मंगलवार, 29 जुलाई 2014

अभिव्यक्ति की बारात

कविता

freedom of expression in their sense

29-07-2014

इन दिनों
फ़ेसबुक पर निकल रही है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
तथाकथित हिमायतियों की बारात

अफ़वाहों का बैण्ड
बजा रहा है
सत्य का बाजा

आंऊं आऊं अहूं आंऊं आऊं अहूं

सफ़लता के बाप ने अपनी
बुज़ुर्ग हो चली बिटिया के लिए
एक बार फिर से
इनके घराने को चुन लिया है

सफ़लता का बाप को भी आए दिन
अपनी बेटी की शादी कहीं न कहीं करनी है
शहर में दो-तीन ही हैं ऐसे बड़े घराने
हर बार इन्हीं में से एक चुनना है
परंपरावादी बाप ठहरा

और इधर इन्हें भी चाहिए
हर हफ़ते कोई बारात
ये भी ठहरे हुए परंपरावादी

मगर चमत्कार देखिए
जैसे ही दोनों की मिलनी होती है
दोनों एक-दूसरे को प्रगतिशील घोषित कर देते हैं

बारात में नाच रहे हैं
तरह-तरह के देसी-विदेशी विचार
कुटेशन और ट्रांसलेशन

कुटेशन और ट्रांसलेशन
बेचारे जैसे बारातों के ही लिए बने हैं

लोगों छतों से देख रहे हैं ललक-ललच कर
जैसे कि जो होना है बस बारातों से ही होना है

बारात देखनी चाहिए
मज़ा तो आता है
देखिए अलग़-अलग़ तबेलों और मेलों से आए हैं
मगर कितनी एक जैसी है लय और ताल
रोज़ाना होता है यह कमाल

एक दारु और दो चख़ने
कैसे सभी बारातियों को
एकता के सूत्र में पिरो देते हैं
इसका ज़िक्र इतिहास में क्यों नहीं होगा!
इन्हीं बारातियों ने लौटकर लिखना है इतिहास
जिन्होंने सिक्के लूटे और लुटाए हैं

एक बाराती ने दूसरे के कुटेशन को सर पर उठा लिया है
जैसे के इसी का हो
और देखिए कैसे बैलेंस बनाकर नाच रहा है

एक बाराती जिसे अभी-अभी कोई पुरस्कार मिला है
जो इसे न मिलता तो इसके किसी चाचा-ताऊ के को मिलता
मुंह में रुमाल डालकर
नागिन की सिंफ़नी पर
पारंपरिक नृत्य कर रहा है
जिसके चारों तरफ़ दाद-नृत्य कर रहे हैं पुंछल्ले
इन्हें भी कभी न कभी मिल सकता है कोई छोटा या बड़ा
बस घराने के लोगों से ऐसे ही बनाके रखनी है

इसीको कहो प्रतिबद्धता

एक बाराती मंटो के नाम पर
लुटा रहा है
दूसरा मुक्तिबोध के नाम पर झूम रहा है
तीसरा भी अतीत के किसी ज़मीन से जुड़े कवि के नाम पर
धरती को चूम रहा है

शुक्र है कि यह संभव नहीं है
कि मंटो यह देख पाए
वरना कांप जाता
भांप जाता
कि ग़लती से उधर को गया
तो पहले ये सारी बारात छोड़कर
मुझे तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी...... बार
पागलख़ाने में भरती कराएंगे
और लौटकर
इत्मीनान से सिक्के लुटाएंगे
फ़िर उसपर संस्मरण लिखकर लायब्रेरी में लगवाएंगे


(जारी)

यूं तो शहर बारातियों से भरा है
हर कोई जैसे बारात के ही लिए मरता-जीता है
(इसी में सुभीता है)
सभी तरह के अंथी और पंथी
बारातों के शैदाई हैं
छोटे-मोटे बेचारे
बारात और वो भी अमीरों की बारात देख
ख़ुद ही सड़क ख़ाली कर देते हैं

कभी-कभी कोई बेचारा कह देता है कि
सेठ जी कबसे तुम्हारी बारात के पीछे फ़ंसा हूं
रिक्शा तो निकाल लेने दो सवारी नाराज़ हो रही है
और बस सारे बाराती मिलकर
दिखा देते हैं उसे उसकी औक़ात

सबने पी जो रखी है एक ही तरह की दारु

फिर एक आता है जो कहता है
कि एक ही जगह कितनी देर नाचते रहोगे ?
यह कोई तुम्हारा घर थोड़े ही है
औरों ने भी आना-जाना होता है

अब यह तो रिक्शेवाला नहीं है
गुमनाम भी नहीं बदनाम भी नहीं है
पांच लोग इसे भी जानते हैं
इसे वैसे नहीं निपटाया जा सकता
‘ठीक है, ठीक है, भाईसाहब ठीक कहते हैं
अनुशासन भी कोई चीज़ होती है
बारात आगे बढ़ाओ भाई, भाईसाहब को रास्ता दो’

‘लो भाईसाहब निकल गये-
अब सही बात बताऊं
इनको कार्ड नहीं दिया था न,
इसलिए नख़रे दिखा रहे थे’

यही इन्होंने तब कहा था
‘इसको पुरस्कार नहीं मिला न
इसीलिए इस तरह बोलता/बोलती है’

अद्भुत प्रगतिशीलता है जिसमें यह तय कर दिया गया है
कि न केवल हम ख़ुद
बल्कि दूसरे भी सभी पुरस्कारों और बारातों के लिए जीतें हैं
इसके आगे नहीं है कोई दुनिया

(जारी)


गुरुवार, 24 जुलाई 2014

आखि़र यह विद्रोह है तो है क्या ?

अंततः विद्रोही को शॉल ओढ़ाई गई, माला पहनाई गई, पुरस्कार दिया गया, प्रसिद्ध किया गया, टीवी पर उसका साक्षात्कार दिखाया गया।

हारकर समाज ने उसको स्वीकार लिया, उसका संघर्ष सफ़ल हुआ, अब वह एक स्थापित और मान्यता प्राप्त विद्रोही है। अब उसे उन सभी कार्यक्रमों में बुलाया जाता है जिनका वह पहले बहिष्कार करता था। वह उन सभी आयोजनों में शामिल होता है जिनमें वे सब रीति-रिवाज-कर्मकांड किए जाते हैं जिनसे वह पहले चिढ़ता था।

सत्य सफ़ल हुआ।

पर अगर सत्य को यही सब करना था तो वह विद्रोह किसके खि़लाफ़ कर रहा था !?

ज़माना तो ज़रा नहीं बदला था मगर सत्य ख़ुद बदल गया था!

यह सत्य की जीत थी या समाज की ?

-संजय ग्रोवर

25-07-2014

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