मंगलवार, 11 नवंबर 2014

क्रांति-2

व्यंग्य


तथाकथित प्रगतिशील, कट्टरपंथी को ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गया, पर कट्टरपंथी था कि कहीं मिल नहीं रहा था।

तथाकथित प्रगतिशील उससे दो-दो हाथ करने को आतुर था, बेताब था, उत्तेजित था मगर कट्टरपंथी था कि सामने नहीं आ रहा था। पत्रकार, रिपोर्टर सब लाइव टेलिकास्ट के लिए तैयार बैठे थे मगर कट्टरपंथी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।

दिखाई पड़ता भी कैसे, वो तो उन्हींके अंदर छुपा बैठा था।

-संजय ग्रोवर


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