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बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी

पज़ल

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी
सिलते-सिलते थक गए दर्ज़ी

नीचे वाला चमचा बोला
ऊपर वाले तेरी मर्ज़ी

बहरे, मोहरे, चेहरे, दोहरे
टोपें-तोपें गरज़ी-वरज़ी

झूठ ही जीता, झूठ ही हारा
‘सच’ बोला यही मेरी मरज़ी

राज़ छुपाना काम है जिनका
उन्हींको दो पाने की अरज़ी

उनका तो नाटक भी दुख है
मेरी तो बांछे भी लरज़ी


-संजय ग्रोवर
05-10-2016

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

आसमान से गिरी रे हड्डी

ग़ज़ल

आसमान से गिरी रे हड्डी
बच्च कबड्डी बच्च कबड्डी

गंग में थूके जमन में मूते
मांएं घिस-घिस धोएं चड्ढी

इसे टीपकर, उसे चाटकर
हुई जवां नोटों की गड्डी

चचा-ताऊ सब लूट ले गए
ताली-सीटी भरें फिसड्डी

आधी इसकी, आधी उसकी
गिरी कटोरे में जो हड्डी

-संजय ग्रोवर
19-10-2015


शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे

ग़ज़ल़

उनका इनसे समझौता है
घिन का घिन से समझौता है
13-07-2014

ज़रा चुभाना, बड़ा दिखाना
ख़ून का पिन से समझौता है

इधर भी छुरियां, उधर भी छुरियां
और मक्खन से समझौता है
17-10-2015

नामुमकिन कुछ कहां रहा अब
सब मुमक़िन है, समझौता है

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे
रात का दिन से समझौता है
13-07-2014




-संजय ग्रोवर
17-10-2015



मंगलवार, 11 नवंबर 2014

क्रांति-2

व्यंग्य


तथाकथित प्रगतिशील, कट्टरपंथी को ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गया, पर कट्टरपंथी था कि कहीं मिल नहीं रहा था।

तथाकथित प्रगतिशील उससे दो-दो हाथ करने को आतुर था, बेताब था, उत्तेजित था मगर कट्टरपंथी था कि सामने नहीं आ रहा था। पत्रकार, रिपोर्टर सब लाइव टेलिकास्ट के लिए तैयार बैठे थे मगर कट्टरपंथी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।

दिखाई पड़ता भी कैसे, वो तो उन्हींके अंदर छुपा बैठा था।

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 29 जुलाई 2014

अभिव्यक्ति की बारात

कविता

freedom of expression in their sense

29-07-2014

इन दिनों
फ़ेसबुक पर निकल रही है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
तथाकथित हिमायतियों की बारात

अफ़वाहों का बैण्ड
बजा रहा है
सत्य का बाजा

आंऊं आऊं अहूं आंऊं आऊं अहूं

सफ़लता के बाप ने अपनी
बुज़ुर्ग हो चली बिटिया के लिए
एक बार फिर से
इनके घराने को चुन लिया है

सफ़लता का बाप को भी आए दिन
अपनी बेटी की शादी कहीं न कहीं करनी है
शहर में दो-तीन ही हैं ऐसे बड़े घराने
हर बार इन्हीं में से एक चुनना है
परंपरावादी बाप ठहरा

और इधर इन्हें भी चाहिए
हर हफ़ते कोई बारात
ये भी ठहरे हुए परंपरावादी

मगर चमत्कार देखिए
जैसे ही दोनों की मिलनी होती है
दोनों एक-दूसरे को प्रगतिशील घोषित कर देते हैं

बारात में नाच रहे हैं
तरह-तरह के देसी-विदेशी विचार
कुटेशन और ट्रांसलेशन

कुटेशन और ट्रांसलेशन
बेचारे जैसे बारातों के ही लिए बने हैं

लोगों छतों से देख रहे हैं ललक-ललच कर
जैसे कि जो होना है बस बारातों से ही होना है

बारात देखनी चाहिए
मज़ा तो आता है
देखिए अलग़-अलग़ तबेलों और मेलों से आए हैं
मगर कितनी एक जैसी है लय और ताल
रोज़ाना होता है यह कमाल

एक दारु और दो चख़ने
कैसे सभी बारातियों को
एकता के सूत्र में पिरो देते हैं
इसका ज़िक्र इतिहास में क्यों नहीं होगा!
इन्हीं बारातियों ने लौटकर लिखना है इतिहास
जिन्होंने सिक्के लूटे और लुटाए हैं

एक बाराती ने दूसरे के कुटेशन को सर पर उठा लिया है
जैसे के इसी का हो
और देखिए कैसे बैलेंस बनाकर नाच रहा है

