शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

कृपया पागल-धर्म को बचाएं।

दोस्तो, पागल-धर्म एक बार फ़िर ख़तरे में है।
आप तो जानते ही हैं कि पागल-धर्म पर हमले कोई नयी बात नहीं है। पागलों की उपलब्धियां किसीको भी ईर्ष्या में डाल सकतीं हैं। हांलांकि पागल कभी भी अपने में और तथाकथित अ-पागलों में फ़र्क़ नहीं करते बल्कि उन्हें ख़ुदसे कहीं बड़ा पागल ही मानते हैं। मगर आप जानते ही हैं कि अत्यधिक विनम्रता का अकसर लोग अनुचित फ़ायदा उठाते हैं। कई लोग हम पर यह आरोप तक लगाते हैं कि हम वास्तव में पागल नहीं हैं बल्कि पागल होने का नाटक कर रहे हैं। पता नहीं वे किस बात का बदला ले रहे हैं जबकि शायद ही किसी पागल ने उनसे कहा हो कि हे अ-पागलों! असली पागल तो आप हो, हम तो आपके पागलपन की वजह से पगलाए पड़े हैं।
बहरहाल, हमें उनकी तरह हिंसक नहीं होना है, अपनी विनम्रता, मुलायमियत, मक्खनियता, उदारता वगैरह को भरसक मेंटेन करना है। धर्म की रक्षा हर हाल में आवश्यक है। वो पागल ही क्या जो धर्म के लिए पागल न हो ! मैंने इसके लिए अहिंसक रणनीति तैयार की है। याद रखें, जब हम धर्म-रक्षा में जुटेंगे तो संभव है कि धर्म ख़ुद भी इसका विरोध करे, हाथ-पैर मारे कि मेरी रक्षा मत करो, मुझे इसकी कोई ज़रुरत नहीं है, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, वगैरह। मगर हमें इसपर ध्यान नहीं देना है। बच्चे को ठीक करना हो, कड़वी दवा देनी हो तो नाक-मुंह बंद करके हाथ-पैर पकड़ने ही पड़ते हैं। इतनी हिंसा तो चलती है। कई अनुभवी पाग़लों का तो कहना है कि हिंसा अगर अहिंसक ढंग से की जाए तो कितनी भी चलती है। बहरहाल जब अ-पागलों की बातों का ही कोई सिर-पैर नहीं होता तो पागलों से ही क्यों ज़्यादा उम्मीद रखी जाए।
कल मैं अपने सुझाव आपके सामने रखूंगा। तब उसपर आपकी राय एकत्रित की जाएगी। धीरज हो तो कल तक रुकना। वरना अभी भी आपको कौन रोक लेगा !
(क्रमश:)
-संजय ग्रोवर


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