रविवार, 11 अगस्त 2013

मशहूरी

लघु व्यंग्य

‘सुनिए, हां जी, आपसे बात करनी थी........’

‘मुझसे !!! बात !!! कुछ समझा नहीं !? क्यों ? आप ?’

‘परेशान न हों, दरअसल हम उनसाहब पर एक प्रोग्राम कर रहे हैं ; पता चला कि आपके पुराने परिचित हैं, क़रीबी हैं तो सोचा...’

‘अच्छा, अच्छा, तो ऐसा कहिए न..... उन साहब को तो बहुत बड़ा अवार्ड मिला है अभी...’

‘हां वही.....’

‘मैं तो बड़ा फ़ैन हूं उनका, जिगरी दोस्त हैं भई....’

‘हां, वही हम पूछ रहे थे कि........’

‘जी, मैं वही बता रहा हूं, कितने लोग उनसे मिलने आते हैं, जगह-जगह उनके आर्टीकल छपते हैं, भई जीनियस आदमी हैं....’

‘तो कुछ बात करनी थी उनको लेकर.....’

‘हां, टीवी पर अकसर आते हैं, नाम रोशन किया है जी उन्होंने मां-बाप का, शहर के लोग नाज़ करते हैं उनपर.......’

‘जी, आपको पहली बार कब........’

‘अरे, कल ही अपनी स्माइल बता रही थी कि पापा, कोई गोष्ठी, सभा, सेमिनार, प्रदर्शन, प्रदर्शनी...उनके बिना जैसे कुछ पूरा ही नहीं होता.....मैं बहुत प्रभावित हूं जी उनसे.......’

‘अच्छा उनकी कौन-सी क़िताब सबसे ज़्यादा पसंद आई आपको?’

‘क़िताब! क़िताब क्या! पसंद आई! अच्छा, अच्छा.....क़िताब साहब ऐसा है कि क़िताब पढ़ने के लिए पूरा वक्त चाहिए होता है.....अब मैं निकलता हूं सुबह सात बजे, आता हूं दस बजे, फिर खाना-पीना, बच्चों के साथ बैठना, मैडम के साथ घूमने भी जाना होता है रात को.....फिर क़िताब! क़िताब कैसे मतलब......आप भी कामवालें आदमी हैं, सब समझते हैं.....’

‘जी, हम समझते हैं, आपने हमारे लिए वक्त निकाला, बहुत शुक्रिया आपका......’

-संजय ग्रोवर
11-08-2013

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