शनिवार, 22 जुलाई 2017

अवसरवाद

लघुव्यंग्य


भीड़-भरी बस में चढ़ते हुए लोग- ‘पहले चढ़ने दो भई, जानते नहीं चढ़ना कितना ज़रुरी है !?’

भीड़-भरी बस से उतरते हुए लोग- ‘पहले उतरने दो भई, हम उतरेंगे नही तो आप चढ़ोगे कैसे !?’


-संजय ग्रोवर
22-07-2017



मंगलवार, 18 जुलाई 2017

सिद्धू को देखता हूं

व्यंग्य

मैं सिद्धू को देखता हूं।

पता नहीं वे कॉमेडी शो की वजह से ऐसे हैं या कॉमेडी शो उनकी वजह से ऐसे हो गए हैं!

आजकल कॉमेडी शो में लोग हंसने के बजाय तालियां बजाने लगे हैं। हो सकता है हंसीं की शॉर्टेज हो, हो सकता है हंसने से थकान होती हो, गला दुखता हो ; और तालियों से आराम मिलता हो, लोग अब हाथों से हंसना सीख गए हों। उन्हीं हाथों से, जिनसे वे अब तक पैर छूते थे। पैर छूना कॉमेडी के लिए अच्छा है, थोड़ी गुदगुदी तो होती होगी। पर कई लोग बदमाश हैं, ठीक से गुदगुदाते तक नहीं। हाथ हवा में घुमा-फिराकर लौटा लेते हैं।

सिद्धू के पीछे पांच-छै लड़कियां बैठी रहतीं हैं। रसोई में बैठने से तो अच्छा है। ये लड़कियां हर बार बदल जातीं हैं। इससे पता चलता है कि भारत में अभी ऐसी अनगिनत लड़कियां हैं जो पीछे बैठना चाहतीं हैं, ऑटोग्राफ़ लेना चाहतीं हैं, क्रश खाना चाहतीं है, कुर्सी के पीछे बदलते रहना चाहतीं हैं। भारत के खाते में शायद ऐसे ही बदलाव लिखे हैं।

बहरहाल सिद्धू पूरे मुंह और शरीर से हंसते हैं। इसमें दिक्क़त भी क्या है, जो भी काम करो, ख़ुलके करो। सिद्धू ख़ुलके हंसते है, वे ज़्यादा ख़ुल गये तो और क्या-क्या कर सकते हैं, वही जानते होंगे।

सिद्धू एक ऐसे अम्पायर की तरह लगते हैं जो किसीको आउट नहीं देते, यहां तक कि नोबॉल, वाइड बॉल कुछ भी नहीं। बस चौके और छक्के। तारीफ़ ही तारीफ़। उनकी नज़र में हर कोई महान है। जो भी उनके सामने आ जाए। जैसे किसी हिंदी आलोचक को आप दो कॉपी क़िताब की दें और थोड़ी देर ‘सर-सर’ करें और कलसे आप हुए बड़े लेखक, चिंतक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, कवि......या आप ही चुन लें कौन-सा ऑप्शन ज़्यादा पसंद है। 

मुआ, सोशल मीडिया वो दो कॉपी भी खा गया। अब हम सोशल मीडिया को वहीं जाकर मारेंगे।

क्या आपको पता है कि सिद्धू शायरी भी करते हैं ?

नहीं पता !! तो पता लगाईए कि दो कॉपी उन्होंने किसको दी हैं ?

-संजय ग्रोवर
18-07-2017


गुरुवार, 13 जुलाई 2017

अफ़वाह की डगर पे...

पैरोडी


अफ़वाह की डगर पे चमचों चलो उछलके
इंजन कोई भी आए, डब्बे तुम्ही हो कल के

अपने हों या पराए, किसको नज़र है आए
ये ज़िंदगी है अभिनय, करना भी क्या है न्याय

रस्ते लगेंगे भारी, तुम हो ही इतने हलके
अफ़वाह की डगर पे.....

सबसे पटाके रक्खो, हर इक मिठाई चक्खो
कट्टर ख़्याल हों भी तो सेकुलर से ढक्को

हो जाओगे पॉपुलर, हर भीड़ देखो घुसके 
अफ़वाह की डगर पे.....

इंसानियत के सर पे हौले से पांव रखना
सादा के नाम पर भी कोई चालू दांव रखना

फिर देखो सब चलेंगे पीछे रपट-रपटके
अफ़वाह की डगर पे.....

हिंदू के घर में जाना, मुस्लिम के घर में जाना
है आदमी भी कोई, बिल्कुल ही भूल जाना

रख देना एक दिन यूं इंसान को मसलके
अफ़वाह की डगर पे.....



