गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

नाक़ाबिले-बर्दाश्त

लघुव्यंग्य

अपने यहां लोग अकसर अपने बारे में कुछ बातें बहुत अच्छे से जानते हैं।

जैसे मैं देखता हूं कि कई लोग दूसरों से तो कहते ही हैं-‘बिज़ी रहो-बिज़ी रहो’, ख़ुद भी अकसर बिज़ी रहने की कोशिश करते पाए/पकड़े जाते हैं। वे कभी ख़ाली हों तो झट से टीवी चला देते हैं, एफ़एम सुनने लगते हैं, चाय-कॉफ़ी बना लेते हैं, पड़ोस में ताक-झांक करने लगते हैं, कूड़ा फेंक देते हैं, दीवार तोड़ देते हैं, अवैद्य कमरे बनाने लगते हैं.....लेकिन अकेले किसी हालत में नहीं बैठते.....वे अपने साथ अकेले बैठने में डरते हैं...कई लोग कहते हैं कि अकेले में हम कहीं पागल न हो जाएं...
 

इससे पता चलता है कि दूसरे तो दूसरे, वे ख़ुद भी अपने-आपको बर्दाश्त नहीं कर सकते।

-संजय ग्रोवर
08-12-2016

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