व्यवस्था ने निर्णय लिया कि ‘बेईमाना’ को, जहां है वहीं, सील कर दिया जाए।
लेकिन स्टाफ़ की कमी के कारण इसके क्रियान्वन में भारी व्यवधान हुआ।
हुआ यह कि जिसको भी ‘बेईमाना’ रोकने को भेजा जाता वह ख़ुद ही बेईमान निकलता और ईमानदारी की तरह ग़ायब हो जाता।
सुना है कि व्यवस्था अब विदेश से ईमानदार स्टाफ़ मंगाने पर विचार कर रही है।
(लघुकथा झूठी इसलिए भी है कि ईमानदार व्यवस्था कभी कहीं देखी ही नहीं गई)
-संजय ग्रोवर
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