यह भी कहा जाता है कि ग़लतियां इंसान से ही होतीं हैं पर बकने वालों का क्या है, वे तो कुछ भी बकते हैं। परसाईं जी भरे-पूरे इंसान थे। उन्होंने हिंदी साहित्य में व्यंग्य को एक विधा के रूप में मान्यता दिलाई। परसाईं जी का उत्साह और साहस देखकर मान्यता देने वाले शायद कन्फ़्यूज़न में पड़ गए और उन्होंने ‘परसाईं जी के व्यंग्य’ को हिंदी व्यंग्य के रूप में मान्यता दे दी। अब मुश्क़िल यह खड़ी हो गयी कि बाद में कुछ और लोगों का भी व्यंग्य लिखने का मन होने लगा। मगर मान्यता सिर्फ़ परसाईं जी के व्यंग्य को थी। आते-आते ये भी माना जाने लगा कि व्यंग्य में जो कुछ सोचा जा सकता था, परसाईं जी ने सोच लिया है, जो लिखा जा सकता था वो भी उन्ने लिख दिया है। अब नए लेखकों के पास एक ही रास्ता था कि या तो घुमा-फिराकर परसाईं जी के लिखे को दोहराएं या फिर व्यंग्य की थाली से दूर हट जाएं। अतिरिक्त प्रयासों के तौर यह भी किया जा सकता था/है कि आप धोती या पायजामा भी परसाईं जी की तरह पहनें और बाल भी उन्हीं की तरह काढ़ें/काड़ें। क्योंकि हमारे यहां कृतित्व के साथ प्राइवेट व्यक्तित्व पर भी घ्यान दिया जाता है। आज-कल तो पॉपुलर व्यंग्यकार ग़रीबी पर लिखकर पैसा भी अच्छा कमा रहे हैं। उनके पास सुविधा है कि प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा भी परसाईं जी जैसा बनवा लें।

अपने यहां चलन है कि पशुओं को जीते-जी और लेखकों/विचारकों को मरणोपरांत, विभिन्न गुट आपस में बांट लेते हैं। गाय, भैंस, सुअर, उल्लू, हंस-वंस को ख़ुद नहीं मालूम होगा कि उनके नाम से किस-किस महामानव ने अकाउंट खोल रखे हैं। लेखकों/विचारकों के साथ यह व्यवहार मरणोपरांत होता है। परसाईं जी को लेकर कभी-कभार होने वाले छिट-पुट विरोध पर कम्युनिस्टों का संसदीय आचरण देखकर लगता है कि ज़रूर परसाईं जी इन्हीं के हिस्से आए हैं। इनकी परसाईं पर श्रद्धा का जो प्रकार है उसे देखकर लगता है कि जल्दी ही पत्रिकाओं के ऐसे विशेषांक देखने को मिलेंगे जिनमें परसाईं जी का व्यंग्यावतार और उनके व्यंग्य-संग्रहों को धार्मिक पुस्तक घोषित किया जाएगा। वह दिन दूर नहीं जब उनके व्यंग्य दोहों और चौपाईयों की तरह रटे जाएंगे।

- संजय ग्रोवर

बुधवार, 11 जुलाई 2012

‘छत के टैंक में पनडुब्बी’ से एक अंश

हक्काल तत्काल कबूतर की गुफ़ा से निकल कर शेर के घोंसले में प्रवेश कर गया। भीतर हड्डियां तोड़ देनेवाला अंधेरा था। उसने थर्माटेप निकालकर नापना शुरु किया। घोंसला तकरीबन 300 बीघे ऊंचा और 530 टन चौड़ा था। अंधेरे में लगभग 937 परेशानियों का सामना करते हुए वह पिछले दरवाजे तक जा पहुंचा जो कि स्विटज़रलैंड की तरफ़ खुलता था।
अब मुसीबत वह थी कि दरवाज़ा खुले कैसे ? वह कान वगैरह में उंगली डालकर सोच ही रहा था कि उसकी नज़र भूसे के ढेर पर पड़़ी। आह! मिल गया! हक्काल ने आव देखा न ताव, बस गोताखोरी की पोशाक पहनी और भूसे के ढेर में कूद पड़ा। तकरीबन डेढ़ घंटा तैराकी करने करने के बाद जब वह लौटा तो उसके हाथ में एक सुई-धागा था। बस, उसने दरवाज़े को सिलना शुरु कर दिया। जहां-जहां वह सिलता जाता, वहां-वहां दरवाज़ा खुलता जाता। साढ़े तीन घंटे की तुरपन के बाद दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
सामने देखा तो उसकी आंखें फटते-फटते बचीं।
सामने जिगपोली खड़ा था।
अत्सविधुरदेवाहमदम.....वो वहीं से चीखा।
औनेपौनेफिरभीकमकम......ये यहां चीखा।
दरअसल ये कोडवर्डस् थे।
दोनों में कमरतोड़ गलामिलाप हुआ।
अलग होते ही हक्काल ने जिगपोली का मुंह नोंच लिया। यह क्या !? नीचे से तो ख़ुद हक्काल निकल आया !
जिगपोली ने भी हक्काल का चेहरा उधेड़कर जिगपोली को निकाल लिया।
(क्रमशः)
मेरे आनेवाले नये जासूसी उपन्यास ‘छत के टैंक में पनडुब्बी’ से एक अंश। टू प्वांइट फ़ाइव सीग्रेड एजेंट सीरीज़ के ये उपन्यास सिर्फ़ पागलखाना प्रकाशन से प्रकाशित होते हैं।

-संजय ग्रोवर

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