शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मूवी द ड्रामा

व्यंग्य

फ़िल्म चमत्कारों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खि़लाफ़ है और हिट हुई है। लोग देखकर निकल रहे हैं। आईए, इनसे बातचीत करते हैं कि फ़िल्म ने इनके दिमाग़ों को कितना हिट किया है....

!!!
‘आपसे बात करना चाहेंगे, कैसी लगी फ़िल्म आपको ?’
‘झकास, क्या बनाई है साब, इनका तो जवाब ही नहीं है, गजब।’
‘क्या अच्छा लगा आपको?’
‘अंधविश्वास का बताया है साब, इनमें नहीं पड़ना चाहिए।’
‘अच्छा, ज़रा बताएं कि......
‘हमें ज़रा जल्दी है भाईसाब, रस्ते में मंदिर भी जाना है, हमारा दिखाईएगा ज़रुर, रात को देखेंगे, हम भी अंधविश्वास के खि़लाफ़ हैं, नमस्कार।’

!!!
‘आप तो यंग हैं एकदम, फ़िल्म का मैसेज क्या है?’
‘कमाल का मैसेज है सर, हाउ एंथूज़ियास्टिक! ये जो बाबा लोग हैं सबको उल्लू बनाते हैं, इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, भगवान को सीधे एप्रोच करना चाहिए....’
‘अच्छा अब सीधे एप्रोच करेंगी आप, कैसे करेंगी ?’
‘कैसे !? कैसे मतलब !? हुम्म........पहले मैं सिर्फ़ टेम्पलस् में जाती थी, अब चर्चेज़ और मॉस्क्स् में भी जाऊंगी.....
‘मगर वहां या तो मूर्त्तियां होतीं हैं या मिडलमैन, सीधे तो भगवान कहीं मिलता नहीं......
‘आप टीवी रिपोर्टर हैं !?’
‘हां, क्यों ?’
‘नहीं टीवी रिपोर्टर तो ऐसे सवाल पूछते नहीं, वो तो जनरल सवाल पूछते हैं!’

!!!
‘अच्छा आप साइक़ियाट्रिस्ट हैं, आपके लिए एक खास सवाल है मेरे पास, यह बताईए कि हर बात में सवाल पूछने का मतलब है कि बात-बात में शक करना। मनोचिकित्सा में ज़्यादा शक करना स्क्त्ज़िोफ्रीनिया का एक लक्षण है, नायक को स्कित्ज़ोफ्रीनिक क्यों न माना जाए ?’
‘अजी कैसी बात कर रहे हैं आप ? ऐसे कहीं होता है ? इतने इंटेलीजेंट आदमी ने फ़िल्म बनाई है और....
‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।’
‘देखिए आप फ़िल्म को लाइटली ले रहे हैं.....’
‘चलिए, शुक्रिया, हम किसी और से बात करते हैं, ऐक्सक्यूज़ मी....

!!!
‘जी मैं फिल्म लाइन से ही ताल्लुक रखता हूं, फ्रैश हो गया, फ्री हो गया...’
‘अच्छा अब क्या करेंगे ?’
‘बस पहले तो एक कार्यकंम में जाना है जहां हमारे एक मित्र नास्तिकता पर कविताएं सुनाएंगे, आप भी आईएगा, बड़े सज्जन और धार्मिक व्यक्ति हैं। उसके बाद अम्मा को तीर्थयात्रा पर ले जाने का बोला था, जाकर बस उसीकी तैयारी करता हूं.....
‘अच्छा तो अब आप भी ऐसी कोई फ़िल्म बनाएंगे ?’
‘अर्रे यार.....आप भी.....समझिए कि यह मैंने ही बनाई है....
‘समझ गया।’
!!!

-संजय ग्रोवर

27-12-2014


रविवार, 16 नवंबर 2014

क्रांति-3


‘तपाड़!’ एक थप्पड़ उसने सामने खड़े आदमी को जमाया।

थप्पड़ ज़ोरदार था। वह हिल गया।

‘तड़ाक! तड़ाक!’ बदले मे उसने दो जड़ दिए।

यह भी गिरते-गिरते बचा।

लेकिन संभलते ही इसने तीन और दे मारे।

उधर से चार और पड़े और भीड़ बढ़ने लगी।

‘तपाड़! तपाड़! तपाड़! तपाड़! तपाड़!’

‘तड़ाक! तड़का! तड़ाक! तड़ाक! तड़ाक! तड़ाक!’

भीड़ बढ़ती जा रही थी।

दोनों एक-दूसरे को मारते-मारते बेदम हो गए।

अंततः गिर पड़े।

भीड़ ने माला-वाला पहनाईं, प्रशंसा वगैरह की, नारे लगाए, उनकी 'उच्चता' और 'भव्यता' को सलाम किया। और कल फिर तमाशा देखने की आस में विदा हो गई।

*

दोनों उठे।

‘ज़्यादा तो नहीं लगी ?’ एक ने दूसरे के गालों को सहलाया।

‘नहीं नहीं, इतना तो चलता है।’ दूसरे ने पहले के सर पर हाथ फ़िराया, ‘भीड़ तो अच्छी जमा हो गई यार!’

‘हां, और तारीफ़ भी ख़ूब मिली, लगता है अच्छा चलेगा!’

‘क्यों नहीं चलेगा, चलता ही आया है....’

*

इनमें से एक मंच का जुगाड़ू था दूसरा पत्र-पत्रिकाओं का। दोनों एक ही मानस के पुत्र थे और आजकल सोशल मीडिया पर माहौल अपने अनुकूल बनाने की कोशिश कर रहे थे।

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 11 नवंबर 2014

क्रांति-2

व्यंग्य


तथाकथित प्रगतिशील, कट्टरपंथी को ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गया, पर कट्टरपंथी था कि कहीं मिल नहीं रहा था।

तथाकथित प्रगतिशील उससे दो-दो हाथ करने को आतुर था, बेताब था, उत्तेजित था मगर कट्टरपंथी था कि सामने नहीं आ रहा था। पत्रकार, रिपोर्टर सब लाइव टेलिकास्ट के लिए तैयार बैठे थे मगर कट्टरपंथी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।

दिखाई पड़ता भी कैसे, वो तो उन्हींके अंदर छुपा बैठा था।

-संजय ग्रोवर


गुरुवार, 6 नवंबर 2014

क्रांति-1


काफ़ी टाइम से वे करने के मूड में थे-

‘यार, लोग नहीं आते....’

