रविवार, 13 नवंबर 2022

पाबंद का छंद

सुबह सैर को चल दिए, कविवर का आनंद

नियमित बेईमान थे नियमों के पाबंद


नियमों के पाबंद ने इक दिन काम निकाला

पैसे लेजा पैसे देकर काम कराला 


दूजा बोला कवि  हो या हो भ्रष्टाचारी

बोले इसपर भी लिक्खूंगा कविता प्यारी


-संजय ग्रोवर




गुरुवार, 21 जनवरी 2021

ख़ाली लोग व्यस्त लोग


लोगों को बताया गया कि कुछ न कुछ करते रहो, ख़ाली मत बैठो नही तो


पागल हो जाओगे.

शताब्दियां बीत गई पर लोगों की खोपड़ियों में से यह बात नहीं निकली. 


अब वे भले पागलपन करते रहें पर ख़ाली कभी नहीं बैठते.



-संजय ग्रोवर


रविवार, 7 जून 2020

संस्कार



पापा अपने बच्चे के साथ घूमने निकले.
निकले ही थे कि राह में नाली दिखी.
बच्चा तो बच्चा है, बोला-
‘‘देखो पापा, कित्ती बदबू! कित्ता कीचड़!’’
‘‘हप्प’-पापा ने डांटा, फिर समझाया-‘अपने देश की नाली के बारे में ऐसा थोड़ी बोलते हैं’’
‘‘हुम्म‘-बच्चे ने सोचा, फिर बोला-’तो फिर आज घूमने किसी दूसरे देश में ले चलोगे ?’’

-संजय ग्रोवर
07-06-2020

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

झूठी लघुकथा


व्यवस्था ने निर्णय लिया कि ‘बेईमाना’ को, जहां है वहीं, सील कर दिया जाए।
लेकिन स्टाफ़ की कमी के कारण इसके क्रियान्वन में भारी व्यवधान हुआ।
हुआ यह कि जिसको भी ‘बेईमाना’ रोकने को भेजा जाता वह ख़ुद ही बेईमान निकलता और ईमानदारी की तरह ग़ायब हो जाता।
सुना है कि व्यवस्था अब विदेश से ईमानदार स्टाफ़ मंगाने पर विचार कर रही है।  


(लघुकथा झूठी इसलिए भी है कि ईमानदार व्यवस्था कभी कहीं देखी ही नहीं गई)

-संजय ग्रोवर

रविवार, 17 नवंबर 2019

बधाई


‘बड़ी अच्छी  जुगाड लगाई यार तूने, ंि दी  कादमी में लग गया! बधाई हो!’
‘तू भी तो हुर्दू कादमी में फ़िट हो गया, तुझे भी बधाई!’
‘इसी को तो कहते हैं ं गा-अमुना संस्कृति’
‘अब तो पारदर्शिता का ज़माना है, अब तो हम खुलकर इसे कह सकते हैं
-ॉग्रेस-ीजेपी संस्कृति’! 

सोमवार, 5 अगस्त 2019

दुनियादारी


लघुकथा

कुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।

और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।

अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।

-संजय ग्रोवर

05-08-2019


शनिवार, 20 अप्रैल 2019

ऐन वक़्त पर होता है

ग़ज़ल

कोई छुपकर रोता है
अकसर ऐसा होता है

दर्द बड़ा ही ज़ालिम है
ऐन वक़्त पर होता है








शेर अभी कमअक़्ल है ना
अभी नहीं मुंह धोता है

तुम ही कुछ कर जाओ ना
वक़्त मतलबी, सोता है

वो मर्दाना नहीं रहा
यूं वो खुलकर रोता है
-संजय ग्रोवर

सोमवार, 25 मार्च 2019

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं

ग़ज़ल

ये तो हारा हुआ घराना है
इस ज़माने को क्या हराना है

ये तो बचपन से मैंने देखा है
ये ज़माना भी क्या ज़माना है

वक़्त से दोस्ती करो कैसे
वक़्त का क्या कोई ठिकाना है

सच का हुलिया ज़रा बयान करो
सच को सच से मुझे मिलाना है

सचके बारे में झूठ क्या बोलूं
सच भी झूठों के काम आना है

सचसे बच्चों को डराता है तमाम
झूठ भी कितना वहशियाना है

मेरा जो सच है, मेरा अपना है
इसको झूठा नहीं बनाना है 

-संजय ग्रोवर
26-03-2019

सोमवार, 14 जनवरी 2019

मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी है

Photo by Sanjay Grover


चांद से चिट्ठी आई है के दुनिया आनी-जानी है 
मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी है

गांधीजी का नाम रटो हो, पहने हो जैकेट और कोट
लंगोटी के नाम पे फिर क्यूं मरी तुम्हारी नानी है

