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रविवार, 13 नवंबर 2022

पाबंद का छंद

सुबह सैर को चल दिए, कविवर का आनंद

नियमित बेईमान थे नियमों के पाबंद


नियमों के पाबंद ने इक दिन काम निकाला

पैसे लेजा पैसे देकर काम कराला 


दूजा बोला कवि  हो या हो भ्रष्टाचारी

बोले इसपर भी लिक्खूंगा कविता प्यारी


-संजय ग्रोवर




शनिवार, 20 अप्रैल 2019

ऐन वक़्त पर होता है

ग़ज़ल

कोई छुपकर रोता है
अकसर ऐसा होता है

दर्द बड़ा ही ज़ालिम है
ऐन वक़्त पर होता है








शेर अभी कमअक़्ल है ना
अभी नहीं मुंह धोता है

तुम ही कुछ कर जाओ ना
वक़्त मतलबी, सोता है

वो मर्दाना नहीं रहा
यूं वो खुलकर रोता है
-संजय ग्रोवर

सोमवार, 25 मार्च 2019

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं

ग़ज़ल

ये तो हारा हुआ घराना है
इस ज़माने को क्या हराना है

ये तो बचपन से मैंने देखा है
ये ज़माना भी क्या ज़माना है

वक़्त से दोस्ती करो कैसे
वक़्त का क्या कोई ठिकाना है

सच का हुलिया ज़रा बयान करो
सच को सच से मुझे मिलाना है

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं
सच भी झूठों के काम आना है

सचसे बच्चों को डराता है तमाम
झूठ भी कितना वहशियाना है

मेरा जो सच है, मेरा अपना है
इसको झूठा नहीं बनाना है 

-संजय ग्रोवर
26-03-2019

सोमवार, 14 जनवरी 2019

मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी है

Photo by Sanjay Grover


चांद से चिट्ठी आई है के दुनिया आनी-जानी है 
मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी है

गांधीजी का नाम रटो हो, पहने हो जैकेट और कोट
लंगोटी के नाम पे फिर क्यूं मरी तुम्हारी नानी है

आधी-पौनी दिखे सचाई,समझा ख़ुदको ज्ञानी है
अंधे कैसे होते होंगे गर ये दुनिया कानी है

सभी हुक़ूमत करना चाहें इल्मी-फ़िल्मी-राजा लोग
गांधी जैसी बात चले तो-‘बस इक रोटी खानी है’

ईद और करवाचौथ करो हो, देख-देखके चांद का मुह
आज ही क्यों ना चांद पे जाओ, ये दुनिया तो फ़ानी है


-संजय ग्रोवर
15-01-2019



गुरुवार, 21 जून 2018

सच जब अपनेआप से बातें करता है

ग़ज़ल
creation : Sanjay Grover












सच जब अपनेआप से बातें करता है
झूठा जहां कहीं भी हो वो डरता है

दीवारो में कान तो रक्खे दासों के
मालिक़ क्यों सच सुनके तिल-तिल मरता है

झूठे को सच बात सताती है दिन-रैन
यूं वो हर इक बात का करता-धरता है

सच तो अपने दम पर भी जम जाता है
झूठा हरदम भीड़ इकट्ठा करता है

झूठ के पास मुखौटा है किरदार नहीं
सच की ख़ाली जगह वही तो भरता है 


-संजय ग्रोवर
21-06-2018

बुधवार, 9 मई 2018

दो लोगों में इक सच्चा इक झूठा है....

