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गुरुवार, 5 जून 2014

मुरदों का आत्मविश्वास

मुरदों ने एक और ज़िंदा आदमी को मार डाला।

फ़िर उन्होने बहुत तहज़ीब, बहुत विनम्रता के साथ ज़िंदा लोगों को आमंत्रित किया, ‘आईए न, अब आपकी बारी है।’

ज़िंदा लोग असमंजस में पड़ गए, एक तो वे मार-काट में विश्वास रखते नहीं थे, फ़िर भी मारना पड़ ही जाए तो मुर्दों को मारने का आखि़र तरीक़ा क्या हो सकता है ?

‘एक ही तरीक़ा हो सकता है, पहले उन्हें ज़िंदा किया जाए, उनमें इंसानियत पैदा की जाए..... ', किसी ज़िंदा आदमी को युक्ति सूझी।

‘मगर कैसे ? खेल के सारे नियम मुरदों के बनाए हुए हैं! वे क्या मानेंगे कि वे मुरदे हैं ! वे तो दूसरों को जीना सिखाते पाए जाते हैं। वे मानते हैं कि हम लोगों को सिखाने के लिए हैं, हम सबसे बेहतर हैं......

‘करना तो पड़ेगा, करना तो यह भी पड़ेगा कि पहले ज़िंदा लोगों को भी ज़िंदगी के मायने बताने होंगे, मुरदों का आत्मविश्वास देखकर वे इतना प्रभावित हो जाते हैं कि ख़ुदको मुरदा समझने लगते हैं......’

ज़िंदा लोगों मे सोच-विचार जारी है.....

-संजय ग्रोवर
06-06-2014



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