शनिवार, 20 जनवरी 2018

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी/माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

ग़ज़ल

इससे जो मिलके काम करता है
माफ़िया एहतिराम करता है

तुम्हारा डर है माफ़िया की ख़ुशी
माफ़िया ऐसे काम करता है

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी
माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

हिंदू, मुस्लिम हैं सब क़ुबूल इसे
माफ़िया आदमी से डरता है

नाम, पैसा, रुआब क्या चहिए
माफ़िया इंतज़ाम करता है


माफ़िया के जो काम आ जाए
नाम उसके इनाम करता है

माफ़िया से मिला लो हाथ अगर
माफ़िया ओस जैसे झरता है

तुम भले शब्द एक ही बोलो
माफ़िया अर्थ चार करता है

माफ़िया दाएं भी है बाएं भी
माफ़िया चमत्कार करता है

माफ़िया कितना तो अकेला है
मुझ अकेले पे वार करता है

आपमें दम है अगर, शक़ करलो
माफ़िया सबसे प्यार करता है

माफ़िया है, जवाब क्यों देगा!
माफ़िया बहिष्कार करता है 

माफ़िया को शरम नहीं आती
वो तो बस शर्मसार करता है

माफ़िया यूं बड़ा ही सामाजिक
सारे पीछे से काम करता है

माफ़िया इसका, उसका, सबका है
जो भी उसको सलाम करता है

ख़ुद कोई क्यों तमाम होगा भला
माफ़िया सबका काम करता है


-संजय ग्रोवर
20-01-2018




सोमवार, 25 सितंबर 2017

भुला दे डर, ज़रा नये तरह से डर

एक चैनल का यह विज्ञापन आपने देखा होगा। इसमें सर्वश्री/सुश्री अजय देवगन, धोनी, महिला खिलाड़ी आदि आती-जाते हैं।

देखकर लगता है कि भारत में अजय देवगन, महेंद्र धोनी व महिला से पहले न तो कोई ऐक्टिंग करता था, न खेलता था, न ....

एक दिन इन्होंने निर्णय लिया कि कुछ भी हो हम तो खेलेंगे, कैसी भी करें, ऐक्टिंग तो करेंगे, महिलाएं भी खेलेंगे....

तब इन्होंने ख़ुद स्टेडियम बनाए, बल्ले बनाए, दर्शक बनाए, लोगों को बनाया और शुरु कर दिया, बनाए ही रखा.......

इसके बाद लोगों को, बने हुए लोगों को समझ में आया कि बनते कैसे हैं और बनाते कैसे हैं, ऐसे किया जाता है कुछ अलग कर.....

वैसे मैं कुछ-कुछ धोनी को भी पसंद करता हूं और देवगन को भी, महिला याद नहीं आ रहीं, शायद उन्हें भी पसंद करता होऊं....

पर मेरी समस्या (या साहस) यह है कि मैं डर के मारे किसीको भी पसंद नहीं कर सकता !

(यह विज्ञापन चालू रखें वरना आनेवाली पीढ़ियों को भारत का बौद्धिक इतिहास कैसे पता चलेगा ?)

-संजय ग्रोवर
25-09-2017
(चलते-चलते: सुना है आज राहुल गांधी फिर मंदिर चले गए ; भुला दे डर, भगवान तक से डर)

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