शनिवार, 20 जुलाई 2013

मेरे क़दमों में आ गिरी खिड़की

ग़ज़ल

एक खिड़की से दूसरी खिड़की
ज़िंदगी रह गई निरी खिड़की

आसमां जिसपे, बंद दरवाज़ा
उसके जीवन में बस झिरी खिड़की

कुछ तो देखा भी करदो अनदेखा
बन न जाए ये झुरझुरी खिड़की

उसके ख़्वाबों पे क्या गिरी बारिश ?
उसके आंसू में क्यों तिरी खिड़की !

सर मेरा आसमां से टकराया
मेरे क़दमों में आ गिरी खिड़की


-संजय ग्रोवर
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