(शेष थोड़ी देर में)

-संजय ग्रोवर
14-07-2017

मंगलवार, 30 मई 2017

अकेला बनाम निराकार

उनके पास समाज है।
उनके पास परिवार है। 
उनके पास धर्म है।
उनके पास धर्मनिरपेक्षता है।
उनके पास राजनीति है।
उनके पास राजनीतिक पार्टियां हैं।
उनके पास वाम है।
उनके पास संघ है।
उनके पास कवि हैं।
उनके पास आलोचक हैं।
उनके पास पक्ष है।
उनके पास विपक्ष है।
उनके पास निष्पक्ष है।
उनके पास लड़के हैं।
उनके पास लड़कियां हैं।
उनके पास महापुरुष हैं।
उनके पास गुंडे हैं।
उनके पास सादगी है।
उनके पास महानता है।
उनके पास आम है।
उनके पास ख़ास है।
उनके पास दर्शक हैं।
उनके पास प्रायोजक हैं। 
उनके पास दोस्त हैं।
उनके पास दुश्मन हैं।
उनके पास पड़ोसी हैं।
उनके पास अजनबी हैं।
उनके पास मनोरोगी हैं।
उनके पास मनोविकित्सक हैं।
उनके पास भीड़ है।
उनके पास अकेलापन है।
उनके पास बहादुरी है।
उनके पास निरीहता है।
उनके पास धार्मिक गाय है।
उनके पास सेकुलर गाय है।
उनके पास ख़ुशबू है।
उनके पास चमचे हैं।
उनके पास हैट है।
उनके पास गमछे हैं।
वे सब मिलजुलकर रहते हैं।
वे सब अकेले पड़ जाते हैं।
उनके पास गुझिया और सेवईयां हैं।
उनके पास एकता है।
उनके पास सांप्रदायिकता है।
उनके पास पाख़ाना है।
उनके पास ख़ज़ाना है।
उनके पास फ़िल्म इंडस्ट्री है।
उनके पास फ़िल्म आलोचक हैं।
उनके पास इलैक्ट्रॉनिक मीडिया है।
उनके पास प्रिंट मीडिया है।
उनके पास सोशल मीडिया है।
उनके पास बेईमानी है।
उनके पास ईमानदारी के प्रतीक हैं।
उनके पास कट्टरपंथ है।
उनके पास प्रगतिशीलता के प्रतीक हैं।
उनके पास धर्म है, भगवान है.....
उनके पास दुनिया है, दुनियादारी है......
उनके पास इमेज है, प्रतिष्ठा है, सफ़लता है, समर्थक हैं, चेले हैं, मेले हैं....

फिर वे मुझसे क्यों परेशान हैं ? 
मेरे अकेले के पास तो सिर्फ़ कॉमन सेंस है !!




-संजय ग्रोवर
30-05-2017



शनिवार, 11 मार्च 2017

लाशलीला

‘मैं नहीं लूंगा’, एक ने कहा।

दूसरों ने शुक्र मनाते हुए ठंडी सांस ली-‘हमपर है ही कहां जो देंगे’


इसके साथ ही सब मिलजुलकर खीखी करते हुए मुर्दाघर में दफ़न हो गए।


-संजय ग्रोवर
10-03-2017

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

नालायक

सभी नालायक एक-दूसरे को बहुत लाइक/पसंद करते हैं।

एक जैसे जो होते हैं।

वैसे वे किसी काम के हो न हों पर एक-दूसरे के बहुत काम आते हैं।

मिलजुलकर भी अकेले सच से वे डरते हैं।

अंततः एक दिन वे ख़ुदको श्रेष्ठ और अकेले सचको नालायक घोषित कर देते हैं।

मज़े की बात यह है कि उसके बाद भी उनका डर ख़त्म नहीं होता।

नालायक जो होते हैं।

उनकी एकता हमेशा लायक आदमी के खि़लाफ़ होती है।

एक भी उदाहारण ऐसा देखने में नहीं आता जिसमें उन्होंने किसी नालायक का कुछ बिगाड़ कर दिखाया हो।

वे नालायकों का कुछ बिगाड़ेंगे तो उन्हें लाइक कौन करेगा ? 

(जारी)

-संजय ग्रोवर
24-02-2017

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

बेईमानी

लघुकथा

वह हमारे घरों, दुकानों, दिलों और दिमाग़ों में छुपी बैठी थी और हम उसे जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में ढूंढ रहे थे।


-संजय ग्रोवर
05-02-2017

शनिवार, 14 जनवरी 2017

भीड़ की ताक़त

सवा अरब लोग अगर एक हो जाएं तो क्या नहीं कर सकते ?






और कुछ नही तो मिलजुलकर चुप तो रह ही सकते हैं।



-संजय ग्रोवर
14-01-2017


शनिवार, 7 जनवरी 2017

वही ढाक के तीन पात......


लघुकथा/व्यंग्य


‘एक बात बताओ यार, गुरु और भगवान में कौन बड़ा है ?’

‘तुम लोग हर वक़्त छोटा-बड़ा क्यों करते रहते हो.....!?’

‘नहीं.....फिर भी .... बताओ तो ....?’

‘गुरु बड़ा है कि छोटा यह बताने की ज़रुरत मैं नहीं समझता पर वह भगवान से ज़्यादा असली ज़रुर है क्यों कि वह वास्तविक है, हर किसीने उसे देखा होता है। किसीको मूर्ख भी बनाना हो तो यह काम उसे(गुरु को) ख़ुद ही करना पड़ता है। भगवान के बस का तो इतना भी नहीं है, वह हो तब तो कुछ करे......’
   
‘वाह-वाह, क्या बात बताई है, आजसे आप मेरे गुरु हुए......’

‘धत्तेरे की, तुम्हे कुछ तार्किक बात बताने से तो अच्छा है कि आदमी अपना
सर फोड़ कर दिमाग़ नाली में फेंक दे.......’


-संजय ग्रोवर

07-01-2017










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