बुधवार, 21 दिसंबर 2011

या तो.....नहीं तो....

व्यंग्य चित्र: संजय ग्रोवर

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

शोषण-उन्मूलन


व्यंग्य

‘‘सर, चारों ओर से आवाजें उठ रहीं हैं कि हम लोगों का शोषण करते हैं।’’
‘‘ अब कौन बोला ?’’
‘‘ सर पी पार्टी वाले बोल रहे हैं ’’
‘‘ ठीक है पी पार्टी के सदस्य बन जाओ, अपने आदमी भर्ती करो उसमें ’’
‘‘ सर डी पार्टी के लोग भी यही बोलते हैं ’’
‘‘ ओफो ! डी में घुसो, ऐसे घुसो कि उनको लगे तुमसे ज्यादा ख़ास उनका कोई है ही नहीं।’’
‘‘ सर, वंचित वर्ग कह रहा है कि हमने बहुत पागल बनाया है उनको।’’
‘‘ उफ, ये वंचित बहुत दिमाग खाता है, ऐसा करो या तो इनका लीडरशिप अपने हाथ में लो या लीडर के सगे बन जाओ।’’
‘‘ कोई मुश्किल नहीं सर, पर इधर से विपरीतलिंगी बोल रहे हैं वो सब उल्टे-सीधे क़ानून-धरम हमीं ने बनाए हैं जिनकी वजह से उनका शोषण होता है ’’
‘‘ तो उनको वो सब स्टेपनी पंक्ति दिखाओ जिसमें उनकी तारीफ है, समझाओ कि दूसरों के यहां इससे भी ज्यादा शोषण है, जाओगी कहां ? कितनी बार बताना पड़ेगा ?’’
‘‘ सर असली अध्यात्मिक ध्यान केंद्र वाले भी बोल रहे हैं कि शोषण तो हमींने किया है ’’
‘‘ तो दिखा दो न अपनी कैसी मास्टरी है अध्यात्म पर ! सब कुछ मुझे बताना पड़ेगा ? उनके भक्तों के भक्त बन जाओ।’’
‘‘सर निरीश्वरवादी, बुद्धत्ववादी, वामवादी भी उबाल पर हैं !’’
‘‘क्या बात कर रहे हो !? उनमें आधे लोग तो हमारे ही हैं ! नेतृत्व तो सब जगह अपना ही है ! कुछ ऊपर-नीचे हो गया होगा, सैट करो।’’
‘‘ सर यूनियन वाले भी असंतुष्ट हैं ।’’
‘‘ तो तुम्हे कबसे तो बोल रहा हूं, यूनियन लीडर ज्यादा से ज्यादा अपने आदमी होनें चाहिए। नही तो उनके इतने क़रीब हो जाओ कि उन्हें लगे उनके पिताजी से भी ज्यादा तुम उनके लिए फिक्रमंद हो।’’
‘‘ सर दो-तीन सच्चे और ईमानदार लोग भी हमीं पर उंगली उठा रहे हैं।’’
‘‘ उनको उनके हाल पर छोड़ दो। उन्हें तो उनके आस-पास की पब्लिक ही बराबर कर देगी।’’
‘‘ हा हा हा ! सही बोला, सर।’’
---------ब्रेक--------
‘‘ हां, सब हो गए अपनी-अपनी जगह सैट ?’’
‘‘ क़रीब-क़रीब हो गए सर।’’
‘‘ ठीक है, अब एक अभियान छेड़ते हैं, तुम सब अपनी-अपनी जगह से समर्थन देना, हम बोलेंगे कि देखो, पी, डी, वंचित, विपरीत, यूनियन.....हर कोई हमें समर्थन दे रहा है। इस समर्थन को देखके दूसरे भी समर्थन देंगे। पैसे से पैसा कमता है। भीड़ को देखके भीड़ आती है। ’’
‘‘ वो तो ठीक है, सर, पर ब्रेक में एक आयडिया आया है !’’
श्श् बोलो फिर’’
‘‘ सर, इतनी सब कवायद करने से बेहतर यह नहीं होगा कि हम शोषण करना छोड़ दें !?’’
‘‘ ऐं !!, ........................... ‘‘पर फिर हम करेंगे क्या !?’’

-संजय ग्रोवर

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

चेंज


 लघु-व्यंग्य

ख़ाप का मुखिया जींस पहनकर आया और अंग्रेजी में बोला,‘टांग दो दोनों को पेड़ पर।’
लोग बोले,‘यार, चेंज तो आ रहा है मुल्क़ में!’

