शनिवार, 3 मार्च 2012

ये पुस्तकों के मेले...


रेखाकृति: संजय ग्रोवर

ये पुस्तकों के मेले
दिल्ली में कम न होंगे
अफ़सोस हम भी होंगे

‘कुछ तो पड़ेगा लेना
थोड़ा चना-चबैना
मैंने तेरी ख़रीदी
अब तू भी मेरी ले ना!

कुछ तू भी मुझपे लिख दे'
बोलेंगे सब थकेले
ये पुस्तकों के मेले..

पुस्तक के संग पुस्तक
देती हैं ख़ुदपे दस्तक
‘बहिना, खड़ी रहेंगीं
हम अनबिकी-सी कब तक

सब देखकर निकलते
देते नहीं हैं धेले’
ये पुस्तकों के मेले...

‘इक दिन पड़ेगा झुकना
सरकारी मद में बिकना
फ़ैशनपरस्त पाठक
की रैक में क्या सजना

हम भी वही करेंगीं
जो करते हैं दलेले’
ये पुस्तकों के मेले...

--संजय ग्रोवर
रेखाकृति: संजय ग्रोवर


(पैरोडी बतर्ज़ ‘ये ज़िंदगी के मेले..’, फिल्म: मेला, गायक: मो. रफ़ी, संगीत...
नोट: ये सब लिखने से इम्प्रैशन अच्छा पड़ता है)

15 टिप्‍पणियां:

  1. ये पुस्तकों के मेले...
    जाने दीजिये सर सेंत मत क्जिजिये नहीं तो आँखों में आंसू आ जायेंगे...हाय रे सरकारी खरीद...हाय हाय..

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये पुस्तकों के मेले...
    जाने दीजिये सर सेंत मत क्जिजिये नहीं तो आँखों में आंसू आ जायेंगे...हाय रे सरकारी खरीद...हाय हाय..

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  3. कल 05/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बहुत अच्छी और रोचक कविता बन गई है...:)

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  5. सत्य उकेरा है …………शानदार प्रस्तुति।

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