By Sanjay Grover
ग़ज़ल



पहले सब माहौल बनाया जाता है
फिर दूल्हा, घोड़े को दिखाया जाता है

झूठ को जब भी सर पे चढ़ाया जाता है

सच को उतनी बार दबाया जाता है

दो लोगों में इक सच्चा इक झूठा है

बार-बार यह भ्रम फैलाया जाता है


आपस में यूं मिलने-जुलने वालों में

बारी-बारी भोग लगाया जाता है

जिन्हें ज़बरदस्ती ही अच्छी लगती है

उनको घर पे जाके मनाया जाता है

गिरे हुए भी कई बार गिर जाते हैं
कुछ लोगों को यूं भी उठाया जाता है

देते हैं जो सबको भिक्षा की शिक्षा
उनसे ही हर मंच सजाया जाता है

वर्तमान में अगर नहीं कुछ करना हो
मिल-जुलकर इतिहास बताया जाता है

बननेवाले बार-बार बन जाते हैं
फिर भी बारम्बार बनाया जाता है




-संजय ग्रोवर
09-05-2018

सोमवार, 19 मार्च 2018

सच क्यों करे भरोसा सबका

 ग़ज़ल
PHOTO by Sanjay Grover







सच को ना औज़ार चाहिए
कुछ पागल तैयार चाहिए

सच क्यों जाए मंदिर-मस्ज़िद
सच को सच्चे यार चाहिए

सच क्यों करे भरोसा सबका !
सच तुमको बीमार चाहिए !

सच ना पंजाबी-मद्रासी
सच को सच्चा प्यार चाहिए

कौन जिया है सच की ख़ातिर
सब को इश्तेहार चाहिए 

सच अपने पैरों प खड़ा है
सच को ना गुरु-द्वार चाहिए
      
करनी है गर सच से दोस्ती
ज़हनो-दिल तैयार चाहिए

झूठों का संयुक्त माफ़िया
सच में पूरी धार चाहिए

सच न माफ़िया, सच न काफ़िया
सच को सच तकरार चाहिए




-संजय ग्रोवर
19/20-03-2018

शनिवार, 20 जनवरी 2018

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी/माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

ग़ज़ल

इससे जो मिलके काम करता है
माफ़िया एहतिराम करता है

तुम्हारा डर है माफ़िया की ख़ुशी
माफ़िया ऐसे काम करता है

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी
माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

हिंदू, मुस्लिम हैं सब क़ुबूल इसे
माफ़िया आदमी से डरता है

नाम, पैसा, रुआब क्या चहिए
माफ़िया इंतज़ाम करता है


माफ़िया के जो काम आ जाए
नाम उसके इनाम करता है

माफ़िया से मिला लो हाथ अगर
माफ़िया ओस जैसे झरता है

तुम भले शब्द एक ही बोलो
माफ़िया अर्थ चार करता है

माफ़िया दाएं भी है बाएं भी
माफ़िया चमत्कार करता है

माफ़िया कितना तो अकेला है
मुझ अकेले पे वार करता है

आपमें दम है अगर, शक़ करलो
माफ़िया सबसे प्यार करता है

माफ़िया है, जवाब क्यों देगा!
माफ़िया बहिष्कार करता है 

माफ़िया को शरम नहीं आती
वो तो बस शर्मसार करता है

माफ़िया यूं बड़ा ही सामाजिक
सारे पीछे से काम करता है

माफ़िया इसका, उसका, सबका है
जो भी उसको सलाम करता है

ख़ुद कोई क्यों तमाम होगा भला
माफ़िया सबका काम करता है


-संजय ग्रोवर
20-01-2018




बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी

पज़ल

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी
सिलते-सिलते थक गए दर्ज़ी

नीचे वाला चमचा बोला
ऊपर वाले तेरी मर्ज़ी

बहरे, मोहरे, चेहरे, दोहरे
टोपें-तोपें गरज़ी-वरज़ी

झूठ ही जीता, झूठ ही हारा
‘सच’ बोला यही मेरी मरज़ी

राज़ छुपाना काम है जिनका
उन्हींको दो पाने की अरज़ी

उनका तो नाटक भी दुख है
मेरी तो बांछे भी लरज़ी


-संजय ग्रोवर
05-10-2016

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मेरी बातों को दे दे रंग नया.....


ग़ज़ल

अक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या है
अपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!

मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!
ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?

पास जिनके रहन है तेरा ज़हन
उनके बारे में सोचता क्या है ?

हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़र
इसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !

हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असली
फिर अदाकारी में रखा क्या है !?

तू भी उनमें ही हो गया शामिल
हमको क्या लेना मामला क्या है

डर है, लालच है या है मजबूरी
तेरे पास और अब नया क्या है ?

