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गुरुवार, 13 जुलाई 2017

अफ़वाह की डगर पे...

पैरोडी


अफ़वाह की डगर पे चमचों चलो उछलके
इंजन कोई भी आए, डब्बे तुम्ही हो कल के

अपने हों या पराए, किसको नज़र है आए
ये ज़िंदगी है अभिनय, करना भी क्या है न्याय

रस्ते लगेंगे भारी, तुम हो ही इतने हलके
अफ़वाह की डगर पे.....

सबसे पटाके रक्खो, हर इक मिठाई चक्खो
कट्टर ख़्याल हों भी तो सेकुलर से ढक्को

हो जाओगे पॉपुलर, हर भीड़ देखो घुसके 
अफ़वाह की डगर पे.....

इंसानियत के सर पे हौले से पांव रखना
सादा के नाम पर भी कोई चालू दांव रखना

फिर देखो सब चलेंगे पीछे रपट-रपटके
अफ़वाह की डगर पे.....

हिंदू के घर में जाना, मुस्लिम के घर में जाना
है आदमी भी कोई, बिल्कुल ही भूल जाना

रख देना एक दिन यूं इंसान को मसलके
अफ़वाह की डगर पे.....



(शेष थोड़ी देर में)

-संजय ग्रोवर
14-07-2017

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मेरी बातों को दे दे रंग नया.....


ग़ज़ल

अक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या है
अपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!

मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!
ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?

पास जिनके रहन है तेरा ज़हन
उनके बारे में सोचता क्या है ?

हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़र
इसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !

हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असली
फिर अदाकारी में रखा क्या है !?

तू भी उनमें ही हो गया शामिल
हमको क्या लेना मामला क्या है

डर है, लालच है या है मजबूरी
तेरे पास और अब नया क्या है ?

हमने तेरा समाज देख लिया
अब भी पूछे है, माफ़िया क्या है !?

वो जो बिलकुल ही हैं तिरे जैसे
तू ही अब उनपे हंस रहा, क्या है!?

जिनका जीवन हो चुटकुले जैसा
उनमें कुछ राज़ ढूंढना! क्या है ?

साफ़ कुछ भी न बोल पाएगा
बच गई है तो बस अदा, क्या है

वो जो करते रहे इधर का उधर
उनके घर जाके ढूंढना क्या है!?

मेरी बातों को दे दे रंग नया
तेरे पास और अब बचा क्या है ?

ख़ुद तो ग़ालिब रहे अकेले-से
नाम पर उनके ये लगा क्या है !?

(माफ़ करना मिर्ज़ा, यह ज़रुरी था)


-संजय ग्रोवर
20-09-2016



सोमवार, 5 मई 2014

चमचे

चित्र गूगल के सौजन्य से

ये नाज़ुक कमर पर से ख़मदार चमचे
कि बख़्शा गया जिनको शौक़े-बधाई
है घुटनों में झन्कार सरमाया इनका
बेमतलब अहंकार इनकी कमाई

न आराम शब को न राहत सवेरे
दिखे मस्लहत बस लगाते हैं फेरे
लगे जिस घड़ी इनको मन सूना-सूना
लगा दें ये इक-दूसरे को भी चूना
ये हर एक को वायदा देने वाले
ये हर एक से फ़ायदा लेनेवाले

लचीली कमरवाले गर सर उठाएं
तो डर है न इनकी कमर टूट जाए
अगर ये किसी दिन अंगीठी पे उबलें
तो शायद जुदा शक़्ल ही लेके निकलें

कोई इनको इंसान के गुर सिखा दे
कोई इनकी पीछे की डंडी गिरा दे
-संजय ग्रोवर
05-02-2014
(साहब फ़ैज़ साहब से दुष्प्रेरित)

शनिवार, 3 मार्च 2012

ये पुस्तकों के मेले...


रेखाकृति: संजय ग्रोवर

ये पुस्तकों के मेले
दिल्ली में कम न होंगे
अफ़सोस हम भी होंगे

‘कुछ तो पड़ेगा लेना
थोड़ा चना-चबैना
मैंने तेरी ख़रीदी
अब तू भी मेरी ले ना!

कुछ तू भी मुझपे लिख दे'
बोलेंगे सब थकेले
ये पुस्तकों के मेले..

पुस्तक के संग पुस्तक
देती हैं ख़ुदपे दस्तक
‘बहिना, खड़ी रहेंगीं
हम अनबिकी-सी कब तक

सब देखकर निकलते
देते नहीं हैं धेले’
ये पुस्तकों के मेले...

‘इक दिन पड़ेगा झुकना
सरकारी मद में बिकना
फ़ैशनपरस्त पाठक
की रैक में क्या सजना

हम भी वही करेंगीं
जो करते हैं दलेले’
ये पुस्तकों के मेले...

--संजय ग्रोवर
रेखाकृति: संजय ग्रोवर


(पैरोडी बतर्ज़ ‘ये ज़िंदगी के मेले..’, फिल्म: मेला, गायक: मो. रफ़ी, संगीत...
नोट: ये सब लिखने से इम्प्रैशन अच्छा पड़ता है)

बुधवार, 30 मार्च 2011

दल्ला मेरे पीछे है तो सट्टा मेरे आगे..

बाज़ीचा-ए-क्रिक्रेट है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे

गो फ़ाइल को जुंबिश नहीं, बल्ले में तो दम है
हफ्ते से बड़ा हो गया छक्का मेरे आगे

कुछ तंज़ करने वालों से यूं कहती है क्रिकेट
दल्ला मेरे पीछे है तो सट्टा मेरे आगे

सर फोड़े है मुंह भींचके हॉकी मेरे होते
रोए है गला फाड़के फुटबॉल मेरे आगे

(मिर्ज़ा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित)

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