-संजय ग्रोवर

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

कृपया पागल-धर्म को बचाएं।

दोस्तो, पागल-धर्म एक बार फ़िर ख़तरे में है।
आप तो जानते ही हैं कि पागल-धर्म पर हमले कोई नयी बात नहीं है। पागलों की उपलब्धियां किसीको भी ईर्ष्या में डाल सकतीं हैं। हांलांकि पागल कभी भी अपने में और तथाकथित अ-पागलों में फ़र्क़ नहीं करते बल्कि उन्हें ख़ुदसे कहीं बड़ा पागल ही मानते हैं। मगर आप जानते ही हैं कि अत्यधिक विनम्रता का अकसर लोग अनुचित फ़ायदा उठाते हैं। कई लोग हम पर यह आरोप तक लगाते हैं कि हम वास्तव में पागल नहीं हैं बल्कि पागल होने का नाटक कर रहे हैं। पता नहीं वे किस बात का बदला ले रहे हैं जबकि शायद ही किसी पागल ने उनसे कहा हो कि हे अ-पागलों! असली पागल तो आप हो, हम तो आपके पागलपन की वजह से पगलाए पड़े हैं।
बहरहाल, हमें उनकी तरह हिंसक नहीं होना है, अपनी विनम्रता, मुलायमियत, मक्खनियता, उदारता वगैरह को भरसक मेंटेन करना है। धर्म की रक्षा हर हाल में आवश्यक है। वो पागल ही क्या जो धर्म के लिए पागल न हो ! मैंने इसके लिए अहिंसक रणनीति तैयार की है। याद रखें, जब हम धर्म-रक्षा में जुटेंगे तो संभव है कि धर्म ख़ुद भी इसका विरोध करे, हाथ-पैर मारे कि मेरी रक्षा मत करो, मुझे इसकी कोई ज़रुरत नहीं है, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, वगैरह। मगर हमें इसपर ध्यान नहीं देना है। बच्चे को ठीक करना हो, कड़वी दवा देनी हो तो नाक-मुंह बंद करके हाथ-पैर पकड़ने ही पड़ते हैं। इतनी हिंसा तो चलती है। कई अनुभवी पाग़लों का तो कहना है कि हिंसा अगर अहिंसक ढंग से की जाए तो कितनी भी चलती है। बहरहाल जब अ-पागलों की बातों का ही कोई सिर-पैर नहीं होता तो पागलों से ही क्यों ज़्यादा उम्मीद रखी जाए।
कल मैं अपने सुझाव आपके सामने रखूंगा। तब उसपर आपकी राय एकत्रित की जाएगी। धीरज हो तो कल तक रुकना। वरना अभी भी आपको कौन रोक लेगा !
(क्रमश:)
-संजय ग्रोवर


रविवार, 5 जून 2011

प्रेस-वार्त्ताओं में असुविधाजनक सवालों से बचने के लिए अकसर आज़माए जाने वाले कुछ नुस्ख़े:

मैं अनर्गल सवालों के जवाब नहीं देना चाहता।
वे लोग इस लायक नहीं कि मैं उनपर कोई टिप्पणी करुं।
आपने बहुत सवाल पूछ लिए ( हें हें करके हंसते हुए) अब ज़रा उन्हें भी मौक़ा दें
अभी सिर्फ़ इस मुद्दे पर बात कीजिए, भटकाईए मत..
मैंने ऐसा कब कहा....
जनता सब देख रही है, मेरा बोलना ज़रुरी नहीं है..
यह प्रशासन का काम है, पार्टी का नहीं..
इसपर सरकार निर्णय लेगी पार्टी नहीं...
मुझपर हमला राष्टृ पर हमला है, संस्कृति पर हमला है, नदियों पर हमला है......मुझे अपनी बात पूरी कर लेने दीजिए..चांद पर हमला है, सूरज पर हमला है, शांति पर हमला है, क्रांति पर हमला है, धरती माता पर हमला है, आसमान पर हमला है, हिंदू पर हमला है, मुसलमान पर हमला है, इंसान पर हमला है, जानवरों पर हमला है, ब्रह्मांड पर हमला है बिल्ली पर हमला है, चूहे पर हमला है, जो मुझे समर्थन दे रहे हैं, जो देने वाले हैं, जो दे सकते हैं, उन सब पर हमला है, सरकार को इसकी क़ीमत चुकानी होगी.....मैंने कभी ऐसा नहीं कहा...
देखिए, अब तो वे ऐसा कहेंगे ही.....
मैंने कभी ऐसा नहीं कहा...
नहीं, मेरी जानकारी में नहीं है। मैं कुछ नहीं कहूंगा।
मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
मैं राष्ट्र-भक्त हूं।
अरे छोड़िए, किस देशद्रोही का नाम ले दिया !
वे देश-भक्त हैं।
अरे वे तो भगवान को ही नहीं मानते, उनकी क्या बात करनी ?वे सब देश-प्रेमी थे।
यह देश की इतने/उतने करोड़ जनता का अपमान है।
फ़लांचार्य जी मेरे लिए शुरु से ही श्रद्धेय रहे हैं, उनपर कोई टिप्पणी न मैंने पहले की है न अब करुंगा।
मैं झूठा हूं तो क्या पूरा देश झूठा है जो पागलों की तरह मेरे पीछे लगा है ?देखिए, अब तो वे ऐसा कहेंगे ही.....
मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं पर यह आरोप लगाकर उन्होंने घटियापने की इंतिहा कर दी...
अभी मेरी बात ख़त्म नहीं हुई है...
मैंने अभी अपनी बात शुरु तो की ही नहीं आप पहले ही निष्कर्ष पर पहुंच गए....
दरअसल आपको यह नहीं, यह सवाल पूछना चाहिए था...
आप मुद्दे से फिर हट गए, मैं बहस को वापिस आम आदमी पर लाती/लाता हूं..
वे  कोई हमसे अलग थोड़े ही हैं, गठबंधन का हिस्सा हैं।
वे हमारे गठबंधन का हिस्सा हैं तो क्या, लोकतंत्र में सभी को अपने विचार रखने का हक़ है.....
आप भी...ही ही ही ही.....
छोड़िए भी...हें हें हें हें......
चलिए...हो हो हो हो....
हा हा हा हा हा हा हा .........

