sarcasm लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
sarcasm लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 अगस्त 2019

दुनियादारी


लघुकथा

कुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।

और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।

अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।

-संजय ग्रोवर

05-08-2019


सोमवार, 6 अगस्त 2018

बच्चे न पैदा करने की सुंदर भावना पर एक निबंध


उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-


1.      बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा वो क्या बच्चा पैदा करेगा ?                        
                             
2.    फिर मैं गधा भी नहीं हूं कि किसी भी गधे का बाप बन जाऊं। जो हमारे पिताजी ने नहीं सोचा वो हम सोच लें तो क्या हर्ज़ है ? सोच के नाम पर हम हमेशा पीछे ही जाते रहेंगे क्या ? 

3.    सिर्फ बाप बनने के लिए दुनिया-भर के गधों से एडजस्ट करना (एक मुहावरे के अनुसार सबको बाप बनाना) मुझे नुकसान में रहना ही लगता है।
                                 
4.    सारी पृथ्वी एक परिवार है, कभी-कभी दूसरों के बच्चों से खेल लेने में हर्ज़ ही क्या है ? मैं तो जब भी घर से निकलता हूं, दूसरों के बच्चों से ही खेलता हूं। घर में अपने पिताजी के बच्चे यानि ख़ुदसे खेलता हूं।

5.     मुझे लगता है कि ‘मैं तो अपना ही बच्चा पैदा करुंगा, दूसरे बच्चों को दूसरे बच्चे ही समझूंगा’ यह घमंडी और स्वार्थी होने की पहचान है।

किसीको आपत्ति ?

-संजय ग्रोवर

04-08-2018


शनिवार, 7 जनवरी 2017

वही ढाक के तीन पात......


लघुकथा/व्यंग्य


‘एक बात बताओ यार, गुरु और भगवान में कौन बड़ा है ?’

‘तुम लोग हर वक़्त छोटा-बड़ा क्यों करते रहते हो.....!?’

‘नहीं.....फिर भी .... बताओ तो ....?’

‘गुरु बड़ा है कि छोटा यह बताने की ज़रुरत मैं नहीं समझता पर वह भगवान से ज़्यादा असली ज़रुर है क्यों कि वह वास्तविक है, हर किसीने उसे देखा होता है। किसीको मूर्ख भी बनाना हो तो यह काम उसे(गुरु को) ख़ुद ही करना पड़ता है। भगवान के बस का तो इतना भी नहीं है, वह हो तब तो कुछ करे......’
   
‘वाह-वाह, क्या बात बताई है, आजसे आप मेरे गुरु हुए......’

‘धत्तेरे की, तुम्हे कुछ तार्किक बात बताने से तो अच्छा है कि आदमी अपना
सर फोड़ कर दिमाग़ नाली में फेंक दे.......’


-संजय ग्रोवर

07-01-2017










बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी

पज़ल

इधर भी फ़र्ज़ी उधर भी फ़र्ज़ी
सिलते-सिलते थक गए दर्ज़ी

नीचे वाला चमचा बोला
ऊपर वाले तेरी मर्ज़ी

बहरे, मोहरे, चेहरे, दोहरे
टोपें-तोपें गरज़ी-वरज़ी

झूठ ही जीता, झूठ ही हारा
‘सच’ बोला यही मेरी मरज़ी

राज़ छुपाना काम है जिनका
उन्हींको दो पाने की अरज़ी

उनका तो नाटक भी दुख है
मेरी तो बांछे भी लरज़ी


-संजय ग्रोवर
05-10-2016

बुधवार, 23 मार्च 2016

हश्र

कविता

हम
विज्ञापन कला के
सर्वाधिक प्रभावशाली दौर से
गुज़र रहे हैं

भगतसिंह, गांधी और अंबेडकर जैसे नाम
विभिन्न राजनैतिक दलों और संस्थाओं के लिए
मरणोपरांत 
मॉडलिंग कर रहे हैं.

-संजय ग्रोवर

24-03-2016
(एक पुरानी कविता थोड़े बदलाव के साथ)

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!

ग़ज़ल

किसीने दी जो उनको ग़ाली है-
क्या उनकी फ़िल्म आनेवाली है !?
16-12-2015

शौक़े-मशहूरी भी ग़ज़ब है जनाब!
ख़ूब तरक़ीब भी निकाली है 

मूर्ख आपस में उलझ जाएंगे-
आपकी मौज आनेवाली है
31-12-2015

वो जो नक़ली हैं, सर पे बैठे हैं
जो बिठाए, बेचारा जाली है !?

आप छेड़ें तो ये हुनर है जनाब
और वो दूसरा, मवाली है !?
16-12-2015

-संजय ग्रोवर
31-12-2015



गुरुवार, 30 जुलाई 2015

इतना ही कर दो

लघुव्यंग्य

ईमानदार आदमी रास्ते से निकल रहा था।

चौक पर बेईमान बैठे थे, आदतन छेड़ने लगे-

‘‘भैय्या क्या मिला ईमानदारी से, ईमानदार तो हम कहलाते हैं, रेडियो-टीवी पे बुलाए जाते हैं, अख़बार हमारे गुन गाते हैं, तमग़े हम पर लगाए जाते हैं.....बोलो-बोलो....

‘न मैं टीवी पर आता हूं न अख़बार में, न तो नाम पाता हूं न ईनाम पाता हूं, न तुम पर ध्यान देता हूं न बदनामी पर......फिर भी ईमानदार हूं.....यही मेरी उपलब्धि है, यही मज़ा है.....तुम इतना ही करके दिखा दो !’

