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गुरुवार, 21 जनवरी 2021

ख़ाली लोग व्यस्त लोग


लोगों को बताया गया कि कुछ न कुछ करते रहो, ख़ाली मत बैठो नही तो


पागल हो जाओगे.

शताब्दियां बीत गई पर लोगों की खोपड़ियों में से यह बात नहीं निकली. 


अब वे भले पागलपन करते रहें पर ख़ाली कभी नहीं बैठते.



-संजय ग्रोवर


सोमवार, 5 अगस्त 2019

दुनियादारी


लघुकथा

कुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।

और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।

अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।

-संजय ग्रोवर

05-08-2019


सोमवार, 6 अगस्त 2018

बच्चे न पैदा करने की सुंदर भावना पर एक निबंध


उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-


1.      बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा वो क्या बच्चा पैदा करेगा ?                        
                             
2.    फिर मैं गधा भी नहीं हूं कि किसी भी गधे का बाप बन जाऊं। जो हमारे पिताजी ने नहीं सोचा वो हम सोच लें तो क्या हर्ज़ है ? सोच के नाम पर हम हमेशा पीछे ही जाते रहेंगे क्या ? 

3.    सिर्फ बाप बनने के लिए दुनिया-भर के गधों से एडजस्ट करना (एक मुहावरे के अनुसार सबको बाप बनाना) मुझे नुकसान में रहना ही लगता है।
                                 
4.    सारी पृथ्वी एक परिवार है, कभी-कभी दूसरों के बच्चों से खेल लेने में हर्ज़ ही क्या है ? मैं तो जब भी घर से निकलता हूं, दूसरों के बच्चों से ही खेलता हूं। घर में अपने पिताजी के बच्चे यानि ख़ुदसे खेलता हूं।

5.     मुझे लगता है कि ‘मैं तो अपना ही बच्चा पैदा करुंगा, दूसरे बच्चों को दूसरे बच्चे ही समझूंगा’ यह घमंडी और स्वार्थी होने की पहचान है।

किसीको आपत्ति ?

-संजय ग्रोवर

04-08-2018


मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मेरी बातों को दे दे रंग नया.....


ग़ज़ल

अक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या है
अपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!

मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!
ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?

पास जिनके रहन है तेरा ज़हन
उनके बारे में सोचता क्या है ?

हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़र
इसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !

हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असली
फिर अदाकारी में रखा क्या है !?

तू भी उनमें ही हो गया शामिल
हमको क्या लेना मामला क्या है

डर है, लालच है या है मजबूरी
तेरे पास और अब नया क्या है ?

हमने तेरा समाज देख लिया
अब भी पूछे है, माफ़िया क्या है !?

वो जो बिलकुल ही हैं तिरे जैसे
तू ही अब उनपे हंस रहा, क्या है!?

जिनका जीवन हो चुटकुले जैसा
उनमें कुछ राज़ ढूंढना! क्या है ?

साफ़ कुछ भी न बोल पाएगा
बच गई है तो बस अदा, क्या है

वो जो करते रहे इधर का उधर
उनके घर जाके ढूंढना क्या है!?

मेरी बातों को दे दे रंग नया
तेरे पास और अब बचा क्या है ?

ख़ुद तो ग़ालिब रहे अकेले-से
नाम पर उनके ये लगा क्या है !?

(माफ़ करना मिर्ज़ा, यह ज़रुरी था)


-संजय ग्रोवर
20-09-2016



शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

मुक्ति

लघुव्यंग्यकथा

‘लोग मुझे परेशान करते थे, हर कोई सताता था, पत्थर मारते थे, ग़ालियां देते थे, भगा देते थे, ज़िंदगी बड़ी कठिन थी, जीना दुश्वार था, लंबे संघर्ष के बाद मुझे आखि़रकार एक रास्ता सूझ गया......

‘क्या ?’

‘मैं भी उन्हींमें शामिल हो गया हूं, उनके साथ मिलकर पत्थरमार करता हूं......

‘उन्होंने तुम्हे आसानी से शामिल होने दिया !?’

‘नहीं, पहले उन्होंने जांचा-परखा, जब उन्हें विश्वास हो गया कि मेरी कई आदतें बिलकुल उन्हीं के जैसी हैं, मैं उनके काम का आदमी हूं तो......

‘अब तुम सब मिल-जुलकर किसपर पत्थरमार करते हो, किस-किसपर करोगे ?’

‘उनपर जो हमारे जैसे नहीं हैं, हम उन्हें अपने जैसा बनाकर छोड़ेंगे, सबको हमारे जैसा बनना होगा........... 

अंततः उसने अपनी मुट्ठी खोल दी जिसमें एक तराशा हुआ ठस और ठोस पत्थर मौजूद था।

-संजय ग्रोवर

29-01-2016


गुरुवार, 30 जुलाई 2015

इतना ही कर दो

लघुव्यंग्य

ईमानदार आदमी रास्ते से निकल रहा था।

चौक पर बेईमान बैठे थे, आदतन छेड़ने लगे-

‘‘भैय्या क्या मिला ईमानदारी से, ईमानदार तो हम कहलाते हैं, रेडियो-टीवी पे बुलाए जाते हैं, अख़बार हमारे गुन गाते हैं, तमग़े हम पर लगाए जाते हैं.....बोलो-बोलो....

‘न मैं टीवी पर आता हूं न अख़बार में, न तो नाम पाता हूं न ईनाम पाता हूं, न तुम पर ध्यान देता हूं न बदनामी पर......फिर भी ईमानदार हूं.....यही मेरी उपलब्धि है, यही मज़ा है.....तुम इतना ही करके दिखा दो !’