-संजय ग्रोवर

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ईमानदारी और सकारात्मकता

(एक समाज की अंतर्कथा) 
कविता

भ्रष्ट आदमी के घर का कूड़ा
ईमानदार आदमी की नाली से निकलता

ईमानदार आदमी उलझन में रहता
उसे पता ही नहीं चलता कि
चरित्र किसी और का गड़बड़ है
छवि उसकी बिगड़ रही है

भ्रष्ट आदमी के पास भी वक्त नहीं था
इतना भी नहीं कि उसे मालूम हो जाए
वह भ्रष्ट है

ईमानदार आदमी से लोग
या तो डरते
या उसे डराते

कभी-कभी लोग उसके घर के सामने से गुज़रते
यह समझते हुए कि
यहां अब कोई नहीं रहता

सुबह उठने का मन नहीं होता था ईमानदार आदमी का
सकारात्मकता के नाम पर चारों ओर
शिकारात्मकता फ़ैली थी

चौबीसों घण्टे
बेईमानी उस पर नज़र रखती

चारों ओर से बेईमान उसे सुधारने में लगे थे
उनका आत्म विश्वास देखकर
कई बार वह ख़ुदको बेईमान समझ बैठता

सरकारी और अखबारी की तो बात ही छोड़िए
लघुपत्रिका के दफ्तर में घुसने के नाम पर ही
हाथ-पैर कांपने लगते ईमानदार आदमी के


कभी-कभी वह अपने कपड़े फाड़ता और चिल्लाता
कभी-कभी वह इसलिए पागल हो जाता
कि कहीं सचमुच पागल न हो जाए

यह जानते हुए भी कि इससे उसकी
छवि ख़राब होगी

हर बार उसे
छवि और ईमानदारी में से
एक को चुनना होता

जितनी बार भी उसने
ईमानदारी का साथ दिया
हर बार वह
कुछ और ही निकली

ईमानदार आदमी की नज़र
इतनी बारीक़ थी कि
वह ख़ुदको भी झांसा नहीं दे सकता था

ईमानदारी उसके लिए
सांस लेने की तरह थी
कभी-कभी जब वह थक जाता
या कोई लालच
कोई लापरवाही
उसके सर पर सवार हो जाते
तो कुछ कूड़ा उसकी सांस में चला जाता

यही जागरुकता कि
उसकी भी सांस में गंदगी है
पल-पल उसकी सज़ा होती

जितनी बारीक़ थी उसकी नज़र
उतनी ही मुसीबतें बढ़ती थी ख़ुदके लिए

वह आंदोलन में जाने का
दिन और समय तक भूल जाता

ईमानदार आदमी के संघर्ष का गवाह
उसके अलावा कोई भी नहीं होता था

वह जानता था कि जिस दिन संगठन बनाएगा
गिरवी रखनी होगी थोड़ी-सी ईमानदारी


ईमानदार आदमी की ज़िंदगी
एक त्रासदी भी थी और
एक आंदोलन भी

-संजय ग्रोवर

बुधवार, 30 मार्च 2011

दल्ला मेरे पीछे है तो सट्टा मेरे आगे..

