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गुरुवार, 23 जुलाई 2015

औक़ात

छोटी कहानी

वे अलग-अलग टीमें बना कर लड़ाई-लड़ाई खेल रहे थे।

तभी वह वहां आन पहुंचा।

‘आओ न, तुम भी हमारे साथ खेलो, ए में जाओगे कि बी में.....’ उन्होंने रिक्वेस्ट की।

‘नहीं....नहीं.....यह मैं नहीं खेल पाऊंगा.....’

‘क्यों नहीं, तुम कहो तो तीसरी टीम बना दें.....’

‘नहीं, देखिए, आप लोगों ने तो खेल-खेल में ही एक-दूसरे के कपड़े तक फ़ाड़ डाले हैं, मुंह तक नोच लिए हैं, माफ़ कीजिएगा.....

‘पर लोग तो हमारे खेल से ख़ुश हैं, वे तो इसे नक़ली नहीं मानते....’

‘आपने किन लोगों से पूछा है, कहीं वे भी.....ख़ैर, मैं चलता हूं...

‘यह तो नख़रे दिखा रहा है, बड़ा घमंडी है, ख़ुदको जाने क्या समझता है, और किसीसे कहा होता तो कबका गोद में आ बैठा होता, इसको तो सबक सिखाना पड़ेगा.....

और सब मिलकर उसपर टूट पड़े।

अब उन्हें बिलकुल असली लड़ाई जैसा मज़ा आ रहा था।

-संजय ग्रोवर
23-07-2015

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

उनकी तरह सफ़ल होने की चाहत में


जिनके खि़लाफ़ लड़ रहा था
उन्हीं के समर्थन से लड़ने लगा

लड़ते-लड़ते
नाचने लगा

थका तो रुकना चाहा
मगर डोरियां तो उन्हीं के हाथ में दे दी थीं

अब नाचते रहने के सिवा
कोई चारा न था


-संजय ग्रोवर
10-10-2013

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