ईमानदार आदमी कहते हुए अपने रास्ते निकल गया।

-संजय ग्रोवर
31-07-2015


रविवार, 3 मई 2015

तय करो किधर के बाबा हो

अर्धव्यंग्य

आदमी अपना कोई पक्ष-विपक्ष तय कर ले तो बहुत से झंझटों से मुक्त हो जाता है-जैसे सोच-विचार, तार्किकता, जीवनमूल्य, इंसानियत, संवेदना...

अगर आप पितावादी हैं तो पिता आपसे कहेंगे कि बेटा, ज़रा अपनी मम्मी का सर काट लाओ, और उनकी बात पूरी होने से पहले ही आप मां का सिर प्लेट में सलाद की तरह सजा लाएंगे।

मां का भी छोड़िए, अगर आप गुरुवादी हैं, श्रद्धावादी हैं, आदरवादी हैं तो गुरु के कहने पर अपना ही अंगूठा ऐसे काट लेंगे जैसे आइसक्रीम के स्लाइस बना रहे हों।

वैसे आमतौर पर जो लोग पक्षवादी और प्रतिबद्धतावादी बने घूमते हैं, ध्यान से देखिए तो पाएंगे कि वे अपना पक्ष भी ठीक से तय नहीं कर पाए होते। ये एक ही सांस में न्याय की भी बात करते हैं और दोस्ती निबाहने की भी। ये एक ही बार में ईमानदारी को भी साधना चाहते हैं और दुनियादारी को भी। इन अजूबों के क़रतब इन्हींके जैसे लोगों को भाते भी बहुत हैं। मगर सवाल यह है कि अगर आपका दोस्त ही बेईमान है तो या तो आप दोस्त के साथ खड़े हो सकते हैं या न्याय के। अगर आपकी ख़ुदकी ही कोई दिलचस्पी ईमानदारी में नहीं है तो आप अपने किसी ईमानदार रिश्तेदार का साथ पूरे मन से नहीं दे सकते। पहले आप ख़ुद तो तय करलें कि आप न्याय के पक्ष में हैं या रिश्तेदारी के, ईमानदारी को प्राथमिकता देंगे कि दुनियादारी को! जब आप ख़ुद तय कर लेंगे तो दूसरों से भी तय करवा लीजिएगा।

वरना पक्ष तो उन लोगों का भी तय था जिन्होंने सामूहिक बलात्कार की शिकार, गांव-भर में बहिष्कृत भंवरीदेवी नामक स्त्री से कहा कि तुम्हारे आरोपी बलात्कार कर ही नहीं सकते क्योंकि वे तो ऊंची(!) जाति के हैं। भैया कहीं इसी तरह के कट्टर पक्षधर न बन जाना। कहीं बिना दाढ़ी और बिना चोगेवाले बाबा न बन जाना जो सूट-बूट और टाई लगाकर कथित पिछड़ी जातियों को न्याय के नाम पर ‘श्राप’नुमां चीज़ें ‘प्रोवाइड’ कराते रहते हैं।

यूं भी आजकल पैकिंग की कला इतनी इम्प्रूव हो गई है कि पूछिए ही मत। पैकिंग प्रगतिशीलता की होती है, निकलता अंदर से बाबा है। पैकिंग एडुकेटेड की रहती है, निकलता फिर भी बाबा है। पैकिंग सूटेड-बूटेड रहती है, बरामद फिर बाबा होता है। पैकिंग डिबेटर की चढ़ी है, निकल रहा है फिर-फिर बाबा। पैकिंग लैक्चरर की है, प्रोफ़ेसर की है, एंकर की है, इंजीनियर की है, डॉक्टर की है, पीसीएस की है, आईएएस की है...और निकल रहें हैं बाबा ही बाबा।

ऐसे में तय क्या करें? यही कि अपने अंदरवाले बाबा पर पैकिंग कौन-से वाले पक्ष की चढ़ानी है?

-संजय ग्रोवर
03-05-2015


शनिवार, 25 अप्रैल 2015

सोडा

लघुकथा

लगता था उसकी बाइक में ब्रेक ही नहीं हैं।

पहली रेडलाइट वह बिना सिगनल की परवाह किए क्रॉस कर गया।

दूसरी पर दो बार तथाकथित राष्ट्रपिता को क़ुर्बान किया।

फ़िर तीसरी, चौथी, पांचवीं.......

पर इसबार उससे पहले शायद उसके (अफ़साने नहीं) बाइक के नंबर पहुंच गए थे-

‘क्या बात है भई, सांड की तरह क्यों भगा रहा है, लाइमलाइट में आना है क्या ?’

‘अरे! आपको कैसे पता चला ? मैंने तो घर पर भी नहीं बताया!’

‘अरे, हमें ना पता चलेगा! कौन-सा लाइम लाइट वाला है जो हमारी नज़रों से नहीं ग़ुज़रा। चल ढीला हो और निकल्ले। बाद में तो पहचानेगा भी नहीं।’


*                                    *                                      *                                         ’                                  ’

‘अरे के हो गया द्रोगाजी?’