बाज़ीचा-ए-क्रिक्रेट है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे

गो फ़ाइल को जुंबिश नहीं, बल्ले में तो दम है
हफ्ते से बड़ा हो गया छक्का मेरे आगे

कुछ तंज़ करने वालों से यूं कहती है क्रिकेट
दल्ला मेरे पीछे है तो सट्टा मेरे आगे

सर फोड़े है मुंह भींचके हॉकी मेरे होते
रोए है गला फाड़के फुटबॉल मेरे आगे

(मिर्ज़ा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित)

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

भ्रष्टाचार और भक्त

एक बाबा ने अपने भक्तों से दोटूक कहा,
‘‘ जो जो काली कमाई करते हैं मेरे पास न आया करें,
या तो भ्रष्टाचार छोड़ दो या मुझे छोड़ दो!’’
दूसरे दिन सुबह पांच भक्त आश्रम में दिखाई दिए।
‘चलो पांच तो आए’, बाबा ने ख़ुदको संभाला,
‘‘आपको मेरी क्या बात अच्छी लगी ?’’ बाबा ने पूछा।
‘‘ हम तो बस यही पूछने आए हैं कि क्या आप सीरियस हैं !? कल आएं कि नहीं ?’’

(एक हृदयविदारक मौलिक चुटकुला)

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

पॉज़ीटिव ऐटीट्यूड

ग्राहक: आपने तो बताया नहीं था कि गजक के पैकेट में इनाम है !
दुकानदार: कुछ निकला क्या !?
ग्राहक: हां, खाते समय माचिस की तीली आई थी मुंह में।
दुकानदार: अच्छा व्यंग्य कर रहे हो ? क्या नेगेटिव ऐटीट्यूड है ! शुक्र नहीं मनाते कि मुंह में आग नहीं लगी !

शनिवार, 1 जनवरी 2011

शुभकामना ले लो !

आज-कल कुछ कटा-फटा रहने लगा हूं वरना ज़िंदगी शुभकामनाओं से लदी-फदी रहती थी। बोझ से कई बार इतना झुक जाता था कि लोग समझते विनम्रता के कारण झुक गया हूं। वातावरण शुभकामनाओं से लदर-फदर था। अलमारी खोलते ही कच्छे-बनियानों की तरह शुभकामनाएं आ-आकर गिरतीं। फ्रिज में शुभकामनाएं इतनी हो जातीं कि सब्ज़ी रखने की जगह न बचतीं। फ्रीजर में शुभकामनाएं ख़ून की तरह जम जातीं।
इधर देखता हूं कि लोगों में और कलंडरों में फ़र्क़ करना मुश्किल होता जा रहा है। चलते-फिरते, आते-जाते, गिरते-पड़ते लोग शुभकामनाएं उछाल जाते हैं। जो लोग शादियों में देते थे भले लिव-इन से चिढ़े रहते हों पर शुभकामनाएं दिए बिना यहां भी नहीं छोड़ते। वैलेंटाइन डे पर शुभकामनाएं पत्थर की तरह उठा-उठाकर मारते हैं।
कई दफ़ा लगता है सरकारी दफ्तर तो खोले ही इसी लिए गए हैं। सुबह अटेंडेंस मारने के बाद अगला काम यही होता है, शुभकामनाएं बांटों। फोन किसलिए लगवाएं हैं दफ्तर में ! लगता है शुभकामनाएं न दी तो सरकार डिसमिस कर देगी, एक ही तो काम दिया था वह भी ढंग से नहीं किया।
एक दिन मैं बैंक मैनेजर के पास पहुंच गया। मैंने कहा एफ. डी. कर दो। बोला कितने लाख हैं ? मैंने बताया करोड़ों शुभकामनाएं
इकट्ठा हो गयी हैं। देखने लगा ऊपर से नीचे तक। मैंने सोचा अभी कहेगा, ‘पागल तो नहीं हो !’ वह बोला, ‘हमसे अपने स्टाफ़ की नहीं संभलती, तुम्हारी का क्या करेंगे ? कोई स्कीम आयी तो बताऊंगा।’
घर आया तो कबाड़ी बाहर ही मिल गया, बोला, ‘अख़बार की रद्दी या लोहा हो तो बात करना, टाइम नहीं है अपने पास।’
आगे लिखने का मूड नहीं है। आप शुभकामनाएं दीजिए कि मूड बन जाए।

-संजय ग्रोवर
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