सोमवार, 30 सितंबर 2013

कर लिया तय

लघु व्यंग्य


‘तो बेटा पहले तय करो कि किस तरफ़ हो तुम.......

‘ठीक है सर, मैं तो हिंदू हूं।’

‘और सर, मैं मुसलमान हूं।’

‘अरे नहीं, मेरा वो मतलब नहीं है......’

‘तो क्या मतलब है सर ?’

‘मतलब तुम ग़रीब की तरफ़ हो या अमीर की तरफ़, कमज़ोर की तरफ़ या ताक़तवर की तरफ़.....’

‘सर, ग़रीब, मतलब कितना ग़रीब, मतलब मंथली इनकम कितनी हो ? मैं सोचता हूं कि तय ही करना है तो पूरी बारीक़ी में जाकर करें।’

‘हां सर, मेरे दो-तीन अमीर दोस्त ऐसे हैं जो पिछले हफ़्ते ग़रीब थे, अब मैं उनके खि़लाफ़ हो जाऊं क्या ?’

‘सर, ईमानदार और बेईमान में से कैसे तय करें, कई ग़रीब बेईमानी से अमीर बने हैं, कई बेईमानी के बावजूद भी ग़रीब हैं, कई अमीर बेईमानी के कारण जेल में हैं, मीडिया कहता है कि कई निर्दोष भी जेल में हैं, कईयों ने ज़्यादा बेईमानी की थी मगर जेल के बाहर हैं ; तो जेल के आधार पर भी तय करना मुश्क़िल है !’

‘तय करने का मामला अजीब है, पिछले दिनों कुछ लोगों ने तय कर दिया था कि भ्रष्टाचार जो है आरक्षण के बाद से बढ़ गया है।’

‘सर आपका भी तीन-चार गुटों से मिलना-जुलना है, आप अपना काम लेकर किसीके भी पास चले जाते हैं आपकी ही तय करनेवाली सोच के ही कई प्रबुद्धजन कथित मौत की आग़ जलानेवाले गुट के कथित धर्मनिरपेक्ष प्रधान शक़लधारी जी से अच्छी दोस्ती रखते थे।’

‘सर, मैंने तय किया था सभी स्त्रियों का सम्मान करुंगा, पिछले हफ़्ते एक स्त्री जिसका मैं सम्मान करता था, उसने अपनी बहू को जला दिया....अब मैं चक्कर में पड़ गया हूं !’

‘सर, मुझे किसीने तय करके दिया था कि दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं है, मगर कल मेरे एक दोस्त ने अपने एक दोस्त के 50,000 रु मार लिए। दोस्त का दोस्त रोता हुआ मेरे पास आया। अब मैं कशमकश में हूं कि ईमानदारी की तरफ़ बोलूं कि दोस्ती की तरफ़ जाऊं!?’

‘सर, मुझे लगता है, तय करनेवाले ज़रा मोटी बुद्धि के लोग होते हैं, वे उधार की सोच पर निर्भर करते हैं.....’

‘हां, सर, मुझे लगता है पहले से सब तय कर-करके वही रखते हैं जिनमें तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और विवेक नहीं होते.......’

‘हां, सर, हम जब जिसकी जो बात ठीक लगेगी, ठीक कहेंगे, खराब लगेगी, ख़राब कहेंगे.....’

‘सर, मैंने भी तय किया है कि हम कुछ तय नहीं करेंगे.....’

-संजय ग्रोवर

30-09-2013

सोमवार, 23 सितंबर 2013

रचनात्मक


‘एक ही तरीक़ा है, और अहिंसक तरीक़ा है....’
‘क्या सर?’
‘उसकी इमेज ख़राब कर दो, मटियामेट कर दो, उसके लिखे को लेकर भ्रम फ़ैलाओ, उसके बारे में कहानियां गढ़कर फ़ैला दो........ख़त्म हो जाएगा....
‘ओके सर। डन।’

*                            *                                  *

‘हां, हो गया काम ?’
‘नहीं सर, एक प्रॉबलम आ रही है......
‘प्रॉबलेम, इतने ज़रा-से काम में प्रॉबलेम! पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ!!’
‘वो सर.....क्या है कि...उसकी कोई इमेज ही नहीं है.....ख़राब किसे करें !?’
‘क्या बात करते हो ? लोग तो इमेज के लिए जीते हैं, बल्कि जीते-जी मर जाते हैं! यह कैसा आदमी है जो इमेज के बिना जीता है!!’
‘.........................’
‘हुम......, एक काम करो......पहले उसकी कोई इमेज बनाओ। और जब बन जाए तो उसे ख़राब कर देना। अब देखते हैं कैसे बचता है.....जाओ शुरु हो जाओ ; इस बहाने कुछ रचनात्मक काम भी होगा....
‘रचनात्मक! वाह ! क्या आयडिया है सर ! इसे डन समझिए सर।’

-संजय ग्रोवर

23-09-2014


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