एक बाराती जिसे अभी-अभी कोई पुरस्कार मिला है
जो इसे न मिलता तो इसके किसी चाचा-ताऊ के को मिलता
मुंह में रुमाल डालकर
नागिन की सिंफ़नी पर
पारंपरिक नृत्य कर रहा है
जिसके चारों तरफ़ दाद-नृत्य कर रहे हैं पुंछल्ले
इन्हें भी कभी न कभी मिल सकता है कोई छोटा या बड़ा
बस घराने के लोगों से ऐसे ही बनाके रखनी है

इसीको कहो प्रतिबद्धता

एक बाराती मंटो के नाम पर
लुटा रहा है
दूसरा मुक्तिबोध के नाम पर झूम रहा है
तीसरा भी अतीत के किसी ज़मीन से जुड़े कवि के नाम पर
धरती को चूम रहा है

शुक्र है कि यह संभव नहीं है
कि मंटो यह देख पाए
वरना कांप जाता
भांप जाता
कि ग़लती से उधर को गया
तो पहले ये सारी बारात छोड़कर
मुझे तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी...... बार
पागलख़ाने में भरती कराएंगे
और लौटकर
इत्मीनान से सिक्के लुटाएंगे
फ़िर उसपर संस्मरण लिखकर लायब्रेरी में लगवाएंगे


(जारी)

यूं तो शहर बारातियों से भरा है
हर कोई जैसे बारात के ही लिए मरता-जीता है
(इसी में सुभीता है)
सभी तरह के अंथी और पंथी
बारातों के शैदाई हैं
छोटे-मोटे बेचारे
बारात और वो भी अमीरों की बारात देख
ख़ुद ही सड़क ख़ाली कर देते हैं

कभी-कभी कोई बेचारा कह देता है कि
सेठ जी कबसे तुम्हारी बारात के पीछे फ़ंसा हूं
रिक्शा तो निकाल लेने दो सवारी नाराज़ हो रही है
और बस सारे बाराती मिलकर
दिखा देते हैं उसे उसकी औक़ात

सबने पी जो रखी है एक ही तरह की दारु

फिर एक आता है जो कहता है
कि एक ही जगह कितनी देर नाचते रहोगे ?
यह कोई तुम्हारा घर थोड़े ही है
औरों ने भी आना-जाना होता है

अब यह तो रिक्शेवाला नहीं है
गुमनाम भी नहीं बदनाम भी नहीं है
पांच लोग इसे भी जानते हैं
इसे वैसे नहीं निपटाया जा सकता
‘ठीक है, ठीक है, भाईसाहब ठीक कहते हैं
अनुशासन भी कोई चीज़ होती है
बारात आगे बढ़ाओ भाई, भाईसाहब को रास्ता दो’

‘लो भाईसाहब निकल गये-
अब सही बात बताऊं
इनको कार्ड नहीं दिया था न,
इसलिए नख़रे दिखा रहे थे’

यही इन्होंने तब कहा था
‘इसको पुरस्कार नहीं मिला न
इसीलिए इस तरह बोलता/बोलती है’

अद्भुत प्रगतिशीलता है जिसमें यह तय कर दिया गया है
कि न केवल हम ख़ुद
बल्कि दूसरे भी सभी पुरस्कारों और बारातों के लिए जीतें हैं
इसके आगे नहीं है कोई दुनिया

(जारी)


बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सादगी और भौंपू

लघुकथा


सादगी ने निर्णय लिया कि वह ख़ुले मैदान में नृत्य करेगी।

भौंपू बजने लगे।

लोगों ने तालियां बजाईं। लोगों का तो आपको मालूम ही है। कभी न कभी आप भी लोग रहे होंगे। हो सकता है अभी भी हों।

लोग जैसे सोचने के लिए कम और श्रद्धा करने के लिए ज़्यादा पैदा हुए हैं।

लेकिन लोगों में कुछ पागल भी होते हैं। एक ने कहा कि इसमें तो दस-बीस गुना ख़र्चा ज़्यादा होगा, पचास गुना भी हो सकता है। सुरक्षा की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। उसमें भी अच्छा-ख़ासा ख़र्चा आएगा। यह तो एक रस्मी नृत्य है, न भी किया जाए तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इससे सिर्फ़ आपकी सादगी का प्रचार होगा। सादगी के प्रचार पर इतना ख़र्च आ जाए तो उसे सादगी क्यों माना जाए.......

पागल अभी बोल ही रहा था कि भोंपू ज़ोर-ज़ोर से बजने लगे। पागल की आवाज़ भोंपुओं के शोर में दब गई.....

भोंपू महंगे थे और तथाकथित सादगी की सोच-समझ को बख़ूबी व्यक्त करते थे। 

-संजय ग्रोवर

26-12-2013

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