‘लोगों का आपने करना क्या है? जिनके खि़लाफ़ होनी वे भी आपके लोग हैं। जिन्होंने करनी है, वे भी आपके लोग हैं, मिल-जुलकर कर डालो....समस्या क्या है?’
‘...............’

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 30 सितंबर 2014

ठेस का मरीज़

व्यंग्य


डॉक्टर: हां आप बताईए, आपको क्या हुआ है ?

मरीज़: जी मुझे ठेस लगी है।

डॉक्टर: कहां लगी है ?

मरीज़: सर मेरी भावनाओं को चोट पहुंची है।

डॉक्टर: भावनाओं को........! अच्छा अच्छा, आप तो पिछले सप्ताह भी दो-तीन बार आए थे न ? मैंने आपको ताक़त के कैप्स्यूल दिए थे....

मरीज़: सर कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा.....

डॉक्टर: हुम्म्म्म्म्म्म, लगता है कमज़ोरी ज़्यादा है। इतनी जल्दी-जल्दी आपकी भावनाओं को चोट पहुंचती रहती है, थोड़ा इन्हें कवर करके रखा करें, थोड़ा मजबूत बनें, ऐसे कैसे काम चलेगा ?

मरीज़: सर वो तो हो नहीं पा रहा.....

डॉक्टर: तो ऐसा कीजिए, लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दीजिए, दो-चार साल घर पर आराम कीजिए। देखिए, देश में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में सबको अपने विचार प्रकट करने का हक़ होता है। आपको शायद लोकतंत्र सूट नहीं करता इसलिए बार-बार बीमार पड़ जाते हैं....

मरीज़: तो सर कोई एंटी-लोकतंत्र दवा नहीं है क्या ?

डॉक्टर: है तो सही पर अभी स्टॉक में नहीं है, ठेस के मरीज़ बहुत हैं न, इसलिए ख़पत बहुत है, बाहर ही बाहर मार्केट से ब्लैक में ख़रीद लेते हैं....

मरीज़: तो अब मैं क्या करुं सर ?

डॉक्टर: आप ऐसा करें, अंदर मनोचिकित्सक बैठते हैं, उनके पास चले जाईए.....

मरीज़: वे क्या करेंगे ?

डॉक्टर: वे सिर्फ़ वही बातें करेंगे जो आपको पसंद हैं। आप कोई बात करेंगे तो वे सिर्फ़ हां में हां मिलाएंगे, चाहे
उन्हें कुछ समझ में आए न आए....बाद में प्रति घंटा के हिसाब से फ़ीस ले लेंगे.....

मरीज़: यह अच्छा आयडिया दिया सर आपने.......मैं तो अंदर जाता हूं....

-संजय ग्रोवर
30-09-2014


सोमवार, 22 सितंबर 2014

भगवान के दूत


राजधानी का एक संपन्न इलाक़ा जहां कुछ ग़रीबों को भी ‘बिज़नेस’ करने की अनुमति है। बिज़नेस मायने ग़ुब्बारे बेचना, मिट्टी के सस्ते खि़लौने बेचना, भीख मांगना या कुछ ऐसे ही और छोटे-मोटे काम करना।

एक बड़ी और सुंदर गाड़ी। एक हृष्ट-पुष्ट लड़का उतरता है। उसके हाथ में 500-500 रु. के कुछ नोट हैं। उतरकर फ़ुटपाथ पर जाता है जहां एक फ़टेहाल पगली खड़ी आसमान से बातें कर रही है।
‘आप भगवान को मानतीं हैं?’ हृष्ट-पुष्ट लड़का पूछता है।
‘.............’
‘‘मुझे भगवान ने भेजा है, यह लो‘‘, वह 500रु. का एक नोट पगली के हाथ में थमा देता है।
पगली ख़ुशी से नाचने लगती है। उसके कपड़े फ़टे हैं, फ़ुटपाथ पर, और उससे पहले न जाने क्या-क्या सहती आई है मगर नाच रही है। पगली जो है।
हृष्ट-पुष्ट लड़का मन ही मन नाच रहा है। इसने पगली जैसा कुछ नहीं सहा, यूं भी अकसर नाचता ही रहता है। दोनों भगवान को मानते हैं।

यह लड़का एक ग़रीब ग़ुब्बारेवाले के पास पहुंचता है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
‘‘हां, मानता हूं, बहुत मानता हूं।’’
‘‘यह लो 500रु., मुझे भगवान ने भेजा है।’’
ग़ुब्बारेवाला पल-भर सकुचाता है, फिर स्वीकृति के भाव से नोट ग्रहण करता है।

