मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मेरी बातों को दे दे रंग नया.....


ग़ज़ल

अक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या है
अपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!

मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!
ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?

पास जिनके रहन है तेरा ज़हन
उनके बारे में सोचता क्या है ?

हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़र
इसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !

हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असली
फिर अदाकारी में रखा क्या है !?

तू भी उनमें ही हो गया शामिल
हमको क्या लेना मामला क्या है

डर है, लालच है या है मजबूरी
तेरे पास और अब नया क्या है ?

हमने तेरा समाज देख लिया
अब भी पूछे है, माफ़िया क्या है !?

वो जो बिलकुल ही हैं तिरे जैसे
तू ही अब उनपे हंस रहा, क्या है!?

जिनका जीवन हो चुटकुले जैसा
उनमें कुछ राज़ ढूंढना! क्या है ?

साफ़ कुछ भी न बोल पाएगा
बच गई है तो बस अदा, क्या है

वो जो करते रहे इधर का उधर
उनके घर जाके ढूंढना क्या है!?

मेरी बातों को दे दे रंग नया
तेरे पास और अब बचा क्या है ?

ख़ुद तो ग़ालिब रहे अकेले-से
नाम पर उनके ये लगा क्या है !?

(माफ़ करना मिर्ज़ा, यह ज़रुरी था)


-संजय ग्रोवर
20-09-2016



मंगलवार, 6 सितंबर 2016

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