बुधवार, 24 नवंबर 2010

“पागलों का आत्मालाप”

(महापागलों, डब्बू मिश्र और संजय ग्रोवर की चैट का चरमोत्कर्ष)
Today (25-11-2010)
Dabbu Mishra
11:13am
हिच्च्च्च्च्च ..... कोई हे
You (संजय ग्रोवर)
11:13am
koi nahiN
Dabbu Mishra
11:14am
अच्छा है अब मैं इत्मीनान से अपने को बता सकूंगा
You (संजय ग्रोवर)
11:14am
to fir maiN chalta hun
Dabbu Mishra
11:14am
अरे कोई है क्या
किसी का लिखा कुछ दिख रहा है
उफ्फ्फ्प् बच गया
You (संजय ग्रोवर)
11:15am
aaj tak to koi bachaa nahin..
main hun kya ?
Dabbu Mishra
11:16am
अच्छा य... तो बताओ मेरा आइना कहां रहता है
You (संजय ग्रोवर)
11:16am
are koi bataao..
har paagal is duniya ka aayina hai
Dabbu Mishra
11:17am
कोई नही बता सकेगा मेरे चेहरे हाहाहाहाहार मानते हो
You (संजय ग्रोवर)
11:17am
chehre jit jate hain asliyat haar jaati hai..
Dabbu Mishra
11:18am
पागलों को पागल नही बोलते ऐसा दुनिया कहती है औऱ खुद को ही पागल बोलने से बचती है
You (संजय ग्रोवर)
11:15am
jitna bachti hai utna fansti hai..
Dabbu Mishra
11:16am
यही तो दुनिया की फांस है
You (संजय ग्रोवर)
11:16am
bhaad me jaaye
Dabbu Mishra
11:16am
कौन.... पागल या दुनिया
You (संजय ग्रोवर)
11:17am
duniya khud bhaad hai.paagal ko koi aur bhaad dhundhni chaahiye
Dabbu Mishra
11:18am
अरेरेरेरेरेरेरेर मैं तो सोचा था कि दुनिया के भाड में भुनने वाले चने पागल ही हैं
You (संजय ग्रोवर)
11:19am
paagal lohe ke chane hote haiN, har koi nahin chabaa sakta.
Dabbu Mishra
11:20am
औऱ लोहे को लोहा ही काटता है हाहाहाहा
You (संजय ग्रोवर)
11:21am
that's all. ab zara is chatt ka natija dekho, main kya karta hun
(फ़ेसबुक से साभार, लिया है मार ;-)

सोमवार, 22 नवंबर 2010

पागलखाने की जांच-पोस्ट

 दुनिया वालो, आओ किसी दिन, आ पगलालय में देखो-
दिन को होला, रात दिवाला, रोज़ मनाता पगलालय.......

 पागलखाना 24 घंटे सबके लिये खुला है।
रोज़मर्रा के जीवन में पागलपन एक नियमित घटना है।
अपने-आपसे ख़ुदको छुपाना ठीक नहीं।
कोई भी, कभी भी बिना किसी जांच-पड़ताल, वीज़ा-पासपोर्ट के यहां शामिल-दाखिल हो सकता है। वैसे भी शामिल होना-न होना एक औपचारिक प्रक्रिया है, जो, जो है, वो, वो तो रहेगा ही।
वक्त-स्थान-काल-घोषित-अघोषित-पंजीकृत-अपंजीकृत सब फ़ालतू बातें हैं। आना है तो आओ, बुलाएंगे नहीं. नखरे किसीके उठाएंगे नहीं..

पागलखाना सबके लिए खुला है, मधुशाले का भी बाप (स्त्रीवादी 'मां' पढ़ें) है ये...
(मधुशाला बहुत-से पागलों को प्रिय है अतः उसे टक्कर देना ज़रुरी है।)
बाहरवालो अंदर आओ, अंदरवालो बाहर जाओ, सब अपनी-अपनी सही जगह पकड़ो, समझे क्या !!??
कहीं समझ तो नहीं गए !!??



मैं पागल मेरा मनवा पागल....पागल मेरी टीम रे...


इन्हीं बिगड़े दिमाग़ों में, बहुत ख़ुशियों के लच्छे हैं/
 हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं

-शायर ? होगा कोई पागल


शातिराना सी है ज़िंदगी की फ़ज़ां
आप भी गंदगी का मज़ा लीजिए..
Yah गटर बन गया आपके वास्ते
आप जो चाहे उसमें बहा दीजिए..



(अपने-आप बनाया है, कहीं से लिया नहीं है, हां)


Aur kitta description chaahiye aapko ?
KahiN PAAGAL to nahiN ho !?
HO kya ?
Aa jaao fir.
Khub Guzregi..



आईए और अपनी प्रतिभा का व्यंग्य-प्रदर्शन कीजिए और हमारी मेधा का व्यंग्य-प्रदर्शन देखिए।
आप कितना भी छुपा लें, हमें पता है आप अंदर से क्या हैं।
अरे, आपमें-हममें कोई फ़र्क है क्या ?
यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं। यक़ीन न हो तो ख़ुद आकर आंखे फाड़-फाड़कर देख लीजिए।
अब आ भी जाईए। सिर्फ़ पागलखाने में दाखि़ल न होने से कोई स्वस्थ नहीं हो जाता।
ओके। जब हालात बेकाबू हो जाएं तब आ जाईएगा, हम संभाल लेंगे।
दैट’स् ऑल..
(जारी ;-)
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