हमने तेरा समाज देख लिया
अब भी पूछे है, माफ़िया क्या है !?

वो जो बिलकुल ही हैं तिरे जैसे
तू ही अब उनपे हंस रहा, क्या है!?

जिनका जीवन हो चुटकुले जैसा
उनमें कुछ राज़ ढूंढना! क्या है ?

साफ़ कुछ भी न बोल पाएगा
बच गई है तो बस अदा, क्या है

वो जो करते रहे इधर का उधर
उनके घर जाके ढूंढना क्या है!?

मेरी बातों को दे दे रंग नया
तेरे पास और अब बचा क्या है ?

ख़ुद तो ग़ालिब रहे अकेले-से
नाम पर उनके ये लगा क्या है !?

(माफ़ करना मिर्ज़ा, यह ज़रुरी था)


-संजय ग्रोवर
20-09-2016



गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!

ग़ज़ल

किसीने दी जो उनको ग़ाली है-
क्या उनकी फ़िल्म आनेवाली है !?
16-12-2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!
ख़ूब तरक़ीब भी निकाली है 

मूर्ख आपस में उलझ जाएंगे-
आपकी मौज आनेवाली है
31-12-2015

वो जो नक़ली हैं, सर पे बैठे हैं
जो बिठाए, बेचारा जाली है !?

आप छेड़ें तो ये हुनर है जनाब
और वो दूसरा, मवाली है !?
16-12-2015

-संजय ग्रोवर
31-12-2015



सोमवार, 2 नवंबर 2015

नाम छिलके के जैसे उतर जाएंगे

ग़ज़लनुमां

काम अपना हम कर जाएंगे
मर जाएंगे तो मर जाएंगे

हम जैसे कभी जो बिगड़ जाएंगे
देख लेना कि कितने सुधर जाएंगे

जान जाएगी जब आसमां का असल
प्यारी धरती के पांव उखड़ जाएंगे
31-10-2015

एक लम्हा भी तो नहीं जी पाएंगे
वो जो जीने को सारी उमर जाएंगे

काम हमने किए नाम तुम ओढ़ लो
नाम छिलके के जैसे उतर जाएंगे
02-11-2015



-संजय ग्रोवर
02-11-2015


शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे

ग़ज़ल़

उनका इनसे समझौता है
घिन का घिन से समझौता है
13-07-2014

ज़रा चुभाना, बड़ा दिखाना
ख़ून का पिन से समझौता है

इधर भी छुरियां, उधर भी छुरियां
और मक्खन से समझौता है
17-10-2015

नामुमकिन कुछ कहां रहा अब
सब मुमक़िन है, समझौता है

शाम को दोनों वहीं मिलेंगे
रात का दिन से समझौता है
13-07-2014




-संजय ग्रोवर
17-10-2015



मंगलवार, 29 जुलाई 2014

अभिव्यक्ति की बारात

कविता

freedom of expression in their sense

29-07-2014

इन दिनों
फ़ेसबुक पर निकल रही है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
तथाकथित हिमायतियों की बारात

अफ़वाहों का बैण्ड
बजा रहा है
सत्य का बाजा

आंऊं आऊं अहूं आंऊं आऊं अहूं

सफ़लता के बाप ने अपनी
बुज़ुर्ग हो चली बिटिया के लिए
एक बार फिर से
इनके घराने को चुन लिया है

सफ़लता का बाप को भी आए दिन
अपनी बेटी की शादी कहीं न कहीं करनी है
शहर में दो-तीन ही हैं ऐसे बड़े घराने
हर बार इन्हीं में से एक चुनना है
परंपरावादी बाप ठहरा

और इधर इन्हें भी चाहिए
हर हफ़ते कोई बारात
ये भी ठहरे हुए परंपरावादी

मगर चमत्कार देखिए
जैसे ही दोनों की मिलनी होती है
दोनों एक-दूसरे को प्रगतिशील घोषित कर देते हैं