ईमानदार आदमी कहते हुए अपने रास्ते निकल गया।

-संजय ग्रोवर
31-07-2015


गुरुवार, 11 जून 2015

जाली बनाम अदृश्य सर्टीफ़िकेट

जाली सर्टिफ़िकेट देने का सबसे ज़्यादा चलन साहित्य में रहा है। ये सर्टीफ़िकेट और इन्हें जारी करनेवाली संस्थाएं अमूर्त्त क़िस्म की होतीं हैं। इन अमूर्त्त सर्टीफ़िकेटों को ‘आर्शीवाद’, ‘हौसला-अफ़ज़ाई’, ‘पुरस्कार’, ‘समीक्षा’, ‘प्रोत्साहन’ जैसे नामों के तहत जारी किया जाता है।

इसकी मूलप्रेरणा सर्टीफ़िकेटजारीकर्त्ताओं को ‘अपना आदमी’, ‘ख़्याल रखनेवाला आदमी’, ‘सहयोग करनेवाला आदमी’, ‘अपनी बिरादरी का आदमी’, ‘अपने जैसा आदमी’, 
‘मिलते-जुलते रहने वाला आदमी‘, ‘सबसे पटाके रखनेवाला आदमी’, ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे वाला आदमी’  जैसे साहित्य के मूलतत्वों से मिलती है। भारतीय साहित्य बाज़ार में इन अमूर्त्त संस्थाओं की ढेरों दुकानें अलग-अलग नामों से चलतीं रहीं हैं। 

आजकल ये पूरे प्राणपण से फ़ेसबुक पर अपना बाज़ार जमाने की कोशिश में जुटीं हैं। इनकी प्रकट विनम्रता देखकर लगता है कि आप अगर सहयोग करें तो साहित्य की ये चलती-फ़िरती यूनिवर्सिटियां होम डिलीवरी की सेवा भी प्रदान करतीं होंगीं।

इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि आप चाहें न चाहें, पर ये ज़बरदस्ती आ-आकर आपको सर्टीफ़िकेट देतीं हैं। आप कहतें रहें कि भई आप कौन!? हमारी सर्टीफ़िकेट में दिलचस्पी ही नहीं है, मगर ये नहीं मानतीं। इनके संस्कार बड़े तगड़े हैं। ये नाराज़ हो जातीं हैं। ये कहतीं हैं कि अगर हमसे सर्टीफ़िकेट न लोगे तो हम प्रचारित करेंगे कि तुम सर्टीफ़िकेट के लायक ही नहीं हो।

अभी पीछे एक-दो पागलों ने बोल दिया कि यूनिवर्सिटी जी, हम वाक़ई लायक नहीं हैं, बल्कि लायक होने में हमें शर्म आने लगी है, और आप जिस लायक हो वो आप कर ही रही हो, फ़िर इतनी परेशान क्यों हो ?

ऐसा सुनकर यूनिवर्सिटी और परेशान हो गई, परेशान होकर अपने संस्थापक के पास पहुंच गई कि गुरुजी, पागल तो ऐसा-ऐसा बोल रहा है, अब क्या जवाब देना है ?

अब देखो, लौटकर आती है तो क्या कहती है, यूनिवर्सिटी ?

वैसे न ही आए तो अच्छा है।

वरना पढ़े-लिखे अनपढ़ो की तरह पागल भी पढ़े-लिखे पागलों में तब्दील न हो जाएं।



-संजय ग्रोवर
11-06-2015

शनिवार, 6 जून 2015

ईश्वर बनाम परदा

व्यंग्य

ईश्वर कभी सामने क्यों नहीं आता, वह परदे में क्यों रहता है ?

1. वह अपने ही बनाए लोगों से डरता है.

2. वह शर्मीला है, बहुत ज़्यादा शर्मीला है.

3. उसकी सोच बहुत पिछड़ी हुई है.

4. वह इस व्यवहारिक दुनिया की सर्दी और गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसलिए ख़्वाबों-ख़्यालों में रहना पसंद करता है.

5. उसे हिंदी, अग्रेज़ी, चीनी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन.....कोई भाषा नहीं आती.....वह बात कैसे करेगा ?

6. ईश्वर के कपड़े मैले हो गए हैं, उसने ऑनलाइन ऑर्डर दे रखा है और नये कपड़ों का इंतज़ार कर रहा है.....

7. ईश्वर डरता है कि लोग उसे पहचानेंगे कैसे! क्योंकि सारी दुनिया में उसकी इतनी अलग़-अलग़ तरह की तस्वीरें डिस्ट्रीब्यूट की गई हैं कि किसी एक तस्वीर की शक़्ल दूसरी तस्वीर से नहीं मिलती. और असली ईश्वर को किसीने देखा नहीं है.

8. ईश्वर मिठाई से डरता है, वह जानता है कि लोग उसकी मूर्तियों तक को मिठाई के अलावा कुछ नहीं देते। ऊपर से उसकी जान-पहचान में कोई अच्छा डॉक्टर नहीं है जो डाइबिटीज़ का इलाज जानता हो.

9. ईश्वर बीमार है और इस हालत में लोगों के सामने आया तो लोगों का विश्वास उसपर से उठ जाएगा.

10. असलियत ईश्वर नहीं है असलियत तो वह परदा है जिसके पीछे उसे बनानेवालों का यह राज़ छुपा है कि ईश्वर सिर्फ़ एक झूठ है.

???

-संजय ग्रोवर


05-06-2015

ब्लॉग आर्काइव