‘तुम्हे बड़ी जल्दी पड़ी है सब जानने की! तसल्ली रक्खो, उसे लाइम लाइट में पहुंचने दो, फिर देखना इससे भी बढ़िया सरकस दिखाएगा। चलो निकलो, काम करने दो।’

-संजय ग्रोवर
26-04-2015

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

हवा में कलंडर

व्यंग्य

मुझे कलंडर टाइप के ‘विचारक’ काफ़ी पसंद आते हैं।

वे वॉल पर लटके-लटके बताते हैं कि आज किसकी पुण्यतिथि है, आज किसका जन्मदिन है, किसकी आज शादी हुई थी, पिछले साल इसी दिन किसके यहां कीर्तन हुआ था, किसने किस दिन तौलिया ख़रीदा था, किसने कितने बजे ऑमलेट खाया था, किस पेड़ के नीचे अंडे दिए थे। ये बड़े दिलचस्प  लोग होते हैं, भगतसिंह का जन्मदिन हो तो उन्हींके एक लेख में से चार लाइनें उठाकर कोट कर देते हैं। जैसे आप किसीके जन्मदिन पर उसीकी जेब काटकर गिफ़्ट ख़रीदें, और उसको ऐसे भाव से भेंट करें जैसे अपनी कमाई से ख़रीदकर लाएं हों।

इनमें से कईयों को प्रगतिशील कहाने का बड़ा शौक़ रहता है। ऐसे में उक्त अदा बहुत काम आती है। किसी प्रगतिशील विचारक के विचार उठाकर, अपने नाम से, बड़ी अदा के साथ उसीके मुंह पर मारे जा सकते हैं, बिलकुल ऐसे जैसे मानों ख़ुद प्रगतिशील हों और ख़ुद ही चिंतन किया हो। कई बार इन्हें यह तक ध्यान नहीं रहता कि दो दिन पहले इन्हीं विचारों का ‘ख़ुलकर’ विरोध किया था। यह बहुत आसान हो जाता है जब आपके पीछे कई-कई जातियों, दलों, गुटों, धर्मों की भेड़ें तालियां बजाने को तत्पर और तैनात हों। यह अलग बात है कि बिना परंपरा के ये प्रगतिशीलता की बात तक करने में अक्षम होते हैं। जिस दिन प्रगतिशीलता की खुजली ज़्यादा उठे, ये पहले जाकर अपनी क़िताब खोलकर ढूंढते हैं कि हमारी परंपरा में प्रगतिशीलता है या नहीं। सोचने की बात यह है कि इनकी परंपरा में प्रगतिशीलता का शौक़ीन जो पहला आदमी रहा होगा उसने कौन-सी परंपरा में से ढूंढकर प्रगतिशीलता निकाली होगी।

शौक़ीन प्रगतिशीलता हमेशा किसी नक़ली और कमज़ोर कट्टरपंथ की तलाश करती है, क्योंकि उसीकी तुलना में इसकी प्रगतिशीलता संभव हो पाती है। इनकी प्रगतिशीलता का आधार यह होता है कि ‘देख तू सात मंदिरों में गया, मैं छै में गया इसलिए मैं प्रगतिशील हूं। तू देसी लेखकों को चुराता है, मैं विदेशी को चुराता हूं इसलिए मैं प्रगतिशील हूं। अगर देसी को चुराता भी हूं तो उसीपर ऐसा हमला करता हूं जैसे मैं कोई बहुत बहादुर आदमी हूं। दरअसल तो तू भी जानता है कि जिनकी वजह से यहां कट्टरपंथ जड़े जमाए बैठा है, उनका हाथ मुझपर न होता तो नक़ली प्रगतिशीलता साधने में भी मेरा पाजामा ढीला हो जाता है।’

अपने यहां काम का बड़ा महत्व है। क्या पता कब किससे काम पड़ जाए, किसका ‘आर्शीवाद’ काम आ जाए। क्या पता कलको तौलिया ही बड़ा(!) आदमी(!) बन जाए! बुढ़ापे में काम आएगा कि नहीं। वैसे भी धर्म, वाद और धाराएं ज़्यादातर को तो बचपन में ही बूढा बना देतीं हैं। बचे-ख़ुचों का काम तथाकथित जवानी में कर डालतीं हैं।
वैसे भी अपने यहां मरे हुओं की आलोचना बुरी बात मानी जाती है। यहां प्रसिद्ध लोगों की बुराई भी हर कोई नहीं करता। प्रसिद्ध लोग बड़़े लोग भी तो होते हैं। इनका लठैत बनने का अपना एक सुख है। ऐसा लगता है जैसे सचमुच कोई क्रांति हो रही हो। क्रांति की भ्रांति में न जाने कितनों का जीवन सार्थक हो गया वरना तो कैसा सूना-सूना सा लगता था।

बहरहाल, फ़ोटोकॉपी मशीनों की धड़ाधड़ प्रगतिशीलता में कलंडरों की आमद जारी है। आप भी कोई दुकान चुन सकते हैं जिसपर लगा साइन बोर्ड प्रगतिशीलता का भ्रम देता हो। फिर आपको प्रगतिशीलता पर विचार तक करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी। आप जो भी करेंगे वही प्रगतिशीलता माना जाएगा। यहां तक कि जिसे आप ही फ़ासीवाद कह रहे होंगे उसीसे टॉफ़ी ले लेके खाते रहेंगे, उसे भी प्रगतिशीलता माना जाएगा।

कोई इसे गुंडाग़र्दी, दादागिरी, मौक़ापरस्ती या तानाशाही कहता है तो कहता रहे। आप सुनिए ही मत, ढीठ बने रहिए। उल्टे उसे डांट दीजिए जो ऐसा नहीं करता।

बेईमानों के ‘स्वर्ग’ में इसीको संघर्ष कहते हैं।


-संजय ग्रोवर

24-04-2015


बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कमबैक

व्यंग्य

लड़का लड़की को चाहता है।

एक रास्ता तो यह है कि वह यह बात उससे सीधे ही कह दे।

लेकिन वह फ़िल्में बहुत देखता है। कुछ स्पेशल होना चाहिए, वरना लड़की भी उसे क्यों भाव देगी ? दिखना चाहिए कि वह अपनी दोस्त-मंडली का हीरो है।

वह एक दोस्त को राज़ी करता है-लड़की जब सुनसान गली से गुज़रेगी, तू उसे थोड़ा-सा छेड़ देना, मैं तुझे एकाध थप्पड़ मारकर उसे बचा लूंगा।

अहसानों से दबा, परिभाषाओं में पका, परंपराओं में पगा दोस्त, दोस्ती की ख़ातिर राज़ी होता है।

यहां तक की कहानी का आइडिया शायद कई लोगों को है, इसमें कुछ नया है भी नहीं।

नया यह होता है कि थप्पड़ कुछ ज़ोर से लग जाता है और दबे हुए दोस्त के भीतर सोए इंसान का ईमान और स्वाभिमान जाग उठता है-

वह बदले में और ज़ोर से दो जड़ देता है।

यह तो इस लड़के ने सोचा ही नहीं था, अब क्या हो !?

