मंगलवार, 30 मई 2017

अकेला बनाम निराकार

उनके पास समाज है।
उनके पास परिवार है। 
उनके पास धर्म है।
उनके पास धर्मनिरपेक्षता है।
उनके पास राजनीति है।
उनके पास राजनीतिक पार्टियां हैं।
उनके पास वाम है।
उनके पास संघ है।
उनके पास कवि हैं।
उनके पास आलोचक हैं।
उनके पास पक्ष है।
उनके पास विपक्ष है।
उनके पास निष्पक्ष है।
उनके पास लड़के हैं।
उनके पास लड़कियां हैं।
उनके पास महापुरुष हैं।
उनके पास गुंडे हैं।
उनके पास सादगी है।
उनके पास महानता है।
उनके पास आम है।
उनके पास ख़ास है।
उनके पास दर्शक हैं।
उनके पास प्रायोजक हैं। 
उनके पास दोस्त हैं।
उनके पास दुश्मन हैं।
उनके पास पड़ोसी हैं।
उनके पास अजनबी हैं।
उनके पास मनोरोगी हैं।
उनके पास मनोविकित्सक हैं।
उनके पास भीड़ है।
उनके पास अकेलापन है।
उनके पास बहादुरी है।
उनके पास निरीहता है।
उनके पास धार्मिक गाय है।
उनके पास सेकुलर गाय है।
उनके पास ख़ुशबू है।
उनके पास चमचे हैं।
उनके पास हैट है।
उनके पास गमछे हैं।
वे सब मिलजुलकर रहते हैं।
वे सब अकेले पड़ जाते हैं।
उनके पास गुझिया और सेवईयां हैं।
उनके पास एकता है।
उनके पास सांप्रदायिकता है।
उनके पास पाख़ाना है।
उनके पास ख़ज़ाना है।
उनके पास फ़िल्म इंडस्ट्री है।
उनके पास फ़िल्म आलोचक हैं।
उनके पास इलैक्ट्रॉनिक मीडिया है।
उनके पास प्रिंट मीडिया है।
उनके पास सोशल मीडिया है।
उनके पास बेईमानी है।
उनके पास ईमानदारी के प्रतीक हैं।
उनके पास कट्टरपंथ है।
उनके पास प्रगतिशीलता के प्रतीक हैं।
उनके पास धर्म है, भगवान है.....
उनके पास दुनिया है, दुनियादारी है......
उनके पास इमेज है, प्रतिष्ठा है, सफ़लता है, समर्थक हैं, चेले हैं, मेले हैं....

फिर वे मुझसे क्यों परेशान हैं ? 
मेरे अकेले के पास तो सिर्फ़ कॉमन सेंस है !!




-संजय ग्रोवर
30-05-2017



पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं 'पुराने पोस्ट'(Older Posts) पर क्लिक करें-