बारात में नाच रहे हैं
तरह-तरह के देसी-विदेशी विचार
कुटेशन और ट्रांसलेशन

कुटेशन और ट्रांसलेशन
बेचारे जैसे बारातों के ही लिए बने हैं

लोगों छतों से देख रहे हैं ललक-ललच कर
जैसे कि जो होना है बस बारातों से ही होना है

बारात देखनी चाहिए
मज़ा तो आता है
देखिए अलग़-अलग़ तबेलों और मेलों से आए हैं
मगर कितनी एक जैसी है लय और ताल
रोज़ाना होता है यह कमाल

एक दारु और दो चख़ने
कैसे सभी बारातियों को
एकता के सूत्र में पिरो देते हैं
इसका ज़िक्र इतिहास में क्यों नहीं होगा!
इन्हीं बारातियों ने लौटकर लिखना है इतिहास
जिन्होंने सिक्के लूटे और लुटाए हैं

एक बाराती ने दूसरे के कुटेशन को सर पर उठा लिया है
जैसे के इसी का हो
और देखिए कैसे बैलेंस बनाकर नाच रहा है

एक बाराती जिसे अभी-अभी कोई पुरस्कार मिला है
जो इसे न मिलता तो इसके किसी चाचा-ताऊ के को मिलता
मुंह में रुमाल डालकर
नागिन की सिंफ़नी पर
पारंपरिक नृत्य कर रहा है
जिसके चारों तरफ़ दाद-नृत्य कर रहे हैं पुंछल्ले
इन्हें भी कभी न कभी मिल सकता है कोई छोटा या बड़ा
बस घराने के लोगों से ऐसे ही बनाके रखनी है

इसीको कहो प्रतिबद्धता

एक बाराती मंटो के नाम पर
लुटा रहा है
दूसरा मुक्तिबोध के नाम पर झूम रहा है
तीसरा भी अतीत के किसी ज़मीन से जुड़े कवि के नाम पर
धरती को चूम रहा है

शुक्र है कि यह संभव नहीं है
कि मंटो यह देख पाए
वरना कांप जाता
भांप जाता
कि ग़लती से उधर को गया
तो पहले ये सारी बारात छोड़कर
मुझे तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी...... बार
पागलख़ाने में भरती कराएंगे
और लौटकर
इत्मीनान से सिक्के लुटाएंगे
फ़िर उसपर संस्मरण लिखकर लायब्रेरी में लगवाएंगे


(जारी)

यूं तो शहर बारातियों से भरा है
हर कोई जैसे बारात के ही लिए मरता-जीता है
(इसी में सुभीता है)
सभी तरह के अंथी और पंथी
बारातों के शैदाई हैं
छोटे-मोटे बेचारे
बारात और वो भी अमीरों की बारात देख
ख़ुद ही सड़क ख़ाली कर देते हैं

कभी-कभी कोई बेचारा कह देता है कि
सेठ जी कबसे तुम्हारी बारात के पीछे फ़ंसा हूं
रिक्शा तो निकाल लेने दो सवारी नाराज़ हो रही है
और बस सारे बाराती मिलकर
दिखा देते हैं उसे उसकी औक़ात

सबने पी जो रखी है एक ही तरह की दारु

फिर एक आता है जो कहता है
कि एक ही जगह कितनी देर नाचते रहोगे ?
यह कोई तुम्हारा घर थोड़े ही है
औरों ने भी आना-जाना होता है

अब यह तो रिक्शेवाला नहीं है
गुमनाम भी नहीं बदनाम भी नहीं है
पांच लोग इसे भी जानते हैं
इसे वैसे नहीं निपटाया जा सकता
‘ठीक है, ठीक है, भाईसाहब ठीक कहते हैं
अनुशासन भी कोई चीज़ होती है
बारात आगे बढ़ाओ भाई, भाईसाहब को रास्ता दो’

‘लो भाईसाहब निकल गये-
अब सही बात बताऊं
इनको कार्ड नहीं दिया था न,
इसलिए नख़रे दिखा रहे थे’

यही इन्होंने तब कहा था
‘इसको पुरस्कार नहीं मिला न
इसीलिए इस तरह बोलता/बोलती है’