वह लड़का शरीर से तगड़ा है, इसने अगर चार मारे तो मामला बहुत बिगड़ जाएगा।

और कुछ समझाने की कोशिश की तो लड़की को भी सब पता लग जाएगा-

आगे क्या होगा ? क्या उसका कमबैक हो पाएगा ? या लड़की समझ जाएगी और दोस्त की तरफ़ झुक जाएगी ? या दोनों को गुडबाय कहेगी और तीसरे और चौथे से भी बचेगी जब तक ख़ुदको और दुनिया को ठीक से जान न ले ?

आप क़यास लगाईए, मुझे तो मालूम है।

-संजय ग्रोवर
25-02-2015


रविवार, 8 फ़रवरी 2015

किसने कहा कि मतदान मत करना !

व्यंग्य

हर बार ही होता है कि चारों तरफ़ से मानो आकाशवाणी-सी होने लगती है कि भाईओ, बहिनो, दोस्तो, मित्रों, व्यूअर्स एण्ड फ्रेंड्स्.....मतदान ज़रुर करना, यह आपका राष्ट्रीय कर्त्तव्य है, मतदान नहीं करेंगे तो आप जागरुक नहीं हैं, आप गद्दार हैं, आपको शिक़ायत करने का हक़ नहीं है। एक आदमी 104 साल का होकर भी मतदान करने आया, एक महिला बीमार थी किसीकी पीठ पर लटककर मतदान करने आई.....और आप हैं कि.......

अरे टीवी वाले भैया, ऐंकर दीदी, ऐसे न लताड़ो कि मतदान न करनेवाला इतना अपराधबोध महसूस करने लगे कि टीवी के नीचे सर देकर आत्महत्या कर ले। हमें क्या मालूम कि मतदान में क्या-क्या जादू है, किस टाइप की मेहनत है ? जब तुम कहते हो कहते हो कि लोग ड्राइंगरुम से बाहर नहीं निकलते तो मुझे लगने लगता है जैसे मतदान करने के लिए रास्ते में दस-पांच पहाड़ चढ़ने पड़ते होंगे, नदी में उतरना पड़ता होगा, मल्लयुद्ध करना पड़ता होगा.....। बुरा न मानना, कई बार मतदान करने गया हूं, सब्ज़ी ख़रीदने जितनी मेहनत भी नहीं लगती।

भैया जी, दीदी जी, अगर कोई सारे टैक्स देता है, सारे बिल ठीक से भरता है, किसीकी ज़मीन नहीं घेरता, लड़की नहीं छेड़ता, दहेज़ नहीं लेता, बलात्कार नहीं करता.....कोई काम नियम और क़ानून के खि़लाफ़ नहीं करता तो वोट न देने भर से वो मरने के क़ाबिल हो जाएगा क्या !? और वोट देना इतना ही महान काम है तो ये ‘राइट टू रिजेक्ट’ वाला आयटम क्यों निकाला है भाई !? अगर कोई घर बैठे ही रिजेक्ट कर सकता है तो वो बेचारा सिर्फ़ आपका कैमरा भरने के लिए अपना काम छोड़कर यह भरती की ड्यूटी करे ?

जितना पढ़ते हो, उसका एकाध प्रतिशत वक़्त सोचने में भी लगाया करो, यार! यूंही डराते रहते हो।

एक आदमी अगर बैंक में फ़ॉर्म 15 जी ठीक से भरके आता है और फिर भी बार-बार उसका टैक्स काट लिया जाता है तो वो सिर्फ़ इसलिए शिक़ायत न करे कि उसने वोट नहीं दिया था!? कोई नागरिक अगर बिजली का बिल पूरी ईमानदारी से भरता है और फ़िर भी उसका बिल ज़्यादा आता है या वोल्टेज़ अप-डाउन होने से आए दिन उसको नुकसान होता हो तो शिकायत करने के लिए उसका बिल भरना काफ़ी नहीं है क्या ? अगर आप वोट देने को आधार बनाएंगे तो कलको आप यह भी कह सकते हैं कि जिस पार्टी को वोट दिया था उसीके पास जाकर शिक़ायत करो। तभी तो यह होता है कि बिल न भरनेवाले भी ‘अपनी पार्टी’ के जीतने से ख़ुश होते हैं। बहुत-से लोगों के ‘पक्ष’ और ‘विचारधारा’ का आधार तो यही बन गया लगता है, ऊपर-ऊपर वे कुछ भी कहें।

किस टाइप के लोग हो तुम यार !?