आधी-पौनी दिखे सचाई,समझा ख़ुदको ज्ञानी है
अंधे कैसे होते होंगे गर ये दुनिया कानी है

सभी हुक़ूमत करना चाहें इल्मी-फ़िल्मी-राजा लोग
गांधी जैसी बात चले तो-‘बस इक रोटी खानी है’

ईद और करवाचौथ करो हो, देख-देखके चांद का मुह
आज ही क्यों ना चांद पे जाओ, ये दुनिया तो फ़ानी है


-संजय ग्रोवर
15-01-2019



मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

सच में या अफ़साने में / मंटो पागलखाने में


ग़ज़ल 
created by Sanjay Grover











सच में या अफ़साने में
मंटो पागलखाने में

मंटो, तेरे और मेरे
है क्या फ़र्क़ ज़माने में

सच लोगों को भाता हैं
सिर्फ़ रहे जब गाने में

झूठ को मैंने खोया है
अपने सच को पाने में

हर पगले का नाम लिखा
सच के दाने-दाने में

-संजय ग्रोवर
02-10-2018

सोमवार, 6 अगस्त 2018

बच्चे न पैदा करने की सुंदर भावना पर एक निबंध


उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-


1.      बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा वो क्या बच्चा पैदा करेगा ?                        
                             
2.    फिर मैं गधा भी नहीं हूं कि किसी भी गधे का बाप बन जाऊं। जो हमारे पिताजी ने नहीं सोचा वो हम सोच लें तो क्या हर्ज़ है ? सोच के नाम पर हम हमेशा पीछे ही जाते रहेंगे क्या 

3.    सिर्फ बाप बनने के लिए दुनिया-भर के गधों से एडजस्ट करना (एक मुहावरे के अनुसार सबको बाप बनाना) मुझे नुकसान में रहना ही लगता है।
                                 
4.    सारी पृथ्वी एक परिवार है, कभी-कभी दूसरों के बच्चों से खेल लेने में हर्ज़ ही क्या है ? मैं तो जब भी घर से निकलता हूं, दूसरों के बच्चों से ही खेलता हूं। घर में अपने पिताजी के बच्चे यानि ख़ुदसे खेलता हूं।

5.     मुझे लगता है कि ‘मैं तो अपना ही बच्चा पैदा करुंगा, दूसरे बच्चों को दूसरे बच्चे ही समझूंगा’ यह घमंडी और स्वार्थी होने की पहचान है।

किसीको आपत्ति ?

-संजय ग्रोवर

04-08-2018


गुरुवार, 21 जून 2018

सच जब अपनेआप से बातें करता है

ग़ज़ल
creation : Sanjay Grover












सच जब अपनेआप से बातें करता है
झूठा जहां कहीं भी हो वो डरता है

दीवारो में कान तो रक्खे दासों के
मालिक़ क्यों सच सुनके तिल-तिल मरता है

झूठे को सच बात सताती है दिन-रैन
यूं वो हर इक बात का करता-धरता है

सच तो अपने दम पर भी जम जाता है
झूठा हरदम भीड़ इकट्ठा करता है

झूठ के पास मुखौटा है किरदार नहीं
सच की ख़ाली जगह वही तो भरता है 


-संजय ग्रोवर
21-06-2018

बुधवार, 9 मई 2018

दो लोगों में इक सच्चा इक झूठा है....