हृष्ट-पुष्ट लड़का इसी तरह कुछ और नोट भगवान को माननेवाले ग़रीबों को बांटता है।

एक फ़टेहाल लड़का अख़बार बेच रहा है।
हृष्ट-लड़का उसके भी पास पहुंच गया है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
अख़बारवाला लड़का उसका मुंह देखने लगता है।
हृष्ट-पुष्ट थोड़ी अड़चन में है। पहली बार उसे अपना सवाल दोहराना पड़ रहा है।
‘‘आप भगवान को मानते हैं ?’’
‘‘.....मानता हूं...तो ?’’
‘‘यह लीजिए, मुझे भगवान ने भेजा है।’’
‘‘ओह! अच्छा! भगवान ने आपको क्यों भेजा!? वह ख़ुद क्यों नहीं आया ?’’
‘‘.............’’
‘‘मुझे भगवान से मिलना है...सुनिए...रुकिए तो सही...मुझे भगवान से मिलना है..’’
‘‘भगवान हर जगह ख़ुद नहीं जा सकते, उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है।’’
‘‘क्यों, तुम्हारे पास आ सकते हैं तो मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’’
‘‘देखिए आप यह हज़ार रुपए रखिए, मुझे औरों के पास भी जाना है, मैं चलता हूं...’’
‘‘नहीं...मैं आपको ऐसे नहीं जाने दूंगा....यहां राजधानी में ऐसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं...आपको सबूत देना होगा कि आपको भगवान ने भेजा है...’’
‘‘..........मगर मैं ऐसा क्यों करुंगा...मैं कुछ दे ही रहा हूं, कुछ ले तो नहीं रहा?’’
‘‘क्या पता तुमने कहीं छुपा कैमरा लगा रखा हो ? बाद में इसे इधर-उधर अपलोड करके हीरो बनते फिरोगे। अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करोगे। लड़कियों को इम्प्रैस करोगे। पांच-दस हज़ार रुपए ख़र्च करना तुम जैसों के लिए मामूली बात है......’’
‘‘......................’’
‘‘तुम तो एकदम चुप हो गए?’’
‘‘आप मेरा हाथ छोड़िए....देखिए हम सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं.....उन्होंने मुझे देने के लिए चुना है और तुम्हे लेने के लिए......’’
‘‘पर मुझे तो भगवान बताने आया नहीं कि उसने मुझे पैसे लेने के लिए चुना है !?’’
‘‘...........’’
‘‘तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे? ठहरो! तुम्हारी शक़्ल तो उस आदमी से मिलती है जो टीवी पर कह रहा था कि कोई नेता अगर ग़रीब जनता से रुपए या दारु देकर वोट मांगे तो बिलकुल मत देना......कमाल है! अगर तुम वही हो तो ख़ुद कितना गिरा हुआ काम कर रहे हो!?’’
‘‘देखिए......’’
‘‘मुझे भगवान से पूछना है कि इन हज़ार रुपयों से मेरा क्या काम हो सकता है, बाक़ी सारी ज़िंदगी मैं क्या करुंगा? सुनो, तुमने कहा हम दोनों तो एक ही भगवान के बनाए हुए हैं। ऐसा करो, तुम अपना गाड़ी और घर मुझे दे दो, मैं वहां रहूंगा, तुम यहां अख़बार बेचो......’’
‘‘नहीं, मैं अख़बार नहीं बेच सकता, मुझे अपना काम पूरा करना है......’’
‘‘लेकिन मुझसे भगवान ने कहा है कि जो लड़का तुम्हे पांच सौ रुपए देने आएगा उसके गाड़ी और घर तुम ले लेना, और उसे यहां अख़बार बेचने को खड़ा कर देना......’’
‘‘..........’’
‘‘कमाल है! तुम कुछ बोल ही नहीं रहे....मैं तो तुम्हारे भगवान की इच्छा मान रहा हूं, तुम मेरे भगवान की इच्छा क्यों नहीं मान रहे......मैं पुलिस को बुलाऊं क्या?’’
‘‘................................’’

अख़बार वाले लड़के ने हृष्ट-पुष्ट लड़के का हाथ पकड़ा हुआ है और बात-चीत जारी है.......

(मजबूर लोगों में पैसे बांटकर भगवान को सिद्ध करने की चेष्टा करने का एक हास्यास्पद वीडियो देखने के बाद लिखा गया)

-संजय ग्रोवर
23-09-2014

नाक तो बचाओ

छोटी कहानी


सिरपनखा ने मनमोहनी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘‘राजकुमार, आप तो बड़े हैंडसम हैं, क्या मैं आपको प्रपोज़ कर सकती हूं?’’

‘‘मैं तो ऑलरेडी मैरिड हूं, फिर भी सोचता मगर स्त्री का यूं मुस्कुरा-मुस्कुरा कर प्रपोज़ करने की पहल करना, मेरी समझ में नहीं आया, पहल करना तो मर्दों का काम है, चलो फिर भी तुम आ ही गई हो तो.....उधर लक्समैन खड़ा है, वो भी कम स्मार्ट नहीं है...ट्राइ कर लो....’’

सिरपनखा चल पड़ी लक्समैन की ओर, अपनी मोतियों जैसी मुस्कान बिखेरते हुए.....उसे क्या मालूम कि एक तो लड़की द्वारा पहल, वह भी ऐसी बोल्ड मुस्कान के साथ, वीर मर्द इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते...

वीर लक्समैन ने उठाई तलवार और साफ़ कर दिए सिरपनखा के नाक और कान......

कहते हैं तभी से लड़कियां, ख़ानदानी और सभ्य मर्दो के सामने,  नाक पर हाथ रखकर हंसती हैं......

-संजय ग्रोवर
22-09-2014

(जो लोग रिएलिटी शोज़ ज़्यादा देखते हैं, उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है....वरना आज दिन-भर चैक कर लेना....)

शनिवार, 13 सितंबर 2014

टॉफ़ियां

छोटी कहानी

जब देखता आ रस रस प्रसाद, वाम चंदर, कानू ग्रेस वगैरह को लड़ते ही देखता। उस दिन भी लड़ ही रहे थे, मगर आज मेरा ध्यान एक ख़ास बात पर चला गया-

‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’

तीनों बच्चे एक-दूसरे के कपड़े खींच-खींचकर यह कॉमन सवाल ज़ोर देकर पूछ रहे थे।

मुझे भी उस दिन पता नहीं क्या सूझी,
‘सुनो, तुम्हारी मम्मी का नाम क्या है?’, मैंने पूछ डाला।

‘गीता देवी’, आ रस रस प्रसाद ने कहा।
‘सुश्री गीता‘, वाम चंदर ने बताया।
‘मिसेज़ गीता’, कानू ग्रेस ने बताया।

मैं समझ गया कि बच्चों के टाइमपास को मैंने सीरियसली ले लिया है।

‘ये लो, टॉफ़ी लो, और प्लीज़ यह कपड़ाफ़ाड़ रिहर्सल किसी दूसरे पार्क में किया करो, यहां के लोग भोले हैं, सच्ची घटना समझकर सीरियस हो जाते हैं’, मैंने उन्हें टॉफ़ियां पकड़ाते हुए कहा।

‘रिश्वत दे रहे हो क्या अंकल ?’