और जिन्होंने वोट दिया हो वो कुछ भी करें !? टैक्स चुराएं, बिल न दें, दहेज़ लें, आयकनों, सेलेब्रिटियों की उल्टी-सीधी बातों पर हां-हां करें, मूढ़ हिलाएं, अंट-संट कुछ भी करें! वोट देते ही सब सही हो जाएगा !? इधर सेल्फ़ी लगी नहीं कि उधर आदमी महान हुआ नहीं! वो दो मिनट आदमी की 5 साल की ज़िंदग़ी का फ़ैसला करेंगे।

माफ़ करना, हमें ऐसी अतार्किक बातें किसीकी भी समझ में नहीं आतीं। मेरी बात मानो, कपड़े-वपड़े, टाई-स्कीवी पहनना अच्छा है, होंठों को ख़ास ढंग से मुड़न-घुमन देकर उच्चारण करने में भी बुराई नहीं, अच्छा समझ में आता है, पर दिन में पांच मिनट सोचने के लिए भी निकाला करो तो कोई फांसी पर नहीं लटका देगा।

बुरा मत मानना ज़्यादा पक जाता हूं तो कभी-कभी थोड़ा टपक जाता हूं।

-संजय ग्रोवर
08-02-2015


रविवार, 18 जनवरी 2015

बजने का बजना



(एक काल्पनिक व्यंग्यात्मक बातचील)

घंटी बजती है।

दरवाज़ा खुलता है।

सामने एक ऐसी चेहरा दिखाई देता है जिसे संभ्रांत और सौम्य वगैरहा कहा जाता है। साथ में रंग-बिरंगे कपड़े पहने लोगों का हुजूम है, सरों पर टोपियां, हाथों में पैम्फ़लेट आदि हैं। कई युवा हैं।

‘जी कहिए !’

‘दरवाज़ा खोलिए, हम ज़रा आपको समझाने आए हैं....’

‘जी ज़रुर समझाईए...’

‘देखिए यह बहुत अच्छा वक़्त आया है कुछ करने का, ईश्वर ने यह दिन दिखाया है कि हम अपने वतन के लिए कुछ करें, आप हमारा समर्थन करें, हम मिलकर काम करेंगे....’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है कि हम मिलकर काम करें. मगर लगता है आपको यह ख़्याल किसी ईश्वर की वजह से आया है...मैं भी उस ईश्वर से मिलना चाहूंगा जिसने आपको इतना अच्छा ख़्याल दिया है....वह आपके साथ आया होगा.....’

‘आप कैसी बातें कर रहे हैं, ईश्वर क्या किसीके साथ आता है......’

‘कमाल है! कल भी एक भाईसाहब आए थे और ख़ुदको ईश्वर का आदमी बताकर समर्थन मांग रहे थे, ईश्वर उनके साथ भी नहीं था....!

‘देखिए, हमारे पास बहुत वक्त नहीं है, ईश्वर इस तरह साथ नहीं आता.....’

‘आप मुझे समझाने आए हैं, ज़रा ठीक से समझाईए, मैं समझने को तैयार हूं, आप थोड़ा वक़्त निकालकर समझाईए कि ईश्वर किस तरह आपके साथ है, अगर आपके साथ है भी सही तो मैं आपका साथ क्यों दूं ? मैं तो किसी ईश्वर को जानता नहीं, कभी मिला नहीं। मिला भी होता तो भी मैं जान-पहचान-जुगाड़ को योग्यता नहीं मानता।’

‘ईश्वर की इ़च्छा है कि हम मिलकर काम करें, ईश्वर के बारे में जिस तरह आप सोच रहे हैं उस तरह नहीं सोचा जाता.....’

‘आपसे किसने कहा कि मैं ईश्वर के बारे में सोचता हूं, मुझे जब ज़रुरत होती है काम कर लेता हूं, ईश्वर से क्या लेना !? आप समझााईए कि अगर आपको लड़ने के लिए किसी ईश्वर ने भेजा है तो बाक़ी लोगों को किसने भेजा है ? ईश्वर क्या कोई चरित्र प्रमाण पत्र है ? कोई डिग्री है ? कोई अनुभव है ? कोई योग्यता है ? क्या है आखि़र ?’

‘देखिए, ऐसे हम एक-एक आदमी को समझाने लगे तो बहुत मुश्क़िल हो जाएगी.....ऐसे कैसे चल पाएगा.......’

‘आप एक को तो समझाईए, बाक़ी भी समझ जाएंगे। आप मुझे बस इतना साबित कर दीजिए कि आपको इस काम के लिए ईश्वर ने चुना है, हांलांकि मैं इसे कोई योग्यता नहीं मानता, मैं तो ऐसे व्यक्ति को बेहतर मानता हूं जो अपनी मरज़ी से आया हो.....चलिए आप इतना ही बता दीजिए कि आपसे पहले जो लोग थे उन्हें किसने भेजा था........’

‘देखिए, ये सब बातें हम बाद में भी कर सकते हैं.......वैसे आप करते क्या हैं ?’

‘आपको काफ़ी देर से यह ख़्याल आया! मैं जब जो ठीक लगे कर लेता हूं, वह कुछ भी जिससे दूसरों की हानि न हो......’

‘हुम्म......फ़िर तो आपको ईश्वर समझाना मुश्क़िल है......’

‘क्या आपको क़ानून की जानकारी है, न्याय का आयडिया है, इंसानियत का अंदाज़ा है ?

‘मतलब ?’

‘क्या आपको मालूम है कि आप जिस ईश्वर का हवाला देकर समर्थन मांग रहे हैं, उसे आप अगर साबित न कर पाएं तो आपका यह कृत्य धोखाधड़ी की श्रेणी में आएगा, इसके लिए सज़ा भी हो सकती है? क्या आपको मालूम है कि महिलाओं की जितनी समस्याएं हैं, सबकी जड़ में ऐसी क़िताबें और मान्यताएं हैं जिन्हें किसी ईश्वर द्धारा लिखा या चलाया बताया जाता है......आप तो स्वयं.....

‘ओफ्फ़ोह! आप तो भाईसाहब.....ग़लती हो गई कि आपकी घंटी बजा दी.....’