By Sanjay Grover
ग़ज़ल



पहले सब माहौल बनाया जाता है
फिर दूल्हा, घोड़े को दिखाया जाता है

झूठ को जब भी सर पे चढ़ाया जाता है

सच को उतनी बार दबाया जाता है

दो लोगों में इक सच्चा इक झूठा है

बार-बार यह भ्रम फैलाया जाता है


आपस में यूं मिलने-जुलने वालों में

बारी-बारी भोग लगाया जाता है

जिन्हें ज़बरदस्ती ही अच्छी लगती है

उनको घर पे जाके मनाया जाता है

गिरे हुए भी कई बार गिर जाते हैं
कुछ लोगों को यूं भी उठाया जाता है

देते हैं जो सबको भिक्षा की शिक्षा
उनसे ही हर मंच सजाया जाता है

वर्तमान में अगर नहीं कुछ करना हो
मिल-जुलकर इतिहास बताया जाता है

बननेवाले बार-बार बन जाते हैं
फिर भी बारम्बार बनाया जाता है




-संजय ग्रोवर
09-05-2018

बुधवार, 21 मार्च 2018

विज्ञों को सम्मान चाहिए / चमचों को विद्वान चाहिए

ग़ज़ल
PHOTO by Sanjay Grover







विज्ञों को सम्मान चाहिए
चमचों को विद्वान चाहिए

जिनके अंदर शक्ति बहुत है
उनमें थोड़ी जान चाहिए

बुद्वि थोड़ा कम भी चलेगी
बड़े-बड़े बस कान चाहिए


पीठ प चढ़के सर पे चढ़ गए
सबको ही उत्थान चाहिए

आंदोलन वो करके रहेंगे
बस खुल्ला मैदान चाहिए

अंजुलि में श्रद्धा भर लाओ
हमको तो बस दान चाहिए

इज़्ज़त, शोहरत, दौलत-वौलत
सबको बड़ा मसान चाहिए

तुमको हिंदुस्तान चाहिए
और मुझको इंसान चाहिए

हर विचार तो मारा तुमने
अब क्या मेरी जान चाहिए





-संजय ग्रोवर
19/21-03-2018


सोमवार, 19 मार्च 2018

सच क्यों करे भरोसा सबका

 ग़ज़ल
PHOTO by Sanjay Grover







सच को ना औज़ार चाहिए
कुछ पागल तैयार चाहिए

सच क्यों जाए मंदिर-मस्ज़िद
सच को सच्चे यार चाहिए

सच क्यों करे भरोसा सबका !
सच तुमको बीमार चाहिए !

सच ना पंजाबी-मद्रासी
सच को सच्चा प्यार चाहिए

कौन जिया है सच की ख़ातिर
सब को इश्तेहार चाहिए 

सच अपने पैरों प खड़ा है
सच को ना गुरु-द्वार चाहिए
      
करनी है गर सच से दोस्ती
ज़हनो-दिल तैयार चाहिए

झूठों का संयुक्त माफ़िया
सच में पूरी धार चाहिए

सच न माफ़िया, सच न काफ़िया
सच को सच तकरार चाहिए




-संजय ग्रोवर
19/20-03-2018

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

तजुर्बा और तजुर्बेकार

PHOTO by Sanjay Grover



वे अकेले पड़ गए थे।
कोई समाज था जो उन्हें स्वीकार नहीं रहा था।
कोई भीड़ थी जो उनके खि़लाफ़ थी।
कोई समुदाय था जो उन्हें जीने नहीं दे रहा था।
कोई व्यवस्था थी जो उनसे नफ़रत करती थी।
कोई बेईमानी थी जिसने उनके खि़लाफ़ साजिश रची थी।

मैंने बस थोड़ी-सी मदद कर दी थी, इतना भर कि वो सभल जाएं, मुसीबत से निकल जाएं। ज़्यादा की नहीं बस दस-पांच की।

मेरी हैसियत ही क्या थी ? सिर्फ़ इतना कि ‘चलो जो होगा देखा जाएगा’ और मैं अकेले उनके साथ खड़ा हो गया।

और पता है मुसीबत से ज़रा-सा निकलते ही उन्होंने क्या किया ?

वे मुझे उसी भीड़, उसी समाज, उसी समुदाय, उसी व्यवस्था, उसी बेईमानी, उसी माफ़िया से बनाके रखने के फ़ायदे बताने लगे जिनके खि़लाफ़....

जैसे वे कोई नयी बात बता रहे हों...

उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि अगर मैं उसी मानसिकता का प्रतिनिधि होता तो मैं अकेला उनके साथ खड़ा कैसे हो जाता !

अगर मैं उसी बेईमानी को पसंद करता होता तो मैं शुरु से ही बेईमानों के साथ होता, उनके साथ नहीं .....



इतना ज़रुर कहूंगा कि अकेला तो मैं अकसर रहा पर अब अकेलेपन से डर नहीं लगता, अकेलापन अच्छा लगने लगा है। 



-संजय ग्रोवर
15-02-2018

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

प्रायोजित


PHOTO by Sanjay Grover


सुना है प्रायोजित मंथन से प्रायोजित अमृत और प्रायोजित ज़हर निकला।

पहले तो प्रायोजितजन ने ख़ुदको देवताओं और राक्षसों में बांट लिया ( कहीं बाद में कोई झगड़ा न पड़ जाए)।

तब काम आसान हो गया।


और राक्षसों और देवताओं ने विष और अमृत आधा-आधा बांट लिया।

दोनों के हिस्से में आधा-आधा विष और आधा-आधा अमृत आया।

तब विष और अमृत एक-दूसरे के प्रभाव और दुष्प्रभाव से नष्ट हो गए।

इसके बाद देवतओं और राक्षसों ने भी आपस में महाभारत कर लिया और विनष्ट हो गए।

अब बचा हाभारत जहां सिर्फ़ लाशें बची रह गईं।

कभी-कभी वे आपस में लड़तीं हैं।

अपना टाइम पास करतीं हैं। 


( प्रायोजित स्वतःस्फ़ूर्तों को समर्पित )


