गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

न्यू कबीर एण्ड संस्

व्यंग्य


यह कल्पना ही दिलचस्प है कि कबीरदास एक राजनीतिक दल के घोषित तौर पर सदस्य हैं। तीन दलों में उनका अच्छा आना-जाना, उठना-बैठना और खाना-पीना है, पांचवे की भी समय-समय पर तारीफ़ कर देते हैं। कमाल एक उद्योगपति के अख़बार में संपादक है,दो-चार लाख़ रु महीने के कमाल दिखा रहा है, लोई अपनी मम्मी के साथ दो एन. जी. ओ. चला रही है। सारा परिवार सारे चैनलों पर बुलाया जाता है, हर जगह छपता-छुपता है।

जो कोई भी उनसे तर्क करता है उसे वे तर्कपूर्ण जवाब देने के बजाय वामपंथी, संघी, हिंदू, मुस्लिम, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई-बसपाई वगैरह सिद्ध करने में जुट जाते हैं। या उससे उसकी पढ़ाई के सर्टीफ़िकेट मांगने लगते हैं। साथ चल रहे अपने असिस्टेंट से अपनी डिग्रियों की फ़ाइल दिखाने को कहते हैं।

कबीरदास पुरस्कार के लिए लॉबीइंग कर रहे हैं।

कबीरदास फ़ेसबुक पर स्टेटस डालने के लिए पार्टी-लाइन, एजेण्डा और मैनीफ़ैस्टो का अध्यन कर रहे हैं।

कबीरदास पत्थरवादियों में शामिल होकर एक अकेले पड़ गए आदमी पर पत्थर मार रहे हैं।

कबीरदास तर्क के नाम पर अफ़वाहें फैला रहे हैं।

कबीरदास ने अपना संगठन बना लिया है और विपरीत विचारों वाले लोगों को ख़त्म करने के लिए उनके आस-पास अपने आदमी प्लांट कर रहे हैं।

कबीरदास अपने वातानुकूलित ऑफ़िस में लंगोटी पहने, लकुटिया संभाले सब कुछ छोड़कर चलने को (फ़िर दोगुनी-चार गुनी ‘उपलब्धियों’ के साथ लौटने को) तैयार बैठे हैं। पीछे शोकेस में विभिन्न अवार्ड और ट्राफ़ियां बिलकुल ऐसे ही सजी हैं जैसे उस संस्कृति के लोगों के यहां सजी हैं जिनके वे कट्टर विरोधी हैं।




और जिसके पास इनमें से कुछ नहीं, वह उनके वातानुकूलित ऑफ़िस में घुसने से डर रहा है। 



वैसे, ऐसे कबीरदास से मिलकर वह करेगा भी क्या ?

-संजय ग्रोवर


05-10-2013

 

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