‘नहीं नहीं, रिश्वत नहीं है, अवार्ड है।’

‘अच्छा फ़िर ठीक है, मम्मी ने कहा था रिश्वत बिलकुल मत लेना’, टॉफ़ियां छीलते हुए तीनों दूसरे पार्क की ओर चल दिए।

-संजय ग्रोवर
13-09-2014

बुधवार, 20 अगस्त 2014

महसूस तो करो

मैंने उसे ख़ाली कप दिया और कहा,‘‘लो, चाय पियो।’’

वह परेशान-सा लगा, बोला, ‘‘मगर इसमें चाय कहां है, यह तो ख़ाली है!’’

‘‘चाय है, आप महसूस तो करो।’’

‘‘आज कैसी बातें कर रहे हो, मैं ऐसे मज़ाक़ के मूड में बिलकुल नहीं हूं !?’’

‘‘मज़ाक़ कैसा ? क्या ईश्वर मज़ाक़ है ? ईश्वर ने ही मुझे आदेश दिया है कि मेरे माननेवालों को बिलकुल मेरे जैसी चाय दो जिसका न कोई रंग हो, न गंध हो, न कोई आकार हो, न स्वाद हो, न पेट भरता हो, न ताज़ग़ी आती हो, न बीमारी मिटती हो.............लब्बो-लुआब यह कि जिससे कुछ भी न होता हो मगर फिर भी महसूस होती हो.....आप महसूस तो करो!’’

‘‘ईश्वर ने तुम्हे आदेश दिया, तुमसे बात की! कैसे की ?’’

‘‘जैसे तुमसे करता है।’’

‘‘छोड़ो, क्या बकवास ले बैठे........’’

‘‘ईश्वर की बात तुम्हे बकवास लगती है!? ईश्वर ने मुझसे कहा कि मुझे माननेवालों को सब कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लोग मुझे बेहतर ढंग से महसूस करें ; वे कपड़े भी ऐसे पहनें जो दिखें या न दिखें मगर महसूस हों, वे ऐसे मकानों में रहें जिनका पता भी किसीको न दिया जा सके मगर उन्हें महसूस हो कि वे मकान में रह रहे हैं, इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे महसूस कर पाएंगे....ईश्वर ने मुझसे यह भी कहा कि जो चीज़ें मेरे जैसी नहीं हैं यानि कि साफ़ दिखाई पड़तीं हैं और लोगों के काम आती हैं वे सब मेरे मानने वाले मुझे न माननेवालों को दे दें क्योंकि वे महसूस नहीं कर सकते इसलिए उन्हें सचमुच की चीज़ें चाहिएं........’’

‘‘क्या अनाप-शनाप बोल रहे हो! तुम कब ईश्वर को मानते हो?’’

‘‘हां मैं नहीं मानता मगर तुम साबित करके दिखाओ कि मैं नहीं मानता.....’’

-संजय ग्रोवर
19-08-2014

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

अभिव्यक्ति की बारात

कविता

freedom of expression in their sense

29-07-2014

इन दिनों
फ़ेसबुक पर निकल रही है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
तथाकथित हिमायतियों की बारात

अफ़वाहों का बैण्ड
बजा रहा है
सत्य का बाजा

आंऊं आऊं अहूं आंऊं आऊं अहूं

सफ़लता के बाप ने अपनी
बुज़ुर्ग हो चली बिटिया के लिए
एक बार फिर से
इनके घराने को चुन लिया है

सफ़लता का बाप को भी आए दिन
अपनी बेटी की शादी कहीं न कहीं करनी है
शहर में दो-तीन ही हैं ऐसे बड़े घराने
हर बार इन्हीं में से एक चुनना है
परंपरावादी बाप ठहरा

और इधर इन्हें भी चाहिए
हर हफ़ते कोई बारात
ये भी ठहरे हुए परंपरावादी

मगर चमत्कार देखिए
जैसे ही दोनों की मिलनी होती है
दोनों एक-दूसरे को प्रगतिशील घोषित कर देते हैं

बारात में नाच रहे हैं
तरह-तरह के देसी-विदेशी विचार
कुटेशन और ट्रांसलेशन

कुटेशन और ट्रांसलेशन
बेचारे जैसे बारातों के ही लिए बने हैं

लोगों छतों से देख रहे हैं ललक-ललच कर
जैसे कि जो होना है बस बारातों से ही होना है

बारात देखनी चाहिए
मज़ा तो आता है
देखिए अलग़-अलग़ तबेलों और मेलों से आए हैं
मगर कितनी एक जैसी है लय और ताल
रोज़ाना होता है यह कमाल

एक दारु और दो चख़ने
कैसे सभी बारातियों को
एकता के सूत्र में पिरो देते हैं
इसका ज़िक्र इतिहास में क्यों नहीं होगा!
इन्हीं बारातियों ने लौटकर लिखना है इतिहास
जिन्होंने सिक्के लूटे और लुटाए हैं

एक बाराती ने दूसरे के कुटेशन को सर पर उठा लिया है
जैसे के इसी का हो
और देखिए कैसे बैलेंस बनाकर नाच रहा है