-संजय ग्रोवर
08-02-2018

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

हम तो हैं इंसान कि हम तो डिप्रेशन में रहते हैं


ग़ज़ल


होगे तुम भगवान कि हम तो फ्रस्ट्रेशन में रहते हैं
हम तो हैं इंसान कि हम तो डिप्रेशन में रहते हैं

तुमने ही भगवान बनाया, तुम्ही खोलने पोल लगे
आपकी हरक़त अपनी हैरत, डिप्रेशन में रहते हैं


हमने सच्ची कोशिश की पर मौक़े पर तुम ले गए श्रेय
सच का यह अपमान हुआ हम डिप्रेशन में रहते हैं

इतनी ऊंच और नीच बनाके तुम्ही कहोगे प्रेम करो !!
तुम्ही करोगे मौज अगर हम डिप्रेशन में रहते हैं !!

बाहर संविधान का पर्दा अंदर सब नाजायज़ खेल
तिसपर बाहर अंदर सारे डिप्रेशन में रहते हैं

ग़म, नफ़रत, अवसाद यही तो सच्चाई का हासिल है
सच बोलो क्यों इंसां अकसर  डिप्रेशन में रहते हैं ?

आपके पागलपन ने हमको इस हालत में पहुंचाया
हम क्या बिलकुल पागल थे जो डिप्रेशन में रहते हैं ?


-संजय ग्रोवर
06-02-2018

शनिवार, 20 जनवरी 2018

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी/माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

ग़ज़ल

इससे जो मिलके काम करता है
माफ़िया एहतिराम करता है

तुम्हारा डर है माफ़िया की ख़ुशी
माफ़िया ऐसे काम करता है

पहले करता है ज़िक़्रे-आज़ादी
माफ़िया तब ग़ुलाम करता है

हिंदू, मुस्लिम हैं सब क़ुबूल इसे
माफ़िया आदमी से डरता है

नाम, पैसा, रुआब क्या चहिए
माफ़िया इंतज़ाम करता है


माफ़िया के जो काम आ जाए
नाम उसके इनाम करता है

माफ़िया से मिला लो हाथ अगर
माफ़िया ओस जैसे झरता है

तुम भले शब्द एक ही बोलो
माफ़िया अर्थ चार करता है

माफ़िया दाएं भी है बाएं भी
माफ़िया चमत्कार करता है

माफ़िया कितना तो अकेला है
मुझ अकेले पे वार करता है

आपमें दम है अगर, शक़ करलो
माफ़िया सबसे प्यार करता है

माफ़िया है, जवाब क्यों देगा!
माफ़िया बहिष्कार करता है 

माफ़िया को शरम नहीं आती
वो तो बस शर्मसार करता है

माफ़िया यूं बड़ा ही सामाजिक
सारे पीछे से काम करता है

माफ़िया इसका, उसका, सबका है
जो भी उसको सलाम करता है

ख़ुद कोई क्यों तमाम होगा भला
माफ़िया सबका काम करता है


-संजय ग्रोवर
20-01-2018




सोमवार, 25 सितंबर 2017

भुला दे डर, ज़रा नये तरह से डर

एक चैनल का यह विज्ञापन आपने देखा होगा। इसमें सर्वश्री/सुश्री अजय देवगन, धोनी, महिला खिलाड़ी आदि आती-जाते हैं।

देखकर लगता है कि भारत में अजय देवगन, महेंद्र धोनी व महिला से पहले न तो कोई ऐक्टिंग करता था, न खेलता था, न ....

एक दिन इन्होंने निर्णय लिया कि कुछ भी हो हम तो खेलेंगे, कैसी भी करें, ऐक्टिंग तो करेंगे, महिलाएं भी खेलेंगे....

तब इन्होंने ख़ुद स्टेडियम बनाए, बल्ले बनाए, दर्शक बनाए, लोगों को बनाया और शुरु कर दिया, बनाए ही रखा.......

इसके बाद लोगों को, बने हुए लोगों को समझ में आया कि बनते कैसे हैं और बनाते कैसे हैं, ऐसे किया जाता है कुछ अलग कर.....

वैसे मैं कुछ-कुछ धोनी को भी पसंद करता हूं और देवगन को भी, महिला याद नहीं आ रहीं, शायद उन्हें भी पसंद करता होऊं....

पर मेरी समस्या (या साहस) यह है कि मैं डर के मारे किसीको भी पसंद नहीं कर सकता !

(यह विज्ञापन चालू रखें वरना आनेवाली पीढ़ियों को भारत का बौद्धिक इतिहास कैसे पता चलेगा ?)

-संजय ग्रोवर
25-09-2017
(चलते-चलते: सुना है आज राहुल गांधी फिर मंदिर चले गए ; भुला दे डर, भगवान तक से डर)

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