दिन को होला, रात दिवाला, रोज़ मनाता पगलालय.......
पागलखाना 24 घंटे सबके लिये खुला है।
रोज़मर्रा के जीवन में पागलपन एक नियमित घटना है।
अपने-आपसे ख़ुदको छुपाना ठीक नहीं।
कोई भी, कभी भी बिना किसी जांच-पड़ताल, वीज़ा-पासपोर्ट के यहां शामिल-दाखिल हो सकता है। वैसे भी शामिल होना-न होना एक औपचारिक प्रक्रिया है, जो, जो है, वो, वो तो रहेगा ही।
वक्त-स्थान-काल-घोषित-अघोषित-पंजीकृत-अपंजीकृत सब फ़ालतू बातें हैं। आना है तो आओ, बुलाएंगे नहीं. नखरे किसीके उठाएंगे नहीं..
पागलखाना सबके लिए खुला है, मधुशाले का भी बाप (स्त्रीवादी 'मां' पढ़ें) है ये...
(मधुशाला बहुत-से पागलों को प्रिय है अतः उसे टक्कर देना ज़रुरी है।)
बाहरवालो अंदर आओ, अंदरवालो बाहर जाओ, सब अपनी-अपनी सही जगह पकड़ो, समझे क्या !!??
कहीं समझ तो नहीं गए !!??
मैं पागल मेरा मनवा पागल....पागल मेरी टीम रे...
इन्हीं बिगड़े दिमाग़ों में, बहुत ख़ुशियों के लच्छे हैं/
हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं
-शायर ? होगा कोई पागल
शातिराना सी है ज़िंदगी की फ़ज़ां
आप भी गंदगी का मज़ा लीजिए..
Yah गटर बन गया आपके वास्ते
आप जो चाहे उसमें बहा दीजिए..
(अपने-आप बनाया है, कहीं से लिया नहीं है, हां)
Aur kitta description chaahiye aapko ?
KahiN PAAGAL to nahiN ho !?
HO kya ?
Aa jaao fir.
Khub Guzregi..
आईए और अपनी प्रतिभा का व्यंग्य-प्रदर्शन कीजिए और हमारी मेधा का व्यंग्य-प्रदर्शन देखिए।
आप कितना भी छुपा लें, हमें पता है आप अंदर से क्या हैं।
अरे, आपमें-हममें कोई फ़र्क है क्या ?
यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं। यक़ीन न हो तो ख़ुद आकर आंखे फाड़-फाड़कर देख लीजिए।
अब आ भी जाईए। सिर्फ़ पागलखाने में दाखि़ल न होने से कोई स्वस्थ नहीं हो जाता।
ओके। जब हालात बेकाबू हो जाएं तब आ जाईएगा, हम संभाल लेंगे।
दैट’स् ऑल..
(जारी ;-)