एक बाराती जिसे अभी-अभी कोई पुरस्कार मिला है
जो इसे न मिलता तो इसके किसी चाचा-ताऊ के को मिलता
मुंह में रुमाल डालकर
नागिन की सिंफ़नी पर
पारंपरिक नृत्य कर रहा है
जिसके चारों तरफ़ दाद-नृत्य कर रहे हैं पुंछल्ले
इन्हें भी कभी न कभी मिल सकता है कोई छोटा या बड़ा
बस घराने के लोगों से ऐसे ही बनाके रखनी है

इसीको कहो प्रतिबद्धता

एक बाराती मंटो के नाम पर
लुटा रहा है
दूसरा मुक्तिबोध के नाम पर झूम रहा है
तीसरा भी अतीत के किसी ज़मीन से जुड़े कवि के नाम पर
धरती को चूम रहा है

शुक्र है कि यह संभव नहीं है
कि मंटो यह देख पाए
वरना कांप जाता
भांप जाता
कि ग़लती से उधर को गया
तो पहले ये सारी बारात छोड़कर
मुझे तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी...... बार
पागलख़ाने में भरती कराएंगे
और लौटकर
इत्मीनान से सिक्के लुटाएंगे
फ़िर उसपर संस्मरण लिखकर लायब्रेरी में लगवाएंगे


(जारी)

यूं तो शहर बारातियों से भरा है
हर कोई जैसे बारात के ही लिए मरता-जीता है
(इसी में सुभीता है)
सभी तरह के अंथी और पंथी
बारातों के शैदाई हैं
छोटे-मोटे बेचारे
बारात और वो भी अमीरों की बारात देख
ख़ुद ही सड़क ख़ाली कर देते हैं

कभी-कभी कोई बेचारा कह देता है कि
सेठ जी कबसे तुम्हारी बारात के पीछे फ़ंसा हूं
रिक्शा तो निकाल लेने दो सवारी नाराज़ हो रही है
और बस सारे बाराती मिलकर
दिखा देते हैं उसे उसकी औक़ात

सबने पी जो रखी है एक ही तरह की दारु

फिर एक आता है जो कहता है
कि एक ही जगह कितनी देर नाचते रहोगे ?
यह कोई तुम्हारा घर थोड़े ही है
औरों ने भी आना-जाना होता है

अब यह तो रिक्शेवाला नहीं है
गुमनाम भी नहीं बदनाम भी नहीं है
पांच लोग इसे भी जानते हैं
इसे वैसे नहीं निपटाया जा सकता
‘ठीक है, ठीक है, भाईसाहब ठीक कहते हैं
अनुशासन भी कोई चीज़ होती है
बारात आगे बढ़ाओ भाई, भाईसाहब को रास्ता दो’

‘लो भाईसाहब निकल गये-
अब सही बात बताऊं
इनको कार्ड नहीं दिया था न,
इसलिए नख़रे दिखा रहे थे’

यही इन्होंने तब कहा था
‘इसको पुरस्कार नहीं मिला न
इसीलिए इस तरह बोलता/बोलती है’

अद्भुत प्रगतिशीलता है जिसमें यह तय कर दिया गया है
कि न केवल हम ख़ुद
बल्कि दूसरे भी सभी पुरस्कारों और बारातों के लिए जीतें हैं
इसके आगे नहीं है कोई दुनिया

(जारी)


गुरुवार, 24 जुलाई 2014

आखि़र यह विद्रोह है तो है क्या ?

अंततः विद्रोही को शॉल ओढ़ाई गई, माला पहनाई गई, पुरस्कार दिया गया, प्रसिद्ध किया गया, टीवी पर उसका साक्षात्कार दिखाया गया।

हारकर समाज ने उसको स्वीकार लिया, उसका संघर्ष सफ़ल हुआ, अब वह एक स्थापित और मान्यता प्राप्त विद्रोही है। अब उसे उन सभी कार्यक्रमों में बुलाया जाता है जिनका वह पहले बहिष्कार करता था। वह उन सभी आयोजनों में शामिल होता है जिनमें वे सब रीति-रिवाज-कर्मकांड किए जाते हैं जिनसे वह पहले चिढ़ता था।

सत्य सफ़ल हुआ।

पर अगर सत्य को यही सब करना था तो वह विद्रोह किसके खि़लाफ़ कर रहा था !?

ज़माना तो ज़रा नहीं बदला था मगर सत्य ख़ुद बदल गया था!

यह सत्य की जीत थी या समाज की ?

-संजय ग्रोवर

25-07-2014

गुरुवार, 5 जून 2014

मुरदों का आत्मविश्वास

मुरदों ने एक और ज़िंदा आदमी को मार डाला।

फ़िर उन्होने बहुत तहज़ीब, बहुत विनम्रता के साथ ज़िंदा लोगों को आमंत्रित किया, ‘आईए न, अब आपकी बारी है।’

ज़िंदा लोग असमंजस में पड़ गए, एक तो वे मार-काट में विश्वास रखते नहीं थे, फ़िर भी मारना पड़ ही जाए तो मुर्दों को मारने का आखि़र तरीक़ा क्या हो सकता है ?

‘एक ही तरीक़ा हो सकता है, पहले उन्हें ज़िंदा किया जाए, उनमें इंसानियत पैदा की जाए..... ', किसी ज़िंदा आदमी को युक्ति सूझी।

‘मगर कैसे ? खेल के सारे नियम मुरदों के बनाए हुए हैं! वे क्या मानेंगे कि वे मुरदे हैं ! वे तो दूसरों को जीना सिखाते पाए जाते हैं। वे मानते हैं कि हम लोगों को सिखाने के लिए हैं, हम सबसे बेहतर हैं......

‘करना तो पड़ेगा, करना तो यह भी पड़ेगा कि पहले ज़िंदा लोगों को भी ज़िंदगी के मायने बताने होंगे, मुरदों का आत्मविश्वास देखकर वे इतना प्रभावित हो जाते हैं कि ख़ुदको मुरदा समझने लगते हैं......’

ज़िंदा लोगों मे सोच-विचार जारी है.....