‘जी, मैं अजीब आदमी हूं, मुझे लगता है सभी को थोड़ा-थोड़ा अजीब होना चाहिए क्योंकि अपने यहां घंटियां अकसर ग़लत लोग बजाते रहे हैं, थोड़ा घंटिया बजाने वालों को भी बजाना ज़रुरी है कि नहीं, आप ही समझाईए, वरना तो जिसके भी हाथ घंटी लग जाएगी वही न्यायकर्त्ता बनके बैठ जाएगा। आप समझाईए कि क्या यही नहीं होता आ रहा? क्या यही नहीं होता चला जा रहा ?’

‘जी......’

‘जी, अगली बार अगर आप बिना ईश्वर का हवाला दिए आ सकें तो ज़रुर घंटी बजाईएगा, धन्यवाद। इसलिए भी धन्यवाद कि आप घंटी बजाकर रुके रहे वरना बहुत-से तो घंटी बजाकर भाग ही जाते हैं। धन्यवाद।’

(यह सब काल्पनिक है, किसी जीवित व्यक्ति का किसी मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है)

-संजय ग्रोवर

18-01-2015

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मूवी द ड्रामा

व्यंग्य

फ़िल्म चमत्कारों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खि़लाफ़ है और हिट हुई है। लोग देखकर निकल रहे हैं। आईए, इनसे बातचीत करते हैं कि फ़िल्म ने इनके दिमाग़ों को कितना हिट किया है....

!!!
‘आपसे बात करना चाहेंगे, कैसी लगी फ़िल्म आपको ?’
‘झकास, क्या बनाई है साब, इनका तो जवाब ही नहीं है, गजब।’
‘क्या अच्छा लगा आपको?’
‘अंधविश्वास का बताया है साब, इनमें नहीं पड़ना चाहिए।’
‘अच्छा, ज़रा बताएं कि......
‘हमें ज़रा जल्दी है भाईसाब, रस्ते में मंदिर भी जाना है, हमारा दिखाईएगा ज़रुर, रात को देखेंगे, हम भी अंधविश्वास के खि़लाफ़ हैं, नमस्कार।’

!!!
‘आप तो यंग हैं एकदम, फ़िल्म का मैसेज क्या है?’
‘कमाल का मैसेज है सर, हाउ एंथूज़ियास्टिक! ये जो बाबा लोग हैं सबको उल्लू बनाते हैं, इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, भगवान को सीधे एप्रोच करना चाहिए....’
‘अच्छा अब सीधे एप्रोच करेंगी आप, कैसे करेंगी ?’
‘कैसे !? कैसे मतलब !? हुम्म........पहले मैं सिर्फ़ टेम्पलस् में जाती थी, अब चर्चेज़ और मॉस्क्स् में भी जाऊंगी.....
‘मगर वहां या तो मूर्त्तियां होतीं हैं या मिडलमैन, सीधे तो भगवान कहीं मिलता नहीं......
‘आप टीवी रिपोर्टर हैं !?’
‘हां, क्यों ?’
‘नहीं टीवी रिपोर्टर तो ऐसे सवाल पूछते नहीं, वो तो जनरल सवाल पूछते हैं!’

!!!
‘अच्छा आप साइक़ियाट्रिस्ट हैं, आपके लिए एक खास सवाल है मेरे पास, यह बताईए कि हर बात में सवाल पूछने का मतलब है कि बात-बात में शक करना। मनोचिकित्सा में ज़्यादा शक करना स्क्त्ज़िोफ्रीनिया का एक लक्षण है, नायक को स्कित्ज़ोफ्रीनिक क्यों न माना जाए ?’
‘अजी कैसी बात कर रहे हैं आप ? ऐसे कहीं होता है ? इतने इंटेलीजेंट आदमी ने फ़िल्म बनाई है और....
‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।’
‘देखिए आप फ़िल्म को लाइटली ले रहे हैं.....’
‘चलिए, शुक्रिया, हम किसी और से बात करते हैं, ऐक्सक्यूज़ मी....

!!!
‘जी मैं फिल्म लाइन से ही ताल्लुक रखता हूं, फ्रैश हो गया, फ्री हो गया...’
‘अच्छा अब क्या करेंगे ?’
‘बस पहले तो एक कार्यकंम में जाना है जहां हमारे एक मित्र नास्तिकता पर कविताएं सुनाएंगे, आप भी आईएगा, बड़े सज्जन और धार्मिक व्यक्ति हैं। उसके बाद अम्मा को तीर्थयात्रा पर ले जाने का बोला था, जाकर बस उसीकी तैयारी करता हूं.....
‘अच्छा तो अब आप भी ऐसी कोई फ़िल्म बनाएंगे ?’
‘अर्रे यार.....आप भी.....समझिए कि यह मैंने ही बनाई है....
‘समझ गया।’
!!!

-संजय ग्रोवर

27-12-2014


रविवार, 16 नवंबर 2014

क्रांति-3


‘तपाड़!’ एक थप्पड़ उसने सामने खड़े आदमी को जमाया।

थप्पड़ ज़ोरदार था। वह हिल गया।

‘तड़ाक! तड़ाक!’ बदले मे उसने दो जड़ दिए।

यह भी गिरते-गिरते बचा।

लेकिन संभलते ही इसने तीन और दे मारे।

उधर से चार और पड़े और भीड़ बढ़ने लगी।

‘तपाड़! तपाड़! तपाड़! तपाड़! तपाड़!’

‘तड़ाक! तड़का! तड़ाक! तड़ाक! तड़ाक! तड़ाक!’

