शनिवार, 13 सितंबर 2014

टॉफ़ियां

छोटी कहानी

जब देखता आ रस रस प्रसाद, वाम चंदर, कानू ग्रेस वगैरह को लड़ते ही देखता। उस दिन भी लड़ ही रहे थे, मगर आज मेरा ध्यान एक ख़ास बात पर चला गया-

‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’
‘क्या तेरी मम्मी ने तुझे यही सिखाया है?’

तीनों बच्चे एक-दूसरे के कपड़े खींच-खींचकर यह कॉमन सवाल ज़ोर देकर पूछ रहे थे।

मुझे भी उस दिन पता नहीं क्या सूझी,
‘सुनो, तुम्हारी मम्मी का नाम क्या है?’, मैंने पूछ डाला।

‘गीता देवी’, आ रस रस प्रसाद ने कहा।
‘सुश्री गीता‘, वाम चंदर ने बताया।
‘मिसेज़ गीता’, कानू ग्रेस ने बताया।

मैं समझ गया कि बच्चों के टाइमपास को मैंने सीरियसली ले लिया है।

‘ये लो, टॉफ़ी लो, और प्लीज़ यह कपड़ाफ़ाड़ रिहर्सल किसी दूसरे पार्क में किया करो, यहां के लोग भोले हैं, सच्ची घटना समझकर सीरियस हो जाते हैं’, मैंने उन्हें टॉफ़ियां पकड़ाते हुए कहा।

‘रिश्वत दे रहे हो क्या अंकल ?’

‘नहीं नहीं, रिश्वत नहीं है, अवार्ड है।’

‘अच्छा फ़िर ठीक है, मम्मी ने कहा था रिश्वत बिलकुल मत लेना’, टॉफ़ियां छीलते हुए तीनों दूसरे पार्क की ओर चल दिए।

-संजय ग्रोवर
13-09-2014

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