एक ऐसी जगह है जहां लोग, अकसर, घंटों अकेले बातचीत करते हैं.
*पागलखाना* ==== बचकाना, अहमकाना, बेवकूफ़ाना, जाहिलाना, फ़लसफ़ाना, फ़लाना, ढिकाना....सब कुछ अनियोजित, अनियंत्रित, अनियमित, अघोषित....जब हमें ही कुछ नहीं पता तो आपको कैसे बताएं कि हम क्या करने वाले हैं....
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बुधवार, 17 अगस्त 2016
बुधवार, 10 अगस्त 2016
Baat Se Baat-7/बात से बात-7/(आ भी जाओ कभी)
एक ऐसी जगह है जहां लोग, अकसर, घंटों अकेले बातचीत करते हैं.
गुरुवार, 28 जुलाई 2016
बात से बात-4 (भगवान न चाहे तो इतिहास में कैसे जाओगे !)
एक ऐसी जगह है जहां लोग, अकसर, घंटों अकेले बातचीत करते हैं.
बुधवार, 4 मार्च 2015
प्रतीक, प्रतिनिधि, प्रचार और प्रहसन
दो-तीन लफ़ंडरों ने सारा आसमान सर पर उठा रखा था।
पहले वे ख़ुद ही एक-दूसरे को चपत मारकर भाग जाते, फ़िर शोर मचा देते कि ‘हाय! कोई हमें मार गया, हाय! कौन मार गया!?’
दोपहर को वे छानबीन करते कि आखि़र वह कौन है जो रोज़ाना हमें मारकर भाग जाता है।
शाम को वे घोषणा करते कि संकट टल गया है, अब कोई परेशानी नहीं आएगी, यह नहीं होना चाहिए था पर हुआ मगर अब नहीं होगा।
और अगले संकट की तैयारी में जुट जाते।
पिछले कई सालों से कॉलोनी का सारा चंदा इसीमें ख़र्च हुआ जा रहा था!
कॉलोनी को भी खाज-खुजली में ख़ूब आनंद आता था।
वह भी चंदा दिए जा रही थी।
और रोए जा रही थी कि हाय! कहीं कुछ नहीं होता! आखि़र क्यों नहीं होता ?
-संजय ग्रोवर
04-03-2015
पहले वे ख़ुद ही एक-दूसरे को चपत मारकर भाग जाते, फ़िर शोर मचा देते कि ‘हाय! कोई हमें मार गया, हाय! कौन मार गया!?’
दोपहर को वे छानबीन करते कि आखि़र वह कौन है जो रोज़ाना हमें मारकर भाग जाता है।
शाम को वे घोषणा करते कि संकट टल गया है, अब कोई परेशानी नहीं आएगी, यह नहीं होना चाहिए था पर हुआ मगर अब नहीं होगा।
और अगले संकट की तैयारी में जुट जाते।
पिछले कई सालों से कॉलोनी का सारा चंदा इसीमें ख़र्च हुआ जा रहा था!
कॉलोनी को भी खाज-खुजली में ख़ूब आनंद आता था।
वह भी चंदा दिए जा रही थी।
और रोए जा रही थी कि हाय! कहीं कुछ नहीं होता! आखि़र क्यों नहीं होता ?
-संजय ग्रोवर
04-03-2015
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