गुरुवार, 13 जनवरी 2011

पॉज़ीटिव ऐटीट्यूड

ग्राहक: आपने तो बताया नहीं था कि गजक के पैकेट में इनाम है !
दुकानदार: कुछ निकला क्या !?
ग्राहक: हां, खाते समय माचिस की तीली आई थी मुंह में।
दुकानदार: अच्छा व्यंग्य कर रहे हो ? क्या नेगेटिव ऐटीट्यूड है ! शुक्र नहीं मनाते कि मुंह में आग नहीं लगी !

शनिवार, 1 जनवरी 2011

शुभकामना ले लो !

आज-कल कुछ कटा-फटा रहने लगा हूं वरना ज़िंदगी शुभकामनाओं से लदी-फदी रहती थी। बोझ से कई बार इतना झुक जाता था कि लोग समझते विनम्रता के कारण झुक गया हूं। वातावरण शुभकामनाओं से लदर-फदर था। अलमारी खोलते ही कच्छे-बनियानों की तरह शुभकामनाएं आ-आकर गिरतीं। फ्रिज में शुभकामनाएं इतनी हो जातीं कि सब्ज़ी रखने की जगह न बचतीं। फ्रीजर में शुभकामनाएं ख़ून की तरह जम जातीं।
इधर देखता हूं कि लोगों में और कलंडरों में फ़र्क़ करना मुश्किल होता जा रहा है। चलते-फिरते, आते-जाते, गिरते-पड़ते लोग शुभकामनाएं उछाल जाते हैं। जो लोग शादियों में देते थे भले लिव-इन से चिढ़े रहते हों पर शुभकामनाएं दिए बिना यहां भी नहीं छोड़ते। वैलेंटाइन डे पर शुभकामनाएं पत्थर की तरह उठा-उठाकर मारते हैं।
कई दफ़ा लगता है सरकारी दफ्तर तो खोले ही इसी लिए गए हैं। सुबह अटेंडेंस मारने के बाद अगला काम यही होता है, शुभकामनाएं बांटों। फोन किसलिए लगवाएं हैं दफ्तर में ! लगता है शुभकामनाएं न दी तो सरकार डिसमिस कर देगी, एक ही तो काम दिया था वह भी ढंग से नहीं किया।
एक दिन मैं बैंक मैनेजर के पास पहुंच गया। मैंने कहा एफ. डी. कर दो। बोला कितने लाख हैं ? मैंने बताया करोड़ों शुभकामनाएं
इकट्ठा हो गयी हैं। देखने लगा ऊपर से नीचे तक। मैंने सोचा अभी कहेगा, ‘पागल तो नहीं हो !’ वह बोला, ‘हमसे अपने स्टाफ़ की नहीं संभलती, तुम्हारी का क्या करेंगे ? कोई स्कीम आयी तो बताऊंगा।’
घर आया तो कबाड़ी बाहर ही मिल गया, बोला, ‘अख़बार की रद्दी या लोहा हो तो बात करना, टाइम नहीं है अपने पास।’
आगे लिखने का मूड नहीं है। आप शुभकामनाएं दीजिए कि मूड बन जाए।

-संजय ग्रोवर
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