-संजय ग्रोवर
06-06-2014



बुधवार, 14 मई 2014

भगवान और हत्यारे के बीच संदेशों के आदान-प्रदान पर कुछ अटकलें

व्यंग्य

इसमें तो कोई नयी बात नहीं कि दुनिया में भगवान और धर्म के नाम पर हत्याएं होतीं हैं। मेरी उत्सुकता यह जानने में है कि जो लोग ये हत्याएं करते-करवाते हैं उनके मन/दिमाग़ में किस तरह यह ख़्याल, विचार या भाव आता है कि उन्हें भगवान ने इस कार्य के लिए नियुक्त किया है ? किस माध्यम से उन तक तथाकथित भगवान का यह आदेश पहुंचता है कि जाओ, आज इतने बजकर इतने मिनट इतने सैकण्ड पर तुम श्री/मि./मिसेज़/मिस/कुमारी अलां-फ़लां वल्द ढिकां-शिकां मकान नंबर इतना, गली नंबर उतना.......की हत्या कर दो, बाक़ी मैं संभाल लूंगा। क्या भगवान स्वयं यह मैसेज लेकर इनके पास आता है ? अगर भगवान स्वयं आता है तो वह हत्या भी स्वयं क्यों नहीं कर देता? क्या भगवान हत्या को छोटा काम समझता है? अगर हत्या छोटा काम है तो क्या भगवान ने इंसान को छोटे काम करने के लिए बनाया है ?

या भगवान ख़ुद सामने आने से डरता है? अगर डरता है तो मतलब यही है कि वह हत्या को ऐसा काम नहीं मानता जिसे ख़ुद किया जाए? क्यों? क्या इससे भगवान की इमेज ख़राब होती है? भगवान यह काम करने के लिए इंसान की आड़ क्यों लेता है? मेरी दिलचस्पी यह जानने में भी है कि भगवान और हत्यारे के बीच बात-चीत एकतरफ़ा होती है कि दोतरफ़ा ? कभी हत्यारे का भी तो मन होता होगा कि दो शब्द वह भी कहे। मान लो उसे यही कहना हो कि, सर आज तो मेरी तबियत ठीक नहीं है, अभी आधा घंटे पहले ही दो को निपटा के आया हूं, बोर हो रखा हूं, घरवाले भी पूछते हैं कि आए दिन छुप-छुपके क्या करने चले जाते हो, बड़ी शर्मिंदग़ी-सी होती है, कोई ऐसा काम दो न सर जो छुप-छुपके न करना पड़े........तो वह भगवान तक कैसे अपनी बात पहुंचाता होगा ?

भगवान इस कार्य के लिए जिस आदमी को चुनता है, क्या उसे वह कोई चिट्ठी वगैरह भेजता है? भगवान की हैंडराइटिंग कैसी है? यह सबको पता होना चाहिए। आजकल वैसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं। कोई आदमी आए और कहे कि मुझे भगवान ने तुम्हारी हत्या के लिए भेजा है, हम कैसे पता लगाएंगे कि यह सच बोल रहा है? कोई अथॉरिटी लैटर वगैरह तो होना चाहिए न उसके पास! ऐसे तो कोई भी आकर किसीकी हत्या कर जाएगा! बोल देगा कि भगवान ने भेजा था। अगर हत्यारा हमें भगवान की हैंडराइटिंग में लिखा हमारी हत्या का आदेशपत्र दिखाए तो हम भी उसके फ़ेवर में एक पत्र लिखकर छोड़ जाएं कि इस बेचारे को थाना-कोर्ट-कचहरी के चक्कर में मत फंसाना, यह तो बेचारा मजबूर आदमी है, इसका दिल-दिमाग़ अपने कब्ज़े में नहीं है, मजबूरी में किसी और का काम कर रहा था। किसका ? भगवान का, विश्वास न हो तो यह इसके हाथ की चिट्ठी देख लो, भगवान के साइन से साइन मिला लो। आपके पास तो और भी चिट्ठियां रक्खी होंगी, आखि़र यह कोई पहली हत्या थोड़े न हो रही है भगवान के नाम पर! भगवान ठहरा दबंग, उसके कार्य से कोई कैसे इन्कार कर सकता है?

मगर फ़िर एक समस्या और खड़ी हो सकती है। बाक़ी लोग कहेंगे कि इस दुनिया में तो सारे ही काम भगवान की मरज़ी से होते हैं। तो बाक़ी हत्यारों को सज़ा क्यों दी जाती है? यह तो भेदभाव है। जब सब कुछ भगवान की मरज़ी से होता है तो ये थाना-कोर्ट-कचहरी सब बंद क्यों नहीं कर देते?

मुझे तो हैरानी यह है कि भगवान जैसा सर्वशक्तिमान हर काम आड़ में क्यों करता है? अभी मैंने कहीं पढ़ा, कुछ लोग कह रहे थे कि चमत्कार होनेवाला है, सब परेशानियां दूर हो जाएंगीं, एक बार हमें जीत जाने दो, भगवान सब ठीक कर देगा। अजीब बात है, जब भगवान ने ही सब ठीक करना है तो तुम्हारी ज़रुरत क्या है? भगवान सीधे ही सब ठीक कर देगा न। भगवान ने भी क्या मैच से पहले नेट-प्रैक्टिस करनी होती है? कब तक चलेगी यह नेट-प्रैक्टिस ? कभी मैच भी शुरु होगा कि नहीं? कभी नतीजा भी निकलेगा कि नहीं?

बहरहाल मेरी दिलचस्पी इस बात में पूरी तरह बनी हुई कि जो लोग ये हत्याएं करते-करवाते हैं उनके मन/दिमाग़ में किस तरह यह ख़्याल, विचार या भाव आता है कि उन्हें भगवान ने इस कार्य के लिए नियुक्त किया है ?

