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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

मुक्ति

लघुव्यंग्यकथा

‘लोग मुझे परेशान करते थे, हर कोई सताता था, पत्थर मारते थे, ग़ालियां देते थे, भगा देते थे, ज़िंदगी बड़ी कठिन थी, जीना दुश्वार था, लंबे संघर्ष के बाद मुझे आखि़रकार एक रास्ता सूझ गया......

‘क्या ?’

‘मैं भी उन्हींमें शामिल हो गया हूं, उनके साथ मिलकर पत्थरमार करता हूं......

‘उन्होंने तुम्हे आसानी से शामिल होने दिया !?’

‘नहीं, पहले उन्होंने जांचा-परखा, जब उन्हें विश्वास हो गया कि मेरी कई आदतें बिलकुल उन्हीं के जैसी हैं, मैं उनके काम का आदमी हूं तो......

‘अब तुम सब मिल-जुलकर किसपर पत्थरमार करते हो, किस-किसपर करोगे ?’

‘उनपर जो हमारे जैसे नहीं हैं, हम उन्हें अपने जैसा बनाकर छोड़ेंगे, सबको हमारे जैसा बनना होगा........... 

अंततः उसने अपनी मुट्ठी खोल दी जिसमें एक तराशा हुआ ठस और ठोस पत्थर मौजूद था।

-संजय ग्रोवर

29-01-2016


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मूवी द ड्रामा

व्यंग्य

फ़िल्म चमत्कारों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खि़लाफ़ है और हिट हुई है। लोग देखकर निकल रहे हैं। आईए, इनसे बातचीत करते हैं कि फ़िल्म ने इनके दिमाग़ों को कितना हिट किया है....

!!!
‘आपसे बात करना चाहेंगे, कैसी लगी फ़िल्म आपको ?’
‘झकास, क्या बनाई है साब, इनका तो जवाब ही नहीं है, गजब।’
‘क्या अच्छा लगा आपको?’
‘अंधविश्वास का बताया है साब, इनमें नहीं पड़ना चाहिए।’
‘अच्छा, ज़रा बताएं कि......
‘हमें ज़रा जल्दी है भाईसाब, रस्ते में मंदिर भी जाना है, हमारा दिखाईएगा ज़रुर, रात को देखेंगे, हम भी अंधविश्वास के खि़लाफ़ हैं, नमस्कार।’

!!!
‘आप तो यंग हैं एकदम, फ़िल्म का मैसेज क्या है?’
‘कमाल का मैसेज है सर, हाउ एंथूज़ियास्टिक! ये जो बाबा लोग हैं सबको उल्लू बनाते हैं, इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, भगवान को सीधे एप्रोच करना चाहिए....’
‘अच्छा अब सीधे एप्रोच करेंगी आप, कैसे करेंगी ?’
‘कैसे !? कैसे मतलब !? हुम्म........पहले मैं सिर्फ़ टेम्पलस् में जाती थी, अब चर्चेज़ और मॉस्क्स् में भी जाऊंगी.....
‘मगर वहां या तो मूर्त्तियां होतीं हैं या मिडलमैन, सीधे तो भगवान कहीं मिलता नहीं......
‘आप टीवी रिपोर्टर हैं !?’
‘हां, क्यों ?’
‘नहीं टीवी रिपोर्टर तो ऐसे सवाल पूछते नहीं, वो तो जनरल सवाल पूछते हैं!’

!!!
‘अच्छा आप साइक़ियाट्रिस्ट हैं, आपके लिए एक खास सवाल है मेरे पास, यह बताईए कि हर बात में सवाल पूछने का मतलब है कि बात-बात में शक करना। मनोचिकित्सा में ज़्यादा शक करना स्क्त्ज़िोफ्रीनिया का एक लक्षण है, नायक को स्कित्ज़ोफ्रीनिक क्यों न माना जाए ?’
‘अजी कैसी बात कर रहे हैं आप ? ऐसे कहीं होता है ? इतने इंटेलीजेंट आदमी ने फ़िल्म बनाई है और....
‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।’
‘देखिए आप फ़िल्म को लाइटली ले रहे हैं.....’
‘चलिए, शुक्रिया, हम किसी और से बात करते हैं, ऐक्सक्यूज़ मी....

!!!
‘जी मैं फिल्म लाइन से ही ताल्लुक रखता हूं, फ्रैश हो गया, फ्री हो गया...’
‘अच्छा अब क्या करेंगे ?’
‘बस पहले तो एक कार्यकंम में जाना है जहां हमारे एक मित्र नास्तिकता पर कविताएं सुनाएंगे, आप भी आईएगा, बड़े सज्जन और धार्मिक व्यक्ति हैं। उसके बाद अम्मा को तीर्थयात्रा पर ले जाने का बोला था, जाकर बस उसीकी तैयारी करता हूं.....
‘अच्छा तो अब आप भी ऐसी कोई फ़िल्म बनाएंगे ?’
‘अर्रे यार.....आप भी.....समझिए कि यह मैंने ही बनाई है....
‘समझ गया।’
!!!

-संजय ग्रोवर

27-12-2014


गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

न्यू कबीर एण्ड संस्

व्यंग्य


यह कल्पना ही दिलचस्प है कि कबीरदास एक राजनीतिक दल के घोषित तौर पर सदस्य हैं। तीन दलों में उनका अच्छा आना-जाना, उठना-बैठना और खाना-पीना है, पांचवे की भी समय-समय पर तारीफ़ कर देते हैं। कमाल एक उद्योगपति के अख़बार में संपादक है,दो-चार लाख़ रु महीने के कमाल दिखा रहा है, लोई अपनी मम्मी के साथ दो एन. जी. ओ. चला रही है। सारा परिवार सारे चैनलों पर बुलाया जाता है, हर जगह छपता-छुपता है।

जो कोई भी उनसे तर्क करता है उसे वे तर्कपूर्ण जवाब देने के बजाय वामपंथी, संघी, हिंदू, मुस्लिम, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई-बसपाई वगैरह सिद्ध करने में जुट जाते हैं। या उससे उसकी पढ़ाई के सर्टीफ़िकेट मांगने लगते हैं। साथ चल रहे अपने असिस्टेंट से अपनी डिग्रियों की फ़ाइल दिखाने को कहते हैं।

कबीरदास पुरस्कार के लिए लॉबीइंग कर रहे हैं।

कबीरदास फ़ेसबुक पर स्टेटस डालने के लिए पार्टी-लाइन, एजेण्डा और मैनीफ़ैस्टो का अध्यन कर रहे हैं।

कबीरदास पत्थरवादियों में शामिल होकर एक अकेले पड़ गए आदमी पर पत्थर मार रहे हैं।

कबीरदास तर्क के नाम पर अफ़वाहें फैला रहे हैं।

कबीरदास ने अपना संगठन बना लिया है और विपरीत विचारों वाले लोगों को ख़त्म करने के लिए उनके आस-पास अपने आदमी प्लांट कर रहे हैं।

कबीरदास अपने वातानुकूलित ऑफ़िस में लंगोटी पहने, लकुटिया संभाले सब कुछ छोड़कर चलने को (फ़िर दोगुनी-चार गुनी ‘उपलब्धियों’ के साथ लौटने को) तैयार बैठे हैं। पीछे शोकेस में विभिन्न अवार्ड और ट्राफ़ियां बिलकुल ऐसे ही सजी हैं जैसे उस संस्कृति के लोगों के यहां सजी हैं जिनके वे कट्टर विरोधी हैं।




और जिसके पास इनमें से कुछ नहीं, वह उनके वातानुकूलित ऑफ़िस में घुसने से डर रहा है। 



वैसे, ऐसे कबीरदास से मिलकर वह करेगा भी क्या ?

-संजय ग्रोवर


05-10-2013

 

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