मंगलवार, 22 सितंबर 2015

चालू

लघुकथा  

उन्होंने जाल फेंका।

शिकार किसी तरह बच निकला।


यूं समझिए कि ख़ाकसार किसी तरह बच निकला।


भन्ना गए। सर पर दोहत्थड़ मारकर बोले, ‘‘तुम तो कहते थे भोला है। देखो तो सही साला कितना चालू आदमी है।’’


-संजय ग्रोवर

('संवादघर' से साभार)

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

सुनो घोड़ो

लघुव्यंग्य

जो भी मुझपर दांव लगाएगा, शर्त्तिया हारेगा।
क्योंकि मैं कोई घोड़ा नहीं हूं, आदमी हूं। 
पूरी तरह आज़ाद एक आदमी।


-संजय ग्रोवर
03-09-2015

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