अद्भुत प्रगतिशीलता है जिसमें यह तय कर दिया गया है
कि न केवल हम ख़ुद
बल्कि दूसरे भी सभी पुरस्कारों और बारातों के लिए जीतें हैं
इसके आगे नहीं है कोई दुनिया

(जारी)


गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

उनकी तरह सफ़ल होने की चाहत में


जिनके खि़लाफ़ लड़ रहा था
उन्हीं के समर्थन से लड़ने लगा

लड़ते-लड़ते
नाचने लगा

थका तो रुकना चाहा
मगर डोरियां तो उन्हीं के हाथ में दे दी थीं

अब नाचते रहने के सिवा
कोई चारा न था


-संजय ग्रोवर
10-10-2013

शनिवार, 20 जुलाई 2013

मेरे क़दमों में आ गिरी खिड़की

ग़ज़ल

एक खिड़की से दूसरी खिड़की
ज़िंदगी रह गई निरी खिड़की

आसमां जिसपे, बंद दरवाज़ा
उसके जीवन में बस झिरी खिड़की

कुछ तो देखा भी करदो अनदेखा
बन न जाए ये झुरझुरी खिड़की

उसके ख़्वाबों पे क्या गिरी बारिश ?
उसके आंसू में क्यों तिरी खिड़की !

सर मेरा आसमां से टकराया
मेरे क़दमों में आ गिरी खिड़की


-संजय ग्रोवर

ताज़ा बारिश में ताज़ा ग़ज़ल

सोमवार, 10 सितंबर 2012

किसीने चूहा छोड़ा उनका...


ग़ज़ल

ज़्यादा उनकी, थोड़ा उनका
घास भी उनकी, घोड़ा उनका

किसीने बिल्ली पकड़ी उनकी
किसीने चूहा छोड़ा उनका

टांगे ही बेकार अगर थीं
घुटना काहे तोड़ा उनका!

चेहरा अपना बचाके रखना
तुमने दिल है तोड़ा उनका

अभी बना दें, अभी हटा दें
राहें उनकी, रोड़ा उनका

अलग़-अलग़ भी वही हुए हैं
साथ-साथ भी जोड़ा उनका

-संजय ग्रोवर


शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

अटकी पड़ीं थीं क्रांतियां क़ब्ज़ की तरह..

कविता

रेखाकृति: संजय ग्रोवर

गड़ढा खोदना क्रांति है
उसमें गिर जाना क्रांति है
झाड़कर निकल आना क्रांति है
निकलकर खिखियाना क्रांति है

किसीको पीछे से चपत मारकर भाग जाना क्रांति है
चपत मारकर खड़े रहना क्रांति है
और ये सारी क्रांतियां पकड़ाई में आ जाएं तो
ख़ुदको चपतियाना शुरु कर देना क्रांति है

और कुछ नहीं तो
बहेलियों की सहेलियां बन जाना क्रांति है
बहेलिएं बताएंगे कि कोयल को जाल से कैसे बचना चाहिए

यार एक बार क्रांति तो करनी है
कब से ड्यू है मुझपर
अच्छा सुन
अभी पिछले दिनों जो क्रांति चल रही थी
उसका क्या हुआ !?
पता नहीं यार
वैसे कुछ लोग कह रहे हैं कि हो गयी
हो गयी तो तेरा काम तो हो गया
तू तो शामिल था न उसमें
अब मैं रह गया यार

क्रांति की होम डिलीवरी नहीं होती क्या ?
होती तो होगी पर पहचानेंगे कैसे!
पहले तो कभी देखी नहीं
मुझे तो यह भी नहीं पता कि होने के बाद करते क्या हैं इसका!
तो कर क्यों रहे हो?
अरे! बाक़ी सब जो कर रहे हैं वो पागल हैं!

