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रविवार, 5 फ़रवरी 2017

बेईमानी

लघुकथा

वह हमारे घरों, दुकानों, दिलों और दिमाग़ों में छुपी बैठी थी और हम उसे जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में ढूंढ रहे थे।


-संजय ग्रोवर
05-02-2017

शनिवार, 7 जनवरी 2017

वही ढाक के तीन पात......


लघुकथा/व्यंग्य


‘एक बात बताओ यार, गुरु और भगवान में कौन बड़ा है ?’

‘तुम लोग हर वक़्त छोटा-बड़ा क्यों करते रहते हो.....!?’

‘नहीं.....फिर भी .... बताओ तो ....?’

‘गुरु बड़ा है कि छोटा यह बताने की ज़रुरत मैं नहीं समझता पर वह भगवान से ज़्यादा असली ज़रुर है क्यों कि वह वास्तविक है, हर किसीने उसे देखा होता है। किसीको मूर्ख भी बनाना हो तो यह काम उसे(गुरु को) ख़ुद ही करना पड़ता है। भगवान के बस का तो इतना भी नहीं है, वह हो तब तो कुछ करे......’
   
‘वाह-वाह, क्या बात बताई है, आजसे आप मेरे गुरु हुए......’

‘धत्तेरे की, तुम्हे कुछ तार्किक बात बताने से तो अच्छा है कि आदमी अपना
सर फोड़ कर दिमाग़ नाली में फेंक दे.......’


-संजय ग्रोवर

07-01-2017










रविवार, 21 अगस्त 2016

भ्रामक

लघुकथा/व्यंग्य

मुझे उससे बात करनी थी।



‘मेरे पास आज जो कुछ भी है सब ईश्वर का दिया है’, वह बोला।
‘जो करता है ईश्वर ही करता है, उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’, वह फिर बोला।
‘आप मेरे पास बात करने आए, ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है’, एक बार फिर उसने किसी ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।



‘ठीक है, जब सब ईश्वर ने ही किया है तो मैं बात भी उन्हींसे कर लूंगा’, मैंने कहा,‘आप उन्हें बुलाकर मुझे सूचित कर दीजिएगा या साथ लेकर मेरे घर आ जाईएगा....’, बात पूरी करके मैं चला आया।



तबसे आज तक न तो कोई सूचना आई है न वे ख़ुद आए हैं।

-संजय ग्रोवर
21-08-2016



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