सोमवार, 2 नवंबर 2015

नाम छिलके के जैसे उतर जाएंगे

ग़ज़लनुमां

काम अपना हम कर जाएंगे
मर जाएंगे तो मर जाएंगे

हम जैसे कभी जो बिगड़ जाएंगे
देख लेना कि कितने सुधर जाएंगे

जान जाएगी जब आसमां का असल
प्यारी धरती के पांव उखड़ जाएंगे
31-10-2015

एक लम्हा भी तो नहीं जी पाएंगे
वो जो जीने को सारी उमर जाएंगे

काम हमने किए नाम तुम ओढ़ लो
नाम छिलके के जैसे उतर जाएंगे
02-11-2015



-संजय ग्रोवर
02-11-2015


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

निश्चिंत रहें, सिर्फ़ टिप्पणी करने की वजह से आपको पागल नहीं माना जाएगा..

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं 'पुराने पोस्ट'(Older Posts) पर क्लिक करें-