भेड़ियों के भी दिल ऐसे पिघले जंगल में
कि उन्होंने भेड़ों की ख़ातिर झंडे उठा लिए
कुछ भेड़ें तो भावुक हो गयीं
और कुछके पेटों में ज़मानों से अटकी पड़ीं थीं क्रांतियां
क़ब्ज़ की तरह
उन्हें भी लगा अच्छा मौक़ा है
बोलो, ज़ोर लगाके हईशा

क़िताबें आने वाली हैं जिनमें
जीसस को सूली चढ़ाने वाले
एक-एक क्रांतिकारी का
जीवन परिचय होगा बातस्वीर
वक्त आ गया है कि
कबीर को पत्थर मारनेवाले
हर जांबांज़ पर बनेंगे वृत्तचित्र

इस बार निकाल ही देनी हैं
अटकी हुई सारी क्रांतियां

ऐसी मचा दो क्रांति इस बार
कि लोग भूल जाएं
क्रांति करने वाले, पेलने वाले, झेलने वाले और खेलने वाले में
क्या फ़र्क होता है


-संजय ग्रोवर

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

शेर है, रुबाई है, दोहे हैं, पता नहीं क्या है? पर कुछ है-


उन्हें लगा मैं हार गया हूं, हाथ सभीने खींचे
उन्हें लगा मैं जीत गया हूं, हो लिए पीछे-पीछे
कह बैठा ‘तुम सब गिरगिट हो’, दांत सभी ने भींचे
अब बस पत्थर ही पत्थर थे और मैं आंखें मींचे

--संजय ग्रोवर ;)

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ईमानदारी और सकारात्मकता

(एक समाज की अंतर्कथा) 
कविता

भ्रष्ट आदमी के घर का कूड़ा
ईमानदार आदमी की नाली से निकलता

ईमानदार आदमी उलझन में रहता
उसे पता ही नहीं चलता कि
चरित्र किसी और का गड़बड़ है
छवि उसकी बिगड़ रही है

भ्रष्ट आदमी के पास भी वक्त नहीं था
इतना भी नहीं कि उसे मालूम हो जाए
वह भ्रष्ट है

ईमानदार आदमी से लोग
या तो डरते
या उसे डराते

कभी-कभी लोग उसके घर के सामने से गुज़रते
यह समझते हुए कि
यहां अब कोई नहीं रहता

सुबह उठने का मन नहीं होता था ईमानदार आदमी का
सकारात्मकता के नाम पर चारों ओर
शिकारात्मकता फ़ैली थी

चौबीसों घण्टे
बेईमानी उस पर नज़र रखती

चारों ओर से बेईमान उसे सुधारने में लगे थे
उनका आत्म विश्वास देखकर
कई बार वह ख़ुदको बेईमान समझ बैठता

सरकारी और अखबारी की तो बात ही छोड़िए
लघुपत्रिका के दफ्तर में घुसने के नाम पर ही
हाथ-पैर कांपने लगते ईमानदार आदमी के


कभी-कभी वह अपने कपड़े फाड़ता और चिल्लाता
कभी-कभी वह इसलिए पागल हो जाता
कि कहीं सचमुच पागल न हो जाए

यह जानते हुए भी कि इससे उसकी
छवि ख़राब होगी

हर बार उसे
छवि और ईमानदारी में से
एक को चुनना होता

जितनी बार भी उसने
ईमानदारी का साथ दिया
हर बार वह
कुछ और ही निकली

ईमानदार आदमी की नज़र
इतनी बारीक़ थी कि
वह ख़ुदको भी झांसा नहीं दे सकता था

ईमानदारी उसके लिए
सांस लेने की तरह थी
कभी-कभी जब वह थक जाता
या कोई लालच
कोई लापरवाही
उसके सर पर सवार हो जाते
तो कुछ कूड़ा उसकी सांस में चला जाता

यही जागरुकता कि
उसकी भी सांस में गंदगी है
पल-पल उसकी सज़ा होती

जितनी बारीक़ थी उसकी नज़र
उतनी ही मुसीबतें बढ़ती थी ख़ुदके लिए

वह आंदोलन में जाने का
दिन और समय तक भूल जाता

ईमानदार आदमी के संघर्ष का गवाह
उसके अलावा कोई भी नहीं होता था

वह जानता था कि जिस दिन संगठन बनाएगा
गिरवी रखनी होगी थोड़ी-सी ईमानदारी


ईमानदार आदमी की ज़िंदगी
एक त्रासदी भी थी और
एक आंदोलन भी

-संजय ग्रोवर

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