बुधवार, 11 जुलाई 2012

‘छत के टैंक में पनडुब्बी’ से एक अंश

हक्काल तत्काल कबूतर की गुफ़ा से निकल कर शेर के घोंसले में प्रवेश कर गया। भीतर हड्डियां तोड़ देनेवाला अंधेरा था। उसने थर्माटेप निकालकर नापना शुरु किया। घोंसला तकरीबन 300 बीघे ऊंचा और 530 टन चौड़ा था। अंधेरे में लगभग 937 परेशानियों का सामना करते हुए वह पिछले दरवाजे तक जा पहुंचा जो कि स्विटज़रलैंड की तरफ़ खुलता था।
अब मुसीबत वह थी कि दरवाज़ा खुले कैसे ? वह कान वगैरह में उंगली डालकर सोच ही रहा था कि उसकी नज़र भूसे के ढेर पर पड़़ी। आह! मिल गया! हक्काल ने आव देखा न ताव, बस गोताखोरी की पोशाक पहनी और भूसे के ढेर में कूद पड़ा। तकरीबन डेढ़ घंटा तैराकी करने करने के बाद जब वह लौटा तो उसके हाथ में एक सुई-धागा था। बस, उसने दरवाज़े को सिलना शुरु कर दिया। जहां-जहां वह सिलता जाता, वहां-वहां दरवाज़ा खुलता जाता। साढ़े तीन घंटे की तुरपन के बाद दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
सामने देखा तो उसकी आंखें फटते-फटते बचीं।
सामने जिगपोली खड़ा था।
अत्सविधुरदेवाहमदम.....वो वहीं से चीखा।
औनेपौनेफिरभीकमकम......ये यहां चीखा।
दरअसल ये कोडवर्डस् थे।
दोनों में कमरतोड़ गलामिलाप हुआ।
अलग होते ही हक्काल ने जिगपोली का मुंह नोंच लिया। यह क्या !? नीचे से तो ख़ुद हक्काल निकल आया !
जिगपोली ने भी हक्काल का चेहरा उधेड़कर जिगपोली को निकाल लिया।
(क्रमशः)
मेरे आनेवाले नये जासूसी उपन्यास ‘छत के टैंक में पनडुब्बी’ से एक अंश। टू प्वांइट फ़ाइव सीग्रेड एजेंट सीरीज़ के ये उपन्यास सिर्फ़ पागलखाना प्रकाशन से प्रकाशित होते हैं।

-संजय ग्रोवर

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