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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

प्रायोजित


PHOTO by Sanjay Grover


सुना है प्रायोजित मंथन से प्रायोजित अमृत और प्रायोजित ज़हर निकला।

पहले तो प्रायोजितजन ने ख़ुदको देवताओं और राक्षसों में बांट लिया ( कहीं बाद में कोई झगड़ा न पड़ जाए)।

तब काम आसान हो गया।


और राक्षसों और देवताओं ने विष और अमृत आधा-आधा बांट लिया।

दोनों के हिस्से में आधा-आधा विष और आधा-आधा अमृत आया।

तब विष और अमृत एक-दूसरे के प्रभाव और दुष्प्रभाव से नष्ट हो गए।

इसके बाद देवतओं और राक्षसों ने भी आपस में महाभारत कर लिया और विनष्ट हो गए।

अब बचा हाभारत जहां सिर्फ़ लाशें बची रह गईं।

कभी-कभी वे आपस में लड़तीं हैं।

अपना टाइम पास करतीं हैं। 


( प्रायोजित स्वतःस्फ़ूर्तों को समर्पित )


-संजय ग्रोवर
08-02-2018

रविवार, 21 अगस्त 2016

भ्रामक

लघुकथा/व्यंग्य

मुझे उससे बात करनी थी।



‘मेरे पास आज जो कुछ भी है सब ईश्वर का दिया है’, वह बोला।
‘जो करता है ईश्वर ही करता है, उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’, वह फिर बोला।
‘आप मेरे पास बात करने आए, ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है’, एक बार फिर उसने किसी ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।



‘ठीक है, जब सब ईश्वर ने ही किया है तो मैं बात भी उन्हींसे कर लूंगा’, मैंने कहा,‘आप उन्हें बुलाकर मुझे सूचित कर दीजिएगा या साथ लेकर मेरे घर आ जाईएगा....’, बात पूरी करके मैं चला आया।



तबसे आज तक न तो कोई सूचना आई है न वे ख़ुद आए हैं।

-संजय ग्रोवर
21-08-2016



शनिवार, 6 जून 2015

ईश्वर बनाम परदा

व्यंग्य

ईश्वर कभी सामने क्यों नहीं आता, वह परदे में क्यों रहता है ?

1. वह अपने ही बनाए लोगों से डरता है.

2. वह शर्मीला है, बहुत ज़्यादा शर्मीला है.

3. उसकी सोच बहुत पिछड़ी हुई है.

4. वह इस व्यवहारिक दुनिया की सर्दी और गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसलिए ख़्वाबों-ख़्यालों में रहना पसंद करता है.

5. उसे हिंदी, अग्रेज़ी, चीनी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन.....कोई भाषा नहीं आती.....वह बात कैसे करेगा ?

6. ईश्वर के कपड़े मैले हो गए हैं, उसने ऑनलाइन ऑर्डर दे रखा है और नये कपड़ों का इंतज़ार कर रहा है.....

7. ईश्वर डरता है कि लोग उसे पहचानेंगे कैसे! क्योंकि सारी दुनिया में उसकी इतनी अलग़-अलग़ तरह की तस्वीरें डिस्ट्रीब्यूट की गई हैं कि किसी एक तस्वीर की शक़्ल दूसरी तस्वीर से नहीं मिलती. और असली ईश्वर को किसीने देखा नहीं है.

8. ईश्वर मिठाई से डरता है, वह जानता है कि लोग उसकी मूर्तियों तक को मिठाई के अलावा कुछ नहीं देते। ऊपर से उसकी जान-पहचान में कोई अच्छा डॉक्टर नहीं है जो डाइबिटीज़ का इलाज जानता हो.

9. ईश्वर बीमार है और इस हालत में लोगों के सामने आया तो लोगों का विश्वास उसपर से उठ जाएगा.

10. असलियत ईश्वर नहीं है असलियत तो वह परदा है जिसके पीछे उसे बनानेवालों का यह राज़ छुपा है कि ईश्वर सिर्फ़ एक झूठ है.

???