चलिए तब तक कुछ मनोविज्ञान पढ़ा जाए।

-संजय ग्रोवर
14-05-2014


सोमवार, 5 मई 2014

चमचे

चित्र गूगल के सौजन्य से

ये नाज़ुक कमर पर से ख़मदार चमचे
कि बख़्शा गया जिनको शौक़े-बधाई
है घुटनों में झन्कार सरमाया इनका
बेमतलब अहंकार इनकी कमाई

न आराम शब को न राहत सवेरे
दिखे मस्लहत बस लगाते हैं फेरे
लगे जिस घड़ी इनको मन सूना-सूना
लगा दें ये इक-दूसरे को भी चूना
ये हर एक को वायदा देने वाले
ये हर एक से फ़ायदा लेनेवाले

लचीली कमरवाले गर सर उठाएं
तो डर है न इनकी कमर टूट जाए
अगर ये किसी दिन अंगीठी पे उबलें
तो शायद जुदा शक़्ल ही लेके निकलें

कोई इनको इंसान के गुर सिखा दे
कोई इनकी पीछे की डंडी गिरा दे
-संजय ग्रोवर
05-02-2014
(साहब फ़ैज़ साहब से दुष्प्रेरित)

शुक्रवार, 2 मई 2014

परिवार संस्था का तात्कालिक महत्व

व्यंग्य

परिवार संस्था का अपने यहां बड़ा महत्व है। यह धूप में छाते की तरह होता है। छाते भी अपने यहां दो तरह के तनते आए हैं-एक काला और दूसरा रंगीन। हांलांकि काला अपने यहां बुराईयों और रंगीन, रंगीनियों का प्रतीक होता है। पर प्रगतिशीलता का अपने यहां पहला अर्थ है अवसरवादिता। तो हम प्रतीकों की अदला-बदली करके प्रगतिशील होते रहते हैं। और आखि़री मतलब है मौक़ापरस्ती। तो भी हम प्रतीकों की अदला-बदली करके प्रगतिशील होते रहते हैं। यहां आप चाहो तो अदला-बदली की जगह बदला-अदली लिख लो। इससे आपको पता लगेगा हममें और उनमें बड़ा बुनियादी और बेसिक फ़र्क हैं।

परिवार नाम का छाता आपकी कमियों को ढंक लेता है, यही इसकी ख़ूबी है। दूसरी ख़ूबी यह है कि कमियों को बख़ूबी, ख़ूबियां बना देता है। आपको भी अनुभव होगा किसीसे पूछो कि यार तुम एक ही चीज़ के किसीसे पांच सौ रुपए और किसीसे पांच हज़ार कैसे ले लेते हो? कोई ईमान-धरम है कि नहीं तुम्हारा ? वह तुरंत कहता है कि  स्सा....तेरे तो बीवी-बच्चे हैं नहीं, तू क्या जाने परिवार कैसे चलता है। आप हड़बड़ा जाते हो, अपराधबोध में गढ़ जाते हो, कॉन्फ़िडेंस लूज़ कर जाते हो। इस तरह परिवार कमाई के रंगारंग तरीकों को जस्टीफ़ाई करता है, संबल देता है, कंबल भी देता है, मोराल देता है, मॉरल सपोर्ट देता है।

परिवार का महत्व इसीसे पता चलता है कि जिन्हें लोग आवारा, शोहदा, लुच्चा, लंपट, गुंडा और पता नहीं क्या-क्या कहतें हैं, वे सब भी अकसर घोषित परिवारों की पैदाइश होते हैं। फ़र्क बस इतना ही होता है कि जो गुंडे आगे भी अपनी गुंडागर्दी प्रतिष्ठा और इज़्ज़त के साथ जारी रखना चाहते हैं वे परिवार बसाना बेहतर समझते हैं। वैसे आजकल ग़ैरपारिवारिक गुंडो को भी थोड़ी-बहुत मान्यता मिलने लगी है। इससे मामला थोड़ा-बहुत ऑप्शनल हुआ है। अकसर कहा जाता है कि घर की बात घर में रहे तो अच्छा है। इसलिए समझदार लोग जिस व्यक्ति से संबंधित बात को घर में ही रखना चाहते हैं उस व्यक्ति को ही घर में रख लेते हैं यानि कि उससे घरेलू रिश्ते डेवलप कर लेते हैं।

यूं तो हमारा सारा देश ही एक परिवार की तरह है।

-संजय ग्रोवर

02-05-2014


शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

चाहें तो इसे समीक्षा समझें-

जय हो

एक कोई लड़की है। कुछ गुण्डे हैं। उनके पास अच्छी, बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं। वे लड़की को उन्हीं गाड़ियों में उठा ले जाना चाहते हैं। वह जाना नहीं चाहती। जय फ़िल्म का हीरो है। वह गुण्डों को मारता है। इतना नहीं मारता जितना क्लाइमैक्स में मारा जाता है मगर कम भी नहीं मारता।

जय में एनर्जी काफ़ी भरी हुई है। वह न सिर्फ़ बहुत ऊंचा-ऊंचा उछलकर मार-पीट करता है बल्कि दो ही मिनट के बाद ज़ोर-ज़ोर से नाचता हुआ, एक गाना भ्रष्टाचार पर भी गाता है। इस गाने को सुनकर एक पुराना गाना याद आता है। यह रहा उसका लिंक-

http://youtu.be/NykVp7qG_Ss

इस बीच पता चलता है कि इस फ़िल्म में तब्बू, सलमान की बहिन है। पहले भी एक तब्बू आया करती थीं फ़िल्मों में। काफ़ी प्रतिभाशाली अभिनेत्री रहीं।

पता नहीं ये वही हैं या कोई और हैं। शक़्ल बिलकुल वैसी ही है।

डेज़ी शाह नयी अभिनेत्री हैं। वैसे तो कई बार पुराने भी बिलकुल नयों जैसा अभिनय करते हैं। पर डेज़ी की तंदरुस्ती ठीक-ठाक है। लहंगे के साथ गमबूट पहनकर काफ़ी भूकंपीय नृत्य करतीं हैं।