भीड़ बढ़ती जा रही थी।

दोनों एक-दूसरे को मारते-मारते बेदम हो गए।

अंततः गिर पड़े।

भीड़ ने माला-वाला पहनाईं, प्रशंसा वगैरह की, नारे लगाए, उनकी 'उच्चता' और 'भव्यता' को सलाम किया। और कल फिर तमाशा देखने की आस में विदा हो गई।

*

दोनों उठे।

‘ज़्यादा तो नहीं लगी ?’ एक ने दूसरे के गालों को सहलाया।

‘नहीं नहीं, इतना तो चलता है।’ दूसरे ने पहले के सर पर हाथ फ़िराया, ‘भीड़ तो अच्छी जमा हो गई यार!’

‘हां, और तारीफ़ भी ख़ूब मिली, लगता है अच्छा चलेगा!’

‘क्यों नहीं चलेगा, चलता ही आया है....’

*

इनमें से एक मंच का जुगाड़ू था दूसरा पत्र-पत्रिकाओं का। दोनों एक ही मानस के पुत्र थे और आजकल सोशल मीडिया पर माहौल अपने अनुकूल बनाने की कोशिश कर रहे थे।

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 11 नवंबर 2014

क्रांति-2

व्यंग्य


तथाकथित प्रगतिशील, कट्टरपंथी को ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गया, पर कट्टरपंथी था कि कहीं मिल नहीं रहा था।

तथाकथित प्रगतिशील उससे दो-दो हाथ करने को आतुर था, बेताब था, उत्तेजित था मगर कट्टरपंथी था कि सामने नहीं आ रहा था। पत्रकार, रिपोर्टर सब लाइव टेलिकास्ट के लिए तैयार बैठे थे मगर कट्टरपंथी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।

दिखाई पड़ता भी कैसे, वो तो उन्हींके अंदर छुपा बैठा था।

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 30 सितंबर 2014

ठेस का मरीज़

व्यंग्य


डॉक्टर: हां आप बताईए, आपको क्या हुआ है ?

मरीज़: जी मुझे ठेस लगी है।

डॉक्टर: कहां लगी है ?

मरीज़: सर मेरी भावनाओं को चोट पहुंची है।

डॉक्टर: भावनाओं को........! अच्छा अच्छा, आप तो पिछले सप्ताह भी दो-तीन बार आए थे न ? मैंने आपको ताक़त के कैप्स्यूल दिए थे....

मरीज़: सर कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा.....

डॉक्टर: हुम्म्म्म्म्म्म, लगता है कमज़ोरी ज़्यादा है। इतनी जल्दी-जल्दी आपकी भावनाओं को चोट पहुंचती रहती है, थोड़ा इन्हें कवर करके रखा करें, थोड़ा मजबूत बनें, ऐसे कैसे काम चलेगा ?

मरीज़: सर वो तो हो नहीं पा रहा.....

डॉक्टर: तो ऐसा कीजिए, लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दीजिए, दो-चार साल घर पर आराम कीजिए। देखिए, देश में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में सबको अपने विचार प्रकट करने का हक़ होता है। आपको शायद लोकतंत्र सूट नहीं करता इसलिए बार-बार बीमार पड़ जाते हैं....

मरीज़: तो सर कोई एंटी-लोकतंत्र दवा नहीं है क्या ?

डॉक्टर: है तो सही पर अभी स्टॉक में नहीं है, ठेस के मरीज़ बहुत हैं न, इसलिए ख़पत बहुत है, बाहर ही बाहर मार्केट से ब्लैक में ख़रीद लेते हैं....

मरीज़: तो अब मैं क्या करुं सर ?

डॉक्टर: आप ऐसा करें, अंदर मनोचिकित्सक बैठते हैं, उनके पास चले जाईए.....

मरीज़: वे क्या करेंगे ?

डॉक्टर: वे सिर्फ़ वही बातें करेंगे जो आपको पसंद हैं। आप कोई बात करेंगे तो वे सिर्फ़ हां में हां मिलाएंगे, चाहे
उन्हें कुछ समझ में आए न आए....बाद में प्रति घंटा के हिसाब से फ़ीस ले लेंगे.....

मरीज़: यह अच्छा आयडिया दिया सर आपने.......मैं तो अंदर जाता हूं....

-संजय ग्रोवर
30-09-2014


शनिवार, 13 सितंबर 2014

टॉफ़ियां

छोटी कहानी

जब देखता आ रस रस प्रसाद, वाम चंदर, कानू ग्रेस वगैरह को लड़ते ही देखता। उस दिन भी लड़ ही रहे थे, मगर आज मेरा ध्यान एक ख़ास बात पर चला गया-

‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’

तीनों बच्चे एक-दूसरे के कपड़े खींच-खींचकर यह कॉमन सवाल ज़ोर देकर पूछ रहे थे।

मुझे भी उस दिन पता नहीं क्या सूझी,
‘सुनो, तुम्हारी मम्मी का नाम क्या है?’, मैंने पूछ डाला।

‘गीता देवी’, आ रस रस प्रसाद ने कहा।
‘सुश्री गीता‘, वाम चंदर ने बताया।
‘मिसेज़ गीता’, कानू ग्रेस ने बताया।

मैं समझ गया कि बच्चों के टाइमपास को मैंने सीरियसली ले लिया है।

‘ये लो, टॉफ़ी लो, और प्लीज़ यह कपड़ाफ़ाड़ रिहर्सल किसी दूसरे पार्क में किया करो, यहां के लोग भोले हैं, सच्ची घटना समझकर सीरियस हो जाते हैं’, मैंने उन्हें टॉफ़ियां पकड़ाते हुए कहा।

‘रिश्वत दे रहे हो क्या अंकल ?’

