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शनिवार, 20 अप्रैल 2019

ऐन वक़्त पर होता है

ग़ज़ल

कोई छुपकर रोता है
अकसर ऐसा होता है

दर्द बड़ा ही ज़ालिम है
ऐन वक़्त पर होता है








शेर अभी कमअक़्ल है ना
अभी नहीं मुंह धोता है

तुम ही कुछ कर जाओ ना
वक़्त मतलबी, सोता है

वो मर्दाना नहीं रहा
यूं वो खुलकर रोता है
-संजय ग्रोवर

सोमवार, 25 मार्च 2019

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं

ग़ज़ल

ये तो हारा हुआ घराना है
इस ज़माने को क्या हराना है

ये तो बचपन से मैंने देखा है
ये ज़माना भी क्या ज़माना है

वक़्त से दोस्ती करो कैसे
वक़्त का क्या कोई ठिकाना है

सच का हुलिया ज़रा बयान करो
सच को सच से मुझे मिलाना है

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं
सच भी झूठों के काम आना है

सचसे बच्चों को डराता है तमाम
झूठ भी कितना वहशियाना है

मेरा जो सच है, मेरा अपना है
इसको झूठा नहीं बनाना है 

-संजय ग्रोवर
26-03-2019

शनिवार, 20 जनवरी 2018

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी/माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

ग़ज़ल

इससे जो मिलके काम करता है
माफ़िया एहतिराम करता है

तुम्हारा डर है माफ़िया की ख़ुशी
माफ़िया ऐसे काम करता है

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी
माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

हिंदू, मुस्लिम हैं सब क़ुबूल इसे
माफ़िया आदमी से डरता है

नाम, पैसा, रुआब क्या चहिए
माफ़िया इंतज़ाम करता है


माफ़िया के जो काम आ जाए
नाम उसके इनाम करता है

माफ़िया से मिला लो हाथ अगर
माफ़िया ओस जैसे झरता है

तुम भले शब्द एक ही बोलो
माफ़िया अर्थ चार करता है

माफ़िया दाएं भी है बाएं भी
माफ़िया चमत्कार करता है

माफ़िया कितना तो अकेला है
मुझ अकेले पे वार करता है

आपमें दम है अगर, शक़ करलो
माफ़िया सबसे प्यार करता है

माफ़िया है, जवाब क्यों देगा!
माफ़िया बहिष्कार करता है 

माफ़िया को शरम नहीं आती
वो तो बस शर्मसार करता है

माफ़िया यूं बड़ा ही सामाजिक
सारे पीछे से काम करता है

माफ़िया इसका, उसका, सबका है
जो भी उसको सलाम करता है

ख़ुद कोई क्यों तमाम होगा भला
माफ़िया सबका काम करता है


-संजय ग्रोवर
20-01-2018




बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी

पज़ल

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी
सिलते-सिलते थक गए दर्ज़ी

नीचे वाला चमचा बोला
ऊपर वाले तेरी मर्ज़ी

बहरे, मोहरे, चेहरे, दोहरे
टोपें-तोपें गरज़ी-वरज़ी

झूठ ही जीता, झूठ ही हारा
‘सच’ बोला यही मेरी मरज़ी

राज़ छुपाना काम है जिनका
उन्हींको दो पाने की अरज़ी

उनका तो नाटक भी दुख है
मेरी तो बांछे भी लरज़ी


-संजय ग्रोवर
05-10-2016

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मेरी बातों को दे दे रंग नया.....


ग़ज़ल

अक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या है
अपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!

मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!
ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?

पास जिनके रहन है तेरा ज़हन
उनके बारे में सोचता क्या है ?

हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़र
इसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !

हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असली
फिर अदाकारी में रखा क्या है !?

तू भी उनमें ही हो गया शामिल
हमको क्या लेना मामला क्या है

डर है, लालच है या है मजबूरी
तेरे पास और अब नया क्या है ?

हमने तेरा समाज देख लिया
अब भी पूछे है, माफ़िया क्या है !?

वो जो बिलकुल ही हैं तिरे जैसे
तू ही अब उनपे हंस रहा, क्या है!?

जिनका जीवन हो चुटकुले जैसा
उनमें कुछ राज़ ढूंढना! क्या है ?

साफ़ कुछ भी न बोल पाएगा
बच गई है तो बस अदा, क्या है

वो जो करते रहे इधर का उधर
उनके घर जाके ढूंढना क्या है!?

मेरी बातों को दे दे रंग नया
तेरे पास और अब बचा क्या है ?

ख़ुद तो ग़ालिब रहे अकेले-से
नाम पर उनके ये लगा क्या है !?

(माफ़ करना मिर्ज़ा, यह ज़रुरी था)


-संजय ग्रोवर
20-09-2016



गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!

ग़ज़ल

किसीने दी जो उनको ग़ाली है-
क्या उनकी फ़िल्म आनेवाली है !?
16-12-2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!
ख़ूब तरक़ीब भी निकाली है 

मूर्ख आपस में उलझ जाएंगे-
आपकी मौज आनेवाली है
31-12-2015

वो जो नक़ली हैं, सर पे बैठे हैं
जो बिठाए, बेचारा जाली है !?

आप छेड़ें तो ये हुनर है जनाब
और वो दूसरा, मवाली है !?
16-12-2015

-संजय ग्रोवर
31-12-2015



शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे

ग़ज़ल़

उनका इनसे समझौता है
घिन का घिन से समझौता है
13-07-2014

ज़रा चुभाना, बड़ा दिखाना
ख़ून का पिन से समझौता है

इधर भी छुरियां, उधर भी छुरियां
और मक्खन से समझौता है
17-10-2015

नामुमकिन कुछ कहां रहा अब
सब मुमक़िन है, समझौता है

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे
रात का दिन से समझौता है
13-07-2014




-संजय ग्रोवर
17-10-2015



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