इधर गाना खत्म होता है, उधर जय एक विकलांग लड़की की मदद करता है। जय इस फ़िल्म में बहुत सारे (तक़रीबन चार-पांच) लोगों की सीधे-सीधे मदद करता है। वह यही करता रहता है।

फ़िल्म का एक प्लस प्वाइंट यह है कि जय के भांजे का नाम कबीर है।
मुझे जब किसी फ़िल्म में प्लस प्वाइंट निकालने हों तो मैं कैसे भी करके निकाल लेता हूं।

ट्रैफ़िक जाम की वजह से दूसरी बार कोई भी विकलांग लड़की की मदद के लिए नहीं पहुंच पाता। लड़की आत्महत्या कर लेती है। ट्रैफ़िक इसलिए जाम है कि किसी मंत्री की बेटी ने वहां से गुज़रना है।

फ़िल्म में मंत्री, पुलिस वगैरह के मुद्दे शुरु हो जाते हैं।
फ़िल्म शायद गंभीर हो रही है।

मैं आपको ठीक से बताता हूं।

जय एक बड़े घर का आम आदमी है। उसके पास तरह-तरह के सादा कपड़े हैं जिनके रंग थोड़े भड़कीले-भड़कीले से हैं। कपड़े तो चलो फ़ुटपाथ पर मिल जाते हैं पर उसके पास तो बाइकस् भी चार-पांच हैं। एक बार तो वह एक आदमी को बाइक फ़ेंककर ही मार देता है।

इस फ़िल्म से यह सीख भी मिलती है कि लोगों को उछल-उछलकर मारने के लिए मारने के लिए कृश या सुपरमैन होना ज़रुरी नहीं। बस थोड़ा फ़्लैक्सीबिल चरित्र का आदमी होना चाहिए जिसके चाहे जैसे विज़ुअल्स् बनाए जा सकें। इसके लिए कई लोग न्यूज़ चैनल्स् भी देख सकते हैं।

चूंकि जय को कई बार कई लोगों की मदद करनी होती है इसलिए कई बार कई लोगों को पीटना भी होता है।

आधी फ़िल्म गुज़र जाती है तो फ़िल्म के सभी पात्र अचानक ही जय को जय अग्निहोत्री कहकर पुकारना शुरु कर देते हैं।
इसे भी आप एक नये प्रयोग या किसी भारी सस्पेंस के ख़ुलने की तरह ले सकते हैं।

बहरहाल फ़िल्म में काफ़ी कुछ है। परंपरा भी है। स्त्रियां किचन में खाना वगैरह बनातीं हैं और पुरुष डायनिंग टेबल पर राजनीति वगैरह डिसकस करते हैं या खाने का इंतज़ार करते हैं। फ़िल्म में प्रगतिशील प्रेम भी है। जय का भांजा कबीर अपनी पड़ोसन रिंकी और जय के प्रेम के दौरान कई प्रगतिशील संवाद बोलता है। यहां तक कि हीरोइन रिंकी एक बार मारपीट के दौरान जय की मदद करने की भी कोशिश करती है जो कि किसी वजह से हो नहीं पाती।

फ़िल्म में कई लोग हैं जो बहुत अच्छे हैं, कई हैं जो बहुत ख़राब हैं। चूंकि जय सबसे अच्छा है इसलिए सारे ख़राब लोगों को वह अकेला ही मार डालता है। जो दस-पांच लोग उसके हाथों नहीं मरते, उसे आप उनकी प्राकृतिक मौत समझ लीजिए।

मैं बिलकुल भी नहीं कह रहा कि फ़िल्म अजीब है। इस तरह तो फ़िर मुझे बहुत सारी फ़िल्मों को अजीब कहना पड़ेगा। फ़िल्म में जिसके लिए अभिनय का जितना भी स्कोप रहा उतनी कोशिश सभी ने की है।

कबीर का रोल करनेवाला लड़का, सीरियसली, मुखर और संभावनाशील है। नयी अभिनेत्री डेज़ी शाह भी ठीक-ठाक हैं। गीत-संगीत कई लोगों मधुर या मेलोडियस भी लग सकते हैं।

आजकल फ़िल्में अपनी सारी कमाई पहले ही दिन कर लेती हैं। बाद में कोई देखे कि न देखे, फ़र्क़ भी क्या पड़ता है।

-संजय ग्रोवर

30-01-2014

Cast, Crow, Cry, Crew etc......

Directed by Sohail Khan, 
Writing Credits : A.R. Murugadoss (story), Dllip Shukla (screenplay and dialogue)

Salman Khan as Jai Agnihotri
Tabu as Geeta
Daisy Shah
Danny Denzongpa
Sabareesh
Ashmit Patel
Yash Tonk
Nadira Babbar
Pulkit Samrat


Producer
Sunil A Lulla, Sohail Khan


Story Writer
A R Murugadoss (Based on 2006 Tollywood Film 'Stalin' directed A. R. Murugadoss)

Screenplay & Dialogues
Dileep Shukla

Music Director
Sajid-Wajid, Amal Malik, Devi Sri Prasad

Choreographer
Ganesh Acharya

Background Music
Sandeep Shirodkar

Choreographer
Remo D'Souza, Radhika Rao, Vinay Sapru, Jani Basha, Mudassar Khan

Costume Designer
Ashley Rebello, Alvira Agnihotri

Editor
Ashish Amrute

Director of Photography
Santosh Thundiyil

Production Designer
Sabu Cyril

Action Director
A. Arasakumar, Ravi Varma

Publicity Designer
Rahul Nanda

Sound Designer
Jitendra Singh, Leslie Fernandes

Executive Producer
Prapti Doshi Moorthy

Media Consultants
Spice








(इस समीक्षा को ज़्यादा गंभीरता से न लें, बहुत हल्के में भी न लें।)


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