शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मूवी द ड्रामा

व्यंग्य

फ़िल्म चमत्कारों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खि़लाफ़ है और हिट हुई है। लोग देखकर निकल रहे हैं। आईए, इनसे बातचीत करते हैं कि फ़िल्म ने इनके दिमाग़ों को कितना हिट किया है....

!!!
‘आपसे बात करना चाहेंगे, कैसी लगी फ़िल्म आपको ?’
‘झकास, क्या बनाई है साब, इनका तो जवाब ही नहीं है, गजब।’
‘क्या अच्छा लगा आपको?’
‘अंधविश्वास का बताया है साब, इनमें नहीं पड़ना चाहिए।’
‘अच्छा, ज़रा बताएं कि......
‘हमें ज़रा जल्दी है भाईसाब, रस्ते में मंदिर भी जाना है, हमारा दिखाईएगा ज़रुर, रात को देखेंगे, हम भी अंधविश्वास के खि़लाफ़ हैं, नमस्कार।’

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‘आप तो यंग हैं एकदम, फ़िल्म का मैसेज क्या है?’
‘कमाल का मैसेज है सर, हाउ एंथूज़ियास्टिक! ये जो बाबा लोग हैं सबको उल्लू बनाते हैं, इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, भगवान को सीधे एप्रोच करना चाहिए....’
‘अच्छा अब सीधे एप्रोच करेंगी आप, कैसे करेंगी ?’
‘कैसे !? कैसे मतलब !? हुम्म........पहले मैं सिर्फ़ टेम्पलस् में जाती थी, अब चर्चेज़ और मॉस्क्स् में भी जाऊंगी.....
‘मगर वहां या तो मूर्त्तियां होतीं हैं या मिडलमैन, सीधे तो भगवान कहीं मिलता नहीं......
‘आप टीवी रिपोर्टर हैं !?’
‘हां, क्यों ?’
‘नहीं टीवी रिपोर्टर तो ऐसे सवाल पूछते नहीं, वो तो जनरल सवाल पूछते हैं!’

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‘अच्छा आप साइक़ियाट्रिस्ट हैं, आपके लिए एक खास सवाल है मेरे पास, यह बताईए कि हर बात में सवाल पूछने का मतलब है कि बात-बात में शक करना। मनोचिकित्सा में ज़्यादा शक करना स्क्त्ज़िोफ्रीनिया का एक लक्षण है, नायक को स्कित्ज़ोफ्रीनिक क्यों न माना जाए ?’
‘अजी कैसी बात कर रहे हैं आप ? ऐसे कहीं होता है ? इतने इंटेलीजेंट आदमी ने फ़िल्म बनाई है और....
‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।’
‘देखिए आप फ़िल्म को लाइटली ले रहे हैं.....’
‘चलिए, शुक्रिया, हम किसी और से बात करते हैं, ऐक्सक्यूज़ मी....

!!!
‘जी मैं फिल्म लाइन से ही ताल्लुक रखता हूं, फ्रैश हो गया, फ्री हो गया...’
‘अच्छा अब क्या करेंगे ?’
‘बस पहले तो एक कार्यकंम में जाना है जहां हमारे एक मित्र नास्तिकता पर कविताएं सुनाएंगे, आप भी आईएगा, बड़े सज्जन और धार्मिक व्यक्ति हैं। उसके बाद अम्मा को तीर्थयात्रा पर ले जाने का बोला था, जाकर बस उसीकी तैयारी करता हूं.....
‘अच्छा तो अब आप भी ऐसी कोई फ़िल्म बनाएंगे ?’
‘अर्रे यार.....आप भी.....समझिए कि यह मैंने ही बनाई है....
‘समझ गया।’
!!!

-संजय ग्रोवर

27-12-2014


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