-संजय ग्रोवर


05-06-2015

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

भगवान और बेईमान

व्यंग्य



करना कुछ नहीं है बस एक शब्द बदल देना है और फिर सब कुछ एकदम स्पष्ट है।

मान लीजिए कोई शक्ति है जो दुनिया को चला रही है, उसका एक नाम रख लेते हैं-बेईमान। अब देखिए-

*बेईमान सर्वशक्तिमान है, सर्वत्रविद्यमान है।

*बेईमान की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।

*बेईमान कण-कण में विराज़मान है। उसके रुप अलग़-अलग़ हैं पर बेईमान एक ही है। क्या पक्ष, क्या विपक्ष, सब तरफ़ बेईमान की सत्ता है।

*या बेईमान! तेरा ही आसरा।

*मैं सिर्फ़ बेईमान से डरता हूं।

*स्साल्ला! बेईमान को नहीं मानता!? देखना एक न एक दिन ज़रुर पागल हो जाएगा।

*अगर बेईमान नहीं है तो लोग मर कैसे जाते हैं ? आदमी मरता है इससे पता चलता है कि बेईमान है।

*बेईमान की लाठी में आवाज़ नहीं होती।

*सब बेईमान के हाथ में है, जो वो चाहेगा, वही होगा।

*संसार से भागे फिरते हो, बेईमान को तुम क्या पाओगे ?

*एक न एक दिन सबको बेईमान के पास जाना है।

*तुम्हे कभी सफ़लता नहीं मिल सकती क्योंकि तुम बेईमान को नहीं मानते।

*ये नास्तिक कितने दुष्ट हैं! बेईमान तक को नहीं मानते।

*रात सपने में स्वयं बेईमान ने मुझे दर्शन दिए, ज़रुर आज कुछ न कुछ फ़ायदा होगा।

*उसे देखो, कितना बड़ा आदमी है मगर आज भी नियमित रुप से बेईमान के पास जाता है।

*बेईमान ने हमें कितना कुछ दिया है, उसका शुक्रिया तो अदा करना ही चाहिए।

*बेईमान के चरणों में बैठकर जो सुख मिलता है, दुनिया की किसी शय में नहीं मिलता।

..................इस तरह आप पाएंगे कि दुनिया की सारी समस्याएं सुलझ गई हैं, सारे रहस्य मिट गए हैं, कोई कन्फ़्यूज़न बाक़ी नहीं है।

-संजय ग्रोवर
01 अप्रैल 2015

         बेईमान, ईश्वर के भेद, रहस्यवाद, नास्तिक, भगवान, God, satire, व्यंग्य, तंज

बुधवार, 20 अगस्त 2014

महसूस तो करो

मैंने उसे ख़ाली कप दिया और कहा,‘‘लो, चाय पियो।’’

वह परेशान-सा लगा, बोला, ‘‘मगर इसमें चाय कहां है, यह तो ख़ाली है!’’

‘‘चाय है, आप महसूस तो करो।’’

‘‘आज कैसी बातें कर रहे हो, मैं ऐसे मज़ाक़ के मूड में बिलकुल नहीं हूं !?’’

‘‘मज़ाक़ कैसा ? क्या ईश्वर मज़ाक़ है ? ईश्वर ने ही मुझे आदेश दिया है कि मेरे माननेवालों को बिलकुल मेरे जैसी चाय दो जिसका न कोई रंग हो, न गंध हो, न कोई आकार हो, न स्वाद हो, न पेट भरता हो, न ताज़ग़ी आती हो, न बीमारी मिटती हो.............लब्बो-लुआब यह कि जिससे कुछ भी न होता हो मगर फिर भी महसूस होती हो.....आप महसूस तो करो!’’

‘‘ईश्वर ने तुम्हे आदेश दिया, तुमसे बात की! कैसे की ?’’

‘‘जैसे तुमसे करता है।’’

‘‘छोड़ो, क्या बकवास ले बैठे........’’

‘‘ईश्वर की बात तुम्हे बकवास लगती है!? ईश्वर ने मुझसे कहा कि मुझे माननेवालों को सब कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लोग मुझे बेहतर ढंग से महसूस करें ; वे कपड़े भी ऐसे पहनें जो दिखें या न दिखें मगर महसूस हों, वे ऐसे मकानों में रहें जिनका पता भी किसीको न दिया जा सके मगर उन्हें महसूस हो कि वे मकान में रह रहे हैं, इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे महसूस कर पाएंगे....ईश्वर ने मुझसे यह भी कहा कि जो चीज़ें मेरे जैसी नहीं हैं यानि कि साफ़ दिखाई पड़तीं हैं और लोगों के काम आती हैं वे सब मेरे मानने वाले मुझे न माननेवालों को दे दें क्योंकि वे महसूस नहीं कर सकते इसलिए उन्हें सचमुच की चीज़ें चाहिएं........’’

‘‘क्या अनाप-शनाप बोल रहे हो! तुम कब ईश्वर को मानते हो?’’

‘‘हां मैं नहीं मानता मगर तुम साबित करके दिखाओ कि मैं नहीं मानता.....’’

-संजय ग्रोवर
19-08-2014

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