‘नहीं नहीं, रिश्वत नहीं है, अवार्ड है।’

‘अच्छा फ़िर ठीक है, मम्मी ने कहा था रिश्वत बिलकुल मत लेना’, टॉफ़ियां छीलते हुए तीनों दूसरे पार्क की ओर चल दिए।

-संजय ग्रोवर
13-09-2014

सोमवार, 5 मई 2014

चमचे

चित्र गूगल के सौजन्य से

ये नाज़ुक कमर पर से ख़मदार चमचे
कि बख़्शा गया जिनको शौक़े-बधाई
है घुटनों में झन्कार सरमाया इनका
बेमतलब अहंकार इनकी कमाई

न आराम शब को न राहत सवेरे
दिखे मस्लहत बस लगाते हैं फेरे
लगे जिस घड़ी इनको मन सूना-सूना
लगा दें ये इक-दूसरे को भी चूना
ये हर एक को वायदा देने वाले
ये हर एक से फ़ायदा लेनेवाले

लचीली कमरवाले गर सर उठाएं
तो डर है न इनकी कमर टूट जाए
अगर ये किसी दिन अंगीठी पे उबलें
तो शायद जुदा शक़्ल ही लेके निकलें

कोई इनको इंसान के गुर सिखा दे
कोई इनकी पीछे की डंडी गिरा दे
-संजय ग्रोवर
05-02-2014
(साहब फ़ैज़ साहब से दुष्प्रेरित)

शुक्रवार, 2 मई 2014

परिवार संस्था का तात्कालिक महत्व

व्यंग्य

परिवार संस्था का अपने यहां बड़ा महत्व है। यह धूप में छाते की तरह होता है। छाते भी अपने यहां दो तरह के तनते आए हैं-एक काला और दूसरा रंगीन। हांलांकि काला अपने यहां बुराईयों और रंगीन, रंगीनियों का प्रतीक होता है। पर प्रगतिशीलता का अपने यहां पहला अर्थ है अवसरवादिता। तो हम प्रतीकों की अदला-बदली करके प्रगतिशील होते रहते हैं। और आखि़री मतलब है मौक़ापरस्ती। तो भी हम प्रतीकों की अदला-बदली करके प्रगतिशील होते रहते हैं। यहां आप चाहो तो अदला-बदली की जगह बदला-अदली लिख लो। इससे आपको पता लगेगा हममें और उनमें बड़ा बुनियादी और बेसिक फ़र्क हैं।

परिवार नाम का छाता आपकी कमियों को ढंक लेता है, यही इसकी ख़ूबी है। दूसरी ख़ूबी यह है कि कमियों को बख़ूबी, ख़ूबियां बना देता है। आपको भी अनुभव होगा किसीसे पूछो कि यार तुम एक ही चीज़ के किसीसे पांच सौ रुपए और किसीसे पांच हज़ार कैसे ले लेते हो? कोई ईमान-धरम है कि नहीं तुम्हारा ? वह तुरंत कहता है कि  स्सा....तेरे तो बीवी-बच्चे हैं नहीं, तू क्या जाने परिवार कैसे चलता है। आप हड़बड़ा जाते हो, अपराधबोध में गढ़ जाते हो, कॉन्फ़िडेंस लूज़ कर जाते हो। इस तरह परिवार कमाई के रंगारंग तरीकों को जस्टीफ़ाई करता है, संबल देता है, कंबल भी देता है, मोराल देता है, मॉरल सपोर्ट देता है।

परिवार का महत्व इसीसे पता चलता है कि जिन्हें लोग आवारा, शोहदा, लुच्चा, लंपट, गुंडा और पता नहीं क्या-क्या कहतें हैं, वे सब भी अकसर घोषित परिवारों की पैदाइश होते हैं। फ़र्क बस इतना ही होता है कि जो गुंडे आगे भी अपनी गुंडागर्दी प्रतिष्ठा और इज़्ज़त के साथ जारी रखना चाहते हैं वे परिवार बसाना बेहतर समझते हैं। वैसे आजकल ग़ैरपारिवारिक गुंडो को भी थोड़ी-बहुत मान्यता मिलने लगी है। इससे मामला थोड़ा-बहुत ऑप्शनल हुआ है। अकसर कहा जाता है कि घर की बात घर में रहे तो अच्छा है। इसलिए समझदार लोग जिस व्यक्ति से संबंधित बात को घर में ही रखना चाहते हैं उस व्यक्ति को ही घर में रख लेते हैं यानि कि उससे घरेलू रिश्ते डेवलप कर लेते हैं।

यूं तो हमारा सारा देश ही एक परिवार की तरह है।

-संजय ग्रोवर

02-05-2014


बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सादगी और भौंपू

लघुकथा


सादगी ने निर्णय लिया कि वह ख़ुले मैदान में नृत्य करेगी।

भौंपू बजने लगे।

लोगों ने तालियां बजाईं। लोगों का तो आपको मालूम ही है। कभी न कभी आप भी लोग रहे होंगे। हो सकता है अभी भी हों।

लोग जैसे सोचने के लिए कम और श्रद्धा करने के लिए ज़्यादा पैदा हुए हैं।

लेकिन लोगों में कुछ पागल भी होते हैं। एक ने कहा कि इसमें तो दस-बीस गुना ख़र्चा ज़्यादा होगा, पचास गुना भी हो सकता है। सुरक्षा की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। उसमें भी अच्छा-ख़ासा ख़र्चा आएगा। यह तो एक रस्मी नृत्य है, न भी किया जाए तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इससे सिर्फ़ आपकी सादगी का प्रचार होगा। सादगी के प्रचार पर इतना ख़र्च आ जाए तो उसे सादगी क्यों माना जाए.......

पागल अभी बोल ही रहा था कि भोंपू ज़ोर-ज़ोर से बजने लगे। पागल की आवाज़ भोंपुओं के शोर में दब गई.....

भोंपू महंगे थे और तथाकथित सादगी की सोच-समझ को बख़ूबी व्यक्त करते थे। 

-संजय ग्रोवर

26-12-2013

ब्लॉग आर्काइव