गुरुवार, 30 जुलाई 2015

इतना ही कर दो

लघुव्यंग्य

ईमानदार आदमी रास्ते से निकल रहा था।

चौक पर बेईमान बैठे थे, आदतन छेड़ने लगे-

‘‘भैय्या क्या मिला ईमानदारी से, ईमानदार तो हम कहलाते हैं, रेडियो-टीवी पे बुलाए जाते हैं, अख़बार हमारे गुन गाते हैं, तमग़े हम पर लगाए जाते हैं.....बोलो-बोलो....

‘न मैं टीवी पर आता हूं न अख़बार में, न तो नाम पाता हूं न ईनाम पाता हूं, न तुम पर ध्यान देता हूं न बदनामी पर......फिर भी ईमानदार हूं.....यही मेरी उपलब्धि है, यही मज़ा है.....तुम इतना ही करके दिखा दो !’

ईमानदार आदमी कहते हुए अपने रास्ते निकल गया।

-संजय ग्रोवर
31-07-2015


गुरुवार, 23 जुलाई 2015

औक़ात

छोटी कहानी

वे अलग-अलग टीमें बना कर लड़ाई-लड़ाई खेल रहे थे।

तभी वह वहां आन पहुंचा।

‘आओ न, तुम भी हमारे साथ खेलो, ए में जाओगे कि बी में.....’ उन्होंने रिक्वेस्ट की।

‘नहीं....नहीं.....यह मैं नहीं खेल पाऊंगा.....’

‘क्यों नहीं, तुम कहो तो तीसरी टीम बना दें.....’

‘नहीं, देखिए, आप लोगों ने तो खेल-खेल में ही एक-दूसरे के कपड़े तक फ़ाड़ डाले हैं, मुंह तक नोच लिए हैं, माफ़ कीजिएगा.....

‘पर लोग तो हमारे खेल से ख़ुश हैं, वे तो इसे नक़ली नहीं मानते....’

‘आपने किन लोगों से पूछा है, कहीं वे भी.....ख़ैर, मैं चलता हूं...

‘यह तो नख़रे दिखा रहा है, बड़ा घमंडी है, ख़ुदको जाने क्या समझता है, और किसीसे कहा होता तो कबका गोद में आ बैठा होता, इसको तो सबक सिखाना पड़ेगा.....

और सब मिलकर उसपर टूट पड़े।

अब उन्हें बिलकुल असली लड़ाई जैसा मज़ा आ रहा था।

-संजय ग्रोवर
23-07-2015

बुधवार, 15 जुलाई 2015

काम और नाम: क्या आपको मंज़ूर है

व्यंग्य

एक पुराना, कुछ दरमियाना-सा घर।

एक दस्तक।

दरवाज़ा खुलता है-

जी कहिए ?

देखिए हम इस सिलसिले में आए थे मिर्ज़ा मालिक़ के काम पर कुछ काम कर सकें.....उनका नाम और काम भी सलीक़े से दुनिया के सामने आए.....

जी आईए, तशरीफ़ रखिए, क्या लेंगे, ठंडा या गर्म.......

जी बस हम चाहते हैं कि आपकी इजाज़त मिल जाए तो हम जल्द से जल्द काम शुरु करें......

ठीक है, बेटा ज़रा मिर्ज़ा साहब का......

जी अभी लाता हूं.....

देखिए, यह मिर्ज़ा साहब का वसीयतनामा है, उन्होंने परोपकारी और सामाजिक लोगों के लिए कुछ हिदायतें, कुछ शर्त्तें बताई हैं.....

जी हिदायतें! शर्त्तें! ........बताईए, फ़रमाईए....कुछ अच्छा ही कहा होगा उन्होंने.....

हां, उनका कहना है कि चूंकि आप जैसे लोग निस्वार्थ भाव से, दूसरों को तवारीख़ में जगह दिलाने के लिए काम करते हैं, तो पहली शर्त्त यह है कि आप इस काम से कोई कमाई नहीं करेंगे या फ़िर कमाई करेंगे तो उसमें आपका कोई हिस्सा नहीं होगा, वह कमाई मिर्ज़ा साहब के तय किए लोगों और संस्थाओं में बांटी जाएगी और उसके बारे में किसी क़िस्म की जानकारी आपको नहीं दी जाएगी। क्या आपको मंज़ूर है ?

जी आगे पढ़िए, आगे पढ़िए.....

आगे उनका कहना है कि चूंकि मिर्ज़ा साहब के साथ-साथ आपका भी नाम होगा जबकि आप यह काम निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं इसलिए इस काम के प्रदर्शन के दौरान आपका नाम कहीं भी प्रदर्शित नहीं किया जाएगा, अगर नाम प्रदर्शित करना ज़रुरी ही हो तो उसके लिए आपको अलग से पैसा देना होगा जो कि मिर्ज़ा साहब के तय किए लोगों को दिया जाएगा। क्या आपको मंज़ूर है ?

जी आगे पढ़िए, पूरा पढ़िए, मैं सुन रहा हूं......

आगे मिर्ज़ा का कहना है कि बाज़ लोग ज़िंदा फ़नकारों की मौजूदगी में ही उनके काम में फेरबदल कर देते हैं इसलिए पूरे काम के दौरान मिर्ज़ा के तय किए चार आदमी आपके काम पर नज़र रखेंगे। क्या आपको मंज़ूर है ?

जी क्या-क्या कहा है मिर्ज़ा साहब ने.....बेटा ज़रा देखना बाहर.....रिक्शावाला चला तो नहीं गया ? ........

आगे मिर्ज़ा साहब का कहना रहा कि चूंकि इस दुनिया से रुख़्सत हो चुके फ़नकारों की ग़ैरहाज़िरी में उनके बारे में बिना किसी वाज़िब अथॉरिटी की परमिशन के, लोग तोड़-मरोड़ के कुछ भी बना डालते हैं। मिर्ज़ा साहब का कहना है कि मृत्त व्यक्ति की इजाज़त के बिना किए जानेवाले इस शर्मनाक़ सिलसिले पर बैन लगे और इसपर एक सख़्त क़ानून बने, सख़्त सज़ा हो...... जिसके बनाने में आप मदद करें........इसमें यह होगा कि मृत्त फ़नकार का तय किया पैनल जब इजाज़त देगा तभी.........

जी ग़ज़ब-ग़ज़ब की शर्त्तें हैं मिर्ज़ा साहब की, मैं कल वक़्त लेकर आऊंगा और आराम से इनपर बात करुंगा। अभी क्या है कि रिक्शेवाला बेचारा निकल जाएगा.........

जी ज़रुर, कल किस वक़्त आएंगे आप....क्या नाम है आपका, निस्वार्थ साहब ?........


-संजय ग्रोवर
15-07-2015

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं 'पुराने पोस्ट'